वर्चुअल रैलीः  दांव कहीं उल्टा न पड़ जाए

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वैश्विक संकट के इस दौर में भी भाजपा सत्ता पाने को लेकर लालायित नजर आ रही है। मध्यप्रदेश से लेकर बिहार ओडिसा और बंगाल तक सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा महामारी काल में भी आतुर नजर आ रही है, लेकिन अहम सवाल है कि भाजपा अपनी कोरोना चाल में कितना सफल हो पाएगी….

वरीय पत्रकार संतोष कुमार की दो टूक विश्लेषण…

INR. पिछले दिनों बिहार चुनाव के मद्देनजर वर्चुअल रैली कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक तरह से थोड़ी जल्दबाजी दिखा दी। माना जा रहा है कि विपक्ष यानी राजद-कांगेस व अन्य के हाथ बटेर लग गया है, लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा राजद को मिलने जा रहा है।

वैसे माना यह भी जा रहा है कि महामारी के  दौर में उक्त रैली में गठबंधन धर्म निभाने वाले शुससन बाबू सीएम नीतीश कुमार को भी भारी पड़ने वाली है। हालांकि रैली के बाद से ही विपक्ष लगातार हमलावर रुख अख्तियार किए हुए हैं।

सोशल मीडिया से लेकर तमाम खबरिया प्लेटफार्म पर वर्चुअल रैली को लेकर भाजपा और केंद्रीय गृह मंत्री निशाने पर हैं। ट्विटर पर पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने जमकर भड़ास निकाले हैं। जिसपर काफी प्रतिक्रियाएं भी आयी हैं।

वैसे 15 साल के सुशासन में बिहार ने सुशासन बाबू के दो रूप देखे हैं। वही वर्चुअल रैली में केंद्रीय गृह मंत्री ने बिहार के विकास का जो मॉडल पेश किया, उसपर जनता को एतबार हुआ होगा ऐसा कम ही प्रतीत हो रहा है। क्योंकि जनता खासकर लाखों प्रवासी मजदूरों ने उस दौर को जिया है, जिसकी कल्पना उन्होंने सपने में भी नहीं की होगी।

उधर वर्चुअल रैली में केंद्रीय गृह मंत्री ने सीएम नीतीश कुमार को ही अगला मुख्यमंत्री का चेहरा पेश कर यह साबित कर दिया कि आज भी भाजपा बिहार में खुद को कमजोर मान रही है।

ऐसा नहीं है कि उसके पास सीएम का चेहरा नहीं है, लेकिन अपनी नीतियों के कारण भाजपा यह दांव बिहार जैसे राज्य में नहीं खेल सकती। वैसे कई नेता ऐसे हैं, जिन्हें विकल्प के रूप में भाजपा दांव खेल सकती थी, लेकिन भगवा नीति के सहारे सत्ता हासिल करनेवाली भाजपा इस विकल्प को चुने, ऐसा अनुमान लगाने से अच्छा इसे हम भविष्य पर ही छोड़ सकते हैं।

वहीं डिप्टी सीएम शुशील मोदी पर भरोसा शायद भाजपा थिंक टैंक न करे, क्योंकि पड़ोसी जिला झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को सत्ता सौंपकर भाजपा को अंजाम का आंकलन हो चुका है।

हालांकि इस पर अभी कुछ भी कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी, क्योंकि राजनीति कब कहां और किस वक्त करवट बदलती है यह कहना संभव नहीं इसलिए हमें थोड़ा और इंतजार करना चाहिए। आइए अब हम आपको बताते हैं कैसे बिहार की राह भाजपा और जदयू के लिए आसान नहीं होने वाला। 

सबसे पहले तो  यहां जिच गठबंधन को लेकर होने वाला है। जहां एनडीए के घटक दलों भाजपा, जदयू और लोजपा के बीच सीटों का बंटवारा होना आसान नहीं होगा। क्योंकि हाल ही में संपन्न हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में तीनों ही दल गठबंधन धर्म की मर्यादाएं लांघ चुकी है और भारी नुकसान भी उठा चुकी है।

ऐसे में बिहार विधानसभा चुनाव का मुकाबला शुरू से ही रोचक होने के आसार हैं। जबकि विपक्ष यानी राजद-कांग्रेस गठबंधन सीएम नीतीश कुमार को अवसरवादी नेता के रूप में बिहार की जनता को कन्विंस करने में हद तक सफल रही है। इसका उदाहरण पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की दिन-प्रतिदिन बढ़ती लोकप्रियता मानी जा रही है।

वहीं तेजस्वी लगातार सीएम नीतीश कुमार और पीएम मोदी पर हमलावर रुख अख्तियार किए हुए हैं। वर्चुअल रैली के बाद से उन्होंने जिस अंदाज में भाजपा और सीएम नीतीश कुमार पर हमले किए हैं, वह बिहार की जनता और प्रवासी मजदूरों के दिलों में घर कर गई है।

अपने हमलावर तेवर के माध्यम से तेजस्वी यादव जनता को यह बताने में सफल रहे हैं कि कोरोना संक्रमण काल में केंद्र और राज्य सरकार प्रवासी मजदूरों के मामले में पूरी तरह से विफल रही है। वैसे यह बातें बिहार की जनता और प्रवासी मजदूर भी अब करने लगे हैं।

दूसरी बात वैश्विक संकट कोरोनावायरस के संक्रमण काल में केंद्र सरकार और राज्य सरकार की विफलता को बिहार की जनता समझ चुकी है। खासकर जिन प्रवासी मजदूरों ने इस काल को जिया है, उनसे एनडीए गठबंधन वाली सरकार को साथ देने की उम्मीद करना बेमानी होगा। लाखों बेरोजगारों के लिए राज्य सरकार के पास कोई ठोस विकल्प ना होना भी एक बड़ा कारण हो सकता है।

यही कारण है कि संकट की इस घड़ी में चुनावी बिगुल फूंक भाजपा एक तीर से दो शिकार करने में जुट गई है। यानी दावों और वायदों की अब बरसात कर एक बार फिर से सत्ता काबिज करने की कवायद में जुट गई है। वैसे फैसला जनता को करना है।

तीसरी बात जैसा कि हमने पूर्व में ही इस बात का जिक्र किया है कि भाजपा के पास एक विकल्प के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन एक चेहरा हो सकते हैं क्योंकि  बिहार चुनाव में  जातिवाद  शुरू से हावी रही है  और इसमें  मुस्लिम मतदाता  एक बड़ा अंतर पैदा करते हैं।

हालांकि कोरोना संक्रमण के लिए शुरुआती ठीकरा भाजपाइयों द्वारा मरकज और तबलीगी जमात पर फोड़कर इस वर्ग को नाराज किया जा चुका है। वैसे धर्म और कौम के प्रति गहरी आस्था रखने वाले इस समुदाय का रुझान किसी भी चुनाव में भाजपा की ओर कम ही रहा है।

ऊपर से कोरोना संक्रमण का ठीकरा इस समुदाय पर फोड़ भाजपा एक बार फिर से बिहार के मुस्लिम मतदाताओं से दूर जा चुकी है। भले तीन तलाक जैसे बिल पास करा कर केंद्र सरकार ने मुस्लिम समुदाय को एक बड़ा तोहफा दिया है, बावजूद इसके मुस्लिम समुदाय का भाजपा के प्रति रवैया सकारात्मक खासकर बिहार चुनाव में देखने को नहीं मिल सकता है।

हालांकि अयोध्या विवाद को सुलझाए जाने का श्रेय भाजपा अपने कंधों पर लेने का हरसंभव प्रयास कर रही है लेकिन डिजिटल युग में अब लोगों को भरोसे में लेना खासकर मतदाताओं को रखना मुश्किल हो सकता है। जनता ये जान चुकी है कि अयोध्या मामले पर फैसला सुनाने के बाद सेवानिवृत्त होने के पश्चात चीफ जस्टिस को कौन सा पद मिला है।

जज पर एक महिला द्वारा यौन शोषण का आरोप लग चुका है। भले अब उस मुद्दे को हवा देने की ताकत विपक्ष में नहीं रही हो। कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि अयोध्या मामले पर फैसला सुनाने वाले जज पर इसको को लेकर काफी दबाव रहा होगा। जिसकी अब कहीं दूर दूर तक चर्चा भी नहीं हो रही है।

चौथी बात एनडीए घटक दल में शामिल राजनीति के मौसम विज्ञानी रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा की भूमिका को भी बिहार चुनाव के दौरान हम माना जा रहा है। लोक जनशक्ति पार्टी चुनाव के वक्त हमेशा से आक्रमक तेवर में रही है।

खासकर बिहार चुनाव में जहां जातिवाद की राजनीति हावी रही है। जहां लोक जनशक्ति पार्टी का बिहार में एक बड़े वर्ग पर शुरू से ही कब्जा रहा है। ऐसे में लोक जनशक्ति पार्टी अगर अपना स्टैंड बदलने पर अड़ गई तो भी एनडीए को बड़ा नुकसान होता दिख रहा है।  

उधर, चारा घोटाले की सजा भुगत रहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव आज भी बिहार की एक बड़े वर्ग के दिलों में राज करते हैं राष्ट्रीय जनता दल बिहार चुनाव से पहले लालू यादव की उस छवि को भुनाने में सफल लग रही है।

वैसे भी युवा चेहरा के रूप में तेजस्वी यादव अब पूरी तरह से परिपक्व नजर आने लगे हैं। नपी तुली शैली और पेशेवर अंदाज में विपक्ष पर हमला करने का उनका अंदाज लोगों को आकर्षित करने लगा है।

इसका उदाहरण झारखंड में दिख चुका है। झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले सीएम हेमंत सोरेन को अपरिपक्व नेता के रुप में भाजपा प्रस्तुत करने में नाकाम रही। आज वैश्विक  संकट के दौर में हेमंत सोरेन ने अपनी प्रतिभा साबित कर दी है। वैसे लालू यादव से ज्यादा चर्चा अब नीरव मोदी विजय माल्या की होने लगी है। 

अंत में कोरोना संक्रमण के काल के शुरुआती दौर में पीएम मोदी भले वैश्विक नेता के रूप में अपनी छवि बनाने में सफल रहे हों, लेकिन प्रवासी मजदूरों के वतन वापसी से लेकर वर्तमान में जारी कोरोना के कहर के बीच केंद्र का राज्यों को उनके हाल पर छोड़ चुनावी बिसात पर दांव चलने की तैयारी से पीएम मोदी की छवि धूमिल हो सकती है।

थाली-ताली और भावनात्मक आपील अब जनता को चुभने लगी है। जनता के हाथों में न रोजगार रहा, न सरकारों के पास जनता को भरोसे में लेने का संसाधन।

इन सबके बीच कोरोना कालखंड में सरकारी तंत्र के प्रताड़ना भी जनता भूली नहीं है। क्वारेंटीन सेंटरों के इनसाइड स्टोरी और सड़कों पर प्रताड़ित हुए मजदूर इसका हिसाब लेने को बेसब्र नजर आने लगी है।

मजदूरों की असीम वेदना और  मध्यम वर्ग की विवशता हर उस सरकार को आनेवाले दिनों में होनेवाले किसी भी राज्यों के चुनावों में अहम भूमिका निभा सकती है। वैसे वर्चुअल रैली, पीएम केयर फंड सहित कोरोना कालखंड की हर गतिविधियों पर जनता पैनी निगाह रख रही है। 

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