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    सर्वे: न्यूज़ के लिए नहीं, मनोरंजन के लिए न्यूज चैनल देख रहे हैं लोग

    राजनामा. कॉम। प्रसिद्ध विद्वान क्रिस्टिया ने अमनपोर के शब्दों में “मेरा मानना है कि अच्छी पत्रकारिता और अच्छा टेलीविजन दुनिया को बेहतर बना सकते हैं।” अगर आज वे होते तो भारत के न्यूज चैनलों को देखकर सर पीट लेते, अपनी धारणा बदल लेते।

    हाल के वर्षो में भारतीय न्यूज चैनलों का निरंतर विकास हो रहा है। न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो में बैठे एंकर और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ता और एक्सपर्ट पत्रकारिता के नये आयाम गढ़ रहे हैं।

    न्यूज चैनलों में समाचार कम और बंदर भालू के तमाशे ज्यादा दिख रहे हैं। स्टूडियो में बैठा एकंर चीख रहा है, बंदर की तरह उछल रहा है।

    कोई प्रवक्ता किसी को पीट रहा है,तो कोई पानी का गिलास पटक रहा है,तो कोई एक्सपर्ट किसी प्रवक्ता को लाइव डिबेट में गाली दे रहा है।

    मतलब मुख्य धारा की मीडिया ने जो नई मर्यादाएं स्थापित की है,उस मर्यादा में न्यूज चैनलों ने न सिर्फ़ अपने लिए नई नैतिकता की खोज की है, बल्कि उसे प्रतिष्ठित भी किया है।

    जितनी भी तरह की अमर्यादाएं न्यूज चैनलों की नजर में थी, वे सब की सब मर्यादा और पत्रकारिता में तब्दील हो गई है।वही अब मीडिया की नैतिकता है,और अभद्रता उसके लिए नई भद्रता है।

    तभी इस देश का दर्शक आज न्यूज़ चैनलों को न्यूज के लिए नहीं देखता है,बल्कि उसे सास-बहू और साजिश समझकर देख रहा है।

    बंदर-भालू का तमाशा समझकर देख रहा है। दर्शक मनोरंजन के लिए धारावाहिक नहीं टीवी न्यूज चैनल देख रहे है।यह एक सर्वे कह रहा है।

    आईएनएस और सी वोटर ने देश के विभिन्न शहरों में पिछले सितबंर और इस महीने अक्तूबर में अपने किये सर्वे में विचित्र खुलासा किया है।

    देश के लगभग 74 प्रतिशत लोग भारत के न्यूज चैनल को न्यूज चैनल मानना छोड़ दिया है। लोगों की नजर में इस देश का न्यूज चैनल मनोरंजन का साधन बनकर रह गया है।

    73.9 प्रतिशत  लोगों की राय थी कि वे तो न्यूज चैनल मनोरंजन के लिए देख रहे हैं। उसमें न्यूज होता कहां है। 22फीसदी लोग ही न्यूज चैनल को न्यूज के लिए देखते है।

    2.5 फीसदी लोगों ने कहा बस ऐसे ही देख लेतें है,वैसे समझ में कुछ आता नही है। दिखाते हैं तो देख लेते हैं।

    आईएनएस और सी वोटर के सर्वे में महिला-पुरूष दोनों की राय एकसमान है। 73 फीसदी  महिलाओं ने भी माना न्यूज चैनल रहा नहीं वह तो मदारी बन गया है।

    न्यूज चैनलों को खेल-तमाशा मानने वालों में सभी वर्ग के लोग शामिल है। चाहे वह उच्च हो या निम्न या फिर अनपढ़ या विद्वान सभी मानते हैं, न्यूज चैनल हमारे लिये मनोरंजन चैनल की ही तरह है।

    सर्वे में सामाजिक स्थिति की बात करें तो 72 फीसदी दलित मानते है न्यूज चैनल बंदर भालू खेल तमाशे की तरह हो गया है।

    लगभग 74 फीसदी सवर्ण कहते हैं न्यूज चैनलों से न्यूज की उम्मीद खत्म हो चुकी है। सिख समुदाय के 85•3प्रतिशत लोगों ने इसे मनोरंजन का ठिकाना बताया।

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