कोरोना से बचिए, क्योंकि यह सिर्फ फेफड़ा नहीं, किडनी, लीवर, ब्रेन, स्कीन सबको डैमेज कर डालता है

213

“कोरोना  वायरस (Covid-19) सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं दिमाग, दिल, किडनी, त्वचा सबको नुकसान पहुंचाता है अब तक माना जा रहा है कि कोविड-19 से मुख्य तौर पर सांस लेने में दिक्कत होती है। लेकिन नए शोधों से पता चलता है कि सार्स सीओवी-2 ना सिर्फ फेफड़ों पर बल्कि हृदय, तंत्रिकाओं, दिमाग, नसों, किडनी और त्वचा पर भी असर करता है  और यह  असर जीवन भर रह सकता है, वसर्ते उसका कोई एंटी वैक्सीन न निकल आए…

INR  डेस्क।  कोविड-19 बीमारी प्रमुख रूप से मनुष्य के श्वसन तंत्र पर ही हमला करती है। कोविड-19 फैलाने वाले सार्स सीओवी-2 वायरस के रोगजनक मुख्य रूप से निचले श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं।

इसके चलते मरीजों को सूखी खांसी, सांस लेने में तकलीफ और निमोनिया जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

लेकिन अब नए शोधों में कई संकेत सामने आए हैं कि कोविड-19 से गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों के शरीर के दूसरे अंगों को भी कोरोना वायरस ने नुकसान पहुंचाया है। कई मरीजों के हृदय, तंत्रिकाओं, दिमाग, नसों, किडनी और त्वचा पर भी असर हुआ है।

अमेरिका, इटली और चीन में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि सार्स सीओवी-2 वायरस हृदय को भी नुकसान पहुंचाता है।

इस बात का आधार सिर्फ यह नहीं है कि कोविड-19 से होने वाली मौतों में हृदय संबंधित बीमारियों से पीड़ित लोगों की संख्या ज्यादा है, बल्कि कई पीड़ित लोगों के शरीर में हृदय की कोशिकाओं के खत्म होने के भी सबूत मिले हैं।

कई ऐसे रोगियों की भी जांच की गई जिन्हें पहले से हृदय संबंधित कोई बीमारी नहीं थी। सार्स सीओवी-2 के असर से इनके शरीर में मायोकार्डिटिस यानी हृदय की मांसपेशियों में सूजन आ गई।

हालांकि ये अभी शोध का विषय है कि हृदय को नुकसान सार्स सीओवी-2 वायरस की वजह से हुआ है या इस वायरस से शरीर को बचाने के लिए सक्रिय हुए प्रतिरक्षा तंत्र के किसी इंफेक्शन की वजह से ऐसा हुआ है।

हालांकि सार्स सीओवी-2 से पहले फैल चुके सार्स और मर्स वायरस के प्रकोप के दौरान भी मरीजों के हृदय को नुकसान पहुंचा था। कोविड-19 को फैलाने वाला सार्स सीओवी-2 वायरस सार्स सीओवी और मार्स सीओवी वायरस से बहुत हद तक मिलता जुलता है।

कोविड-19 बीमारी होने के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान फेफड़ों को ही होता है। लेकिन बीमारी खत्म होने के बाद भी फेफड़ों का नुकसान ठीक नहीं हो रहा है।

चीन में कई लोगों पर किए गए शोध के बाद पता चला है कि कोविड-19 बीमारी से ठीक हुए कई मरीजों के फेफड़ों के कुछ हिस्सों ने पूर्ण रूप से काम करना बंद कर दिया है। कई रोगियों के फेफड़ों के 20 से 30 प्रतिशत हिस्से ने काम करना बंद कर दिया है।

अब वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं कि क्या इन मरीजों के शरीर में पुल्मनरी फाइब्रोसिस की समस्या हो गई है जिसमें फेफड़ों का एक हिस्सा पूरी तरह से काम करना बंद कर देता है। फेफड़े पर दूधिया धब्बा उसे हुए स्थायी नुकसान की ओर इशारा करता है।

इस बीमारी से ऑक्सीजन रक्त कणिकाओं में आसानी से नहीं पहुंच पाती है। फेफड़ों का आकार छोटा होने से सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है और जल्दी-जल्दी सांस लेनी पड़ती है।

इसका असर रोजाना के सामान्य क्रियाकलापों पर भी पड़ता है। पुल्मनरी फाइब्रोसिस को ठीक नहीं किया जा सकता है क्योंकि फेफड़ों के नष्ट हुए टिशू फिर से नहीं बन सकते हैं।

लेकिन समय रहते पता चलने पर इसका आगे बढ़ना धीमा किया जा सकता है या कभी-कभी रोका भी जा सकता है।

ज्यूरिख के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने कोविड-19 से मारे गए रोगियों के शरीर की ऑटोप्सी के दौरान देखा कि इनकी नसों में आंतरिक सूजन पैदा हो गई थी। कई अंगों में खून ले जाने वाली नसें अंदर से सूजी हुई थीं।

शोध करने पर पता चला कि नोवल कोरोना वायरस यानी सार्स सीओवी-2 के चलते नसों में आंतरिक सूजन आती है। इसके चलते हृदय को नुकसान होता है और पुल्मनरी एंबोलिज्म की दिक्कत शुरू होती है।

इसका असर पूरे शरीर में खून की आपूर्ति पर होता है। इसके नतीजे में इंसान के दिमाग समेत दूसरे अंग भी काम करना बंद कर देते हैं जिसकी परिणति मौत के रूप में होती है।

कोविड-19 के 80 प्रतिशत मरीजों की सूंघने और स्वाद पता करने की क्षमता पर असर होना पता चला है। इस तरह की समस्या कोविड-19 के संक्रमण की शुरुआत में ही शुरू हो जाता है।

इसकी मदद से कोविड-19 की पहचान करने में भी मदद मिलती है। यह समस्या कई बार सामान्य फ्लू में भी होती है, जो एडेनोवायरस से फैलता है। लेकिन सामान्य फ्लू में यह लक्षण बीमारी की गंभीरतम अवस्था में सामने आते हैं।

शोध से पता चला है कि सार्स सीओवी-2 वायरस मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। इसकी वजह नाक की नसों का सिर की हड्डी के जरिए सीधे दिमाग से जुड़ा होना है। नाक शरीर में कोरोना वायरस के प्रवेश करने का एक प्रमुख जरिया है।

बेल्जियम में हुए शोध में पता चला है कि तंत्रिका कोशिकाएं वायरस के मुख्य तंत्रिका तंत्र में पहुंचने के लिए मुख्य द्वार का काम करती हैं। कोरोना के वायरस नाकों से होकर दिमाग में चले जाते हैं

पहले फैल चुके सार्स और मर्स वायरस के दौरान तंत्रिका कोशिकाओं के जरिए दिमाग में पहुंचने वाले वायरस से दिमाग को नुकसान हुआ था। जापान में जब कोविड-19 बीमारी के एक मरीज को मिर्गी के दौरे पड़ने लगे तो डॉक्टरों को पता चला कि उसके दिमाग में सूजन आ गई है।

यह सार्स सीओवी-2 वायरस की वजह से हुई, जो उसके दिमाग तक पहुंच गया था।

चीन और जापान के शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि कोविड-19 के रोगजनक श्वसन तंत्र के साथ-साथ दिमाग को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। ये दिमाग की कोशिकाओं को मारना शुरू कर देते हैं।

इसी वजह से कोविड-19 के कई मरीज बिना सांस लेने में परेशानी आए ही सांस लेना बंद कर देते थे जिससे उनकी मौत हो रही थी। इन मरीजों के फेफड़ों में भी कोई संक्रमण नहीं था लेकिन इनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। हालांकि अभी ये पता नहीं चल सका है कि इस वायरस से दिमाग का स्ट्रोक भी आ सकता है या नहीं।

अगर कोविड-19 से प्रभावित मरीज को निमोनिया भी है और उसे वेंटिलेटर पर ले जाया जाता है तो उसके किडनी को भी नुकसान हो सकता है। यहां तक की उसकी किडनी काम करना बंद भी कर सकती है।

निमोनिया की वजह से फेफड़ों में बड़ी मात्रा में द्रव इकट्ठा होने लगता है। इस द्रव को हटाने के लिए मरीज को दवाएं दी जाती हैं। इन दवाओं से किडनी में होने वाली खून की सप्लाई प्रभावित होती है जो किडनी पर असर डालती है।

30 प्रतिशत कोविड-19 के मरीजों में किडनी इतनी खराब हो जाती है कि डायलिसिस की जरूरत होती है।

कोविड-19 से प्रभावित मरीजों के शरीर में खून का जमना भी तेज हो जाता है। इसके चलते खून के थक्के भी आसानी से बनने लगते हैं। इन थक्कों से नसों में खून की सप्लाई रुक जाती है। किडनी में भी खून की सप्लाई इससे कम हो जाती है।

कोविड-19 के कई मरीजों में किडनी की परेशानी देखी गई है। किडनी में परेशानी वाले 30 प्रतिशत मरीजों में ये दिक्कत इतनी बढ़ जाती है कि उन्हें डायलिसिस की जरूरत पड़ती है।

हालांकि ये अब तक पता नहीं चला है कि कोविड-19 से ठीक हो जाने के बाद मरीज की किडनी ठीक हो जाती है या ये समस्या लंबे समय तक चलने वाली है।

कोविड-19 बीमारी से पीड़ित कई लोगों की त्वचा पर भी इसका अलग-अलग असर देखा गया है। कई मरीजों के पैर के अंगूठे पर बैंगनी रंग का एक छोटा सा धब्बा बना दिखाई दे रहा है।

ऐसे धब्बे अक्सर खसरा या चिकन पॉक्स में दिखते हैं। चीन में कुछ मरीजों के त्वचा के रंग में बदलाव भी दिखाई दिए।

हालांकि डॉक्टरों का मानना है कि ये छोटा बैंगनी निशान पैर में जमे खून के थक्के की वजह से हो सकता है। कुछ बीमारों के शरीर पर चकते भी पड़ गए। इसके स्पष्ट कारण अभी पता नहीं हैं लेकिन ये साफ है कि सार्स सीओवी-2 वायरस इंसानी त्वचा पर असर करता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here