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    क्या समाप्त होगा औपनिवेशिक काल में बनाया गया राजद्रोह कानून!

    “प्रजातांत्रिक देश में राजद्रोह कानून की उपयोगिता पर लगते आए हैं सवालिया निशान…उम्मीद की जानी चाहिए कि देश की शीर्ष अदालत के द्वारा अब इस मामले में सुनवाई के बाद इस मामले में बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं…

    INR डेस्क। राजद्रोह कानून को समाप्त करने के संबंध में देश की शीर्ष अदालत में लगाई गई याचिकाओं पर शीर्ष अदालत का रूख काफी सख्त नजर आने लगा है।

    शीर्ष अदालत ने 05 मई से इस मामले की सुनवाई आरंभ करने की बात कही है। अब सुनवाई को टालने के अनुरोध स्वीकार नहीं किए जाने की बात भी अदालत के द्वारा कही गई है।

    लंबे समय से इस बारे में अनेक बातें कही जा रहीं हैं और शीर्ष अदालत ने भी अपनी टिप्पणियों में यह कहा जा चुका है कि औपनिवेशिक काल के इस कानून को अब जारी रखना तर्क संगत नहीं है।

    ब्रितानी हुकूमत के संदर्भ में अगर इस धारा को देखा जाए तो ब्रिटिश हुकूमत के सरमायादारों ने उस वक्त अपने लेख और भाषणों के जरिए अंग्रेज सरकार की तल्ख शब्दों में होने वाली आलोचना पर स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों की आवाज दबाने के लिए इसका बेजा उपयोग किया जाता था।

    जब देश में प्रजातंत्र की स्थापना हो चुकी है और हर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आजादी है तब इस तरह की धारा का उपयोग क्या है!

    देखा जाए तो जिस भी सूबे में या केंद्र में जिस भी दल की सरकार है वह अपने विरोधियों की आवाज दबाने के लिए इसका दुरूपयोग कर रही है। इस धारा का प्रयोग करने में इसका मकसद बहुत ही मुफीद ही साबित होता है।

    आईपीसी की धारा 124ए उन शब्दों अथवा कार्यों के लिए तीन साल से लेकर आजीवन कैद तक की सजा का प्रावधान करती है जो सरकार के खिलाफ नफरत, विद्रोह और अवमानना जैसे कामों को संपादित करने में प्रयुक्त होते हैं। नफरत, विद्रोह और अवमानना वैसे भी इस तरह के ही शब्द हैं जो बहुत व्यापक अर्थ रखते हैं।

    जब भी राजद्रोह की बात आती है, तब देशद्रोह शब्द का प्रयोग भी अमूमन कर दिया जाता है। जबकि दोनों के अर्थ ही पृथक पृथक हैं।

    यदि कोई व्यक्ति सरकार विरोधी बातें लिखता है या बोलता है, या फिर ऐसी ही बातों का समर्थन करना है, या राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करता है या फिर संविधान को नीचा दिखने की कोशिश है तो उस व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124 ए के तहत राजद्रोह का केस दर्ज किया जा सकता है। राजद्रोह कानून को 1870 में ब्रितानी अफसर जेम्स स्टीफन के द्वारा बनाया गया था।

    अब बात की जाए देशद्रोह की। देश में सरकार को क़ानूनी रूप से चुनौती देना देशद्रोह की श्रेणी में आता है। सरकार का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाना या इसके अलावा उसमें बदलाव के लिए मांग किया जाना देश के हर नागरिक का अधिकार होता है। लेकिन गैरकानूनी तरीके से सरकार का विरोध देशद्रोह कहा जाता है।

    इसके अलावा जब किसी व्यक्ति के द्वारा सरकार को असंवैधानिक तरह से पलटने का कार्य किया जाता है तो उसे राजद्रोह करार दिया जाता है। जबकि जब किसी व्यक्ति के द्वारा देश के नुकसान के कार्य को अंजाम दिया जाता है या ऐसी कोई योजना बनाई जाती है तो उसे देशद्रोह कहा जाता है।

    देश की शीर्ष अदालत में एक बार फिर से राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर सुनवाई होना है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एनवी रमन्ना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच इस पर सुनवाई करेगी।

    वैसे राजद्रोह कानून को लेकर पिछले साल जुलाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की थी। उस समय सीजेआई एनवी रमन्ना ने पूछा था कि आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत क्यों है?

    उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह एक औपनिवेशिक कानून है। ये स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए था। इसी कानून का इस्तेमाल महात्मा गांधी और बाल गंगाधर के खिलाफ किया गया था। क्या आजादी के 75 साल बाद भी इस कानून की जरूरत है?

    इस दौरान सीजेआई रमन्ना ने कहा था कि सरकार कई सारे पुराने कानूनों को निरस्त कर रही है तो फिर धारा 124ए को निरस्त करने पर विचार क्यों नहीं कर रही?

    इस पर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि कानून को निरस्त करने की जरूरत नहीं है और गाइडलाइन बनाई जानी चाहिए, ताकि इसका कानूनी मकसद पूरा हो सके।

    इस कानून का इतिहास अगर देखा जाए तो यह कानून सबसे पहले 17वीं सदी में इंग्लैण्ड में आया था। उस दौरान सरकार विरोधी आंदोलनों के शमन के लिए हुक्मरानों ने इसका उपयोग किया था।

    इसके बाद जब ब्रिटिशर्स ने भारत पर कब्जा जमाया और स्वाधीनता आंदोलन तेज हुआ तब इसका उपयोग भारत में भी हुआ। आजादी के बाद अनेक नेताओं के द्वारा देशद्रोह कानून समाप्त करने की वकालत की गई तब इसमें 124ए को जोड़ा गया।

    पंडित जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री बने तब उनके द्वारा 1951 में अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने की आजादी को सीमित करने के लिए संविधान संशोधन लाया गया जिसमें यह प्रावधान किया गया था कि बोलने की आजादी पर तर्कपूर्ण प्रतिबंध सरकार लागू कर सकती थी।

    इसके बाद 1974 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में देशद्रोह को संज्ञेय अपराध बनाया जाकर पुलिस को बिना वारंट किसी को पकड़ने का अधिकार भी दे दिया गया था। 1962 में बिहार निवासी केदारसिंह के भाषण पर शीर्ष अदालत के द्वारा कहा गया था कि सरकार की आलोचना मात्र से राजद्रोह का प्रकरण नहीं बनता। इस मामले में व्यक्ति को तभी दण्डित किया जा सकता है जब हिंसा भड़कती हो। यह आदेश नजीर बना और धारा 124ए के प्रकरणों में इसे मिसाल के बतौर पेश भी किया जाता है।

    केंद्र सरकार की एक एजेंसी एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2016 से 2020 के बीच 5 सालों में देशद्रोह के 322 मामले दर्ज हुए थे। इनमें 422 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन इसी दौरान सिर्फ 12 लोगों पर ही देशद्रोह का आरोप साबित हो सका और उन्हें सजा दी गई।

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