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Saturday, December 5, 2020

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    बिहार चुनाव: नीतीश की विदाई या तेजस्वी की ताजपोशी !

    पहले चरण तक सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। जब तक पीएम मोदी की अब तक चुनावी दंगल में इंट्री नहीं हुई थी। उनके आते ही कैंपेन का मूड पिछली चुनाव की तरह हो गया। बिहार के वास्तविक मुद्दे से भटकाने का काम शुरू हो गया...

    INR (जयप्रकाश नवीन)। बिहार में तीसरे और आखिरी चरण का चुनाव प्रचार का शोर गुरूवार को थम गया। आखिरी चरण में मतदान के बाद 10 नबबंर को तस्वीर साफ हो जाएगी कि राज्य में किसकी सरकार बनेगी।

    बिहार में अब नई सरकार चुनने में बहुत कम वक्त बचा है।सता में पांच साल पूरा कर चुकी  सतारूढ़ एनडीए ने दावा किया है कि वो सता में चौथी बार लौट रही है। जबकि महागठबंधन की नजर में यह नीतीश सरकार की विदाई वेला है।

    राजनीति के जानकार कहते हैं कि राज्य में व्यवस्था और सरकार विरोधी रूझान बहुत मजबूत है।शायद यही नीतीश कुमार को सता का रास्ता रोक सकता है। चुनावी दंगल में दोनों गठबंधन की ओर से विद्रोही भी मैदान में हैं।

    जहां दोनों गठबंधनों का समीकरण बिगाड़ने में लगें हुए हैं। लोजपा एनडीए से बाहर 143 सीटों पर चुनाव मैदान मे है।जिससे एनडीए की परेशानी बढ़ गई है।

    तीसरे चरण में भाजपा -कांग्रेस की साख दांव पर: बिहार के चुनावी जंग में 243 विधानसभा क्षेत्रों में राष्ट्रीय दलों के अलावा ऐसे अनेक दल और तीसरा गठबंधन उभरे, जिन्होंने अपने उम्मीदवार खड़ा कर चुनावी परिदृश्य को उलक्षन भरा बना दिया है।

    राजनीति जानकार यह हिसाब नहीं लगा पा रहें हैं कि इन सब का चुनाव परिणामों पर कैसा असर होगा।पहले चरण के 71 सीटों पर मुकाबला लगभग एकतरफा माना जा रहा था,तो दूसरे चरण के 94 सीटों पर कड़े मुकाबले के आसार दिखे, जबकि अंतिम चरण के 78 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों की साख दांव पर है।

    भाजपा के सामने तीसरे चरण में अधिक सीट जीतने की चुनौती है। भाजपा इस चरण में 35 सीटों पर लड़ रही है। पिछले चुनाव में 54 सीटें पर लड़ी भाजपा को इन क्षेत्रों में 19 सीटें आई थी। तीसरे और अंतिम चरण में भाजपा ने आठ उम्मीदवारों को पहली बार मौका दिया है।

    वहीं तीसरे और आखिरी चरण में कांग्रेस की भी अग्नि परीक्षा है। 26 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। चुनाव में कोसी-सीमांचल में अल्पसंख्यक बहुल सीट कांग्रेस के पास ज्यादा है।

    पार्टी ने इन क्षेत्रों से नौ उम्मीदवारों में छह ऐसे हैं, जो पिछली बार जीत हासिल की थी। इन क्षेत्रों में ओवेसी की पार्टी भी हुंकार भर रही है। लिहाजा कांग्रेस के पास इन सीटों को बचाने की कड़ी चुनौती है।

    माहौल बनाने का प्रयास:  कहने को तो यह चुनाव बिहार विधानसभा का है, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान सरकार की बातें और घोषणाएं पूरी तरह राष्ट्रीय रहे। सरकार में सहयोगी भाजपा ने चुनाव प्रचार को ऐसा मोड़ दिया, मानो वह अकेले चुनाव लड़ रही है।

    पीएम मोदी ने बिहार में कुल 17 रैलियां की। कुछ रैलियों में सीएम नीतीश कुमार ने भी पीएम के साथ मंच साक्षा की, लेकिन दोनों के बीच तल्खी और कटुता भी नजर आई।

    चुनाव प्रचार में एक तरफ पीएम मोदी थे तो उनके साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर दर्जनों केंद्रीय मंत्री, प्रवक्ता अपनी पार्टी के लिए वोट मांग रहे थे। अपने पक्ष में महौल बनाने का प्रयास किया।

    दूसरी तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी बिहार में चुनाव प्रचार को अंजाम दिया। चिराग पासवान भी कई सभाएं की। लेकिन इन सब के बीच महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी की सभा और रैलियां काफी खास रही। उनकी रैलियों और उनके भाषणों की चर्चा खूब रही।

    रोजगार बना चुनावी मुद्दा: यूं तो बिहार में पिछले कई चुनाव जंगलराज और विकास के नाम पर लड़ा गया। लेकिन यह पहला ऐसा चुनाव देखने को मिला, जहां रोजगार एक बड़ा और चुनावी हथियार विपक्ष के लिए बन गया।

    बिहार में रोजगार एक बड़ा मुद्दा है। किसान नाराज हैं। दलितों में नाराजगी है। युवा वर्ग परेशान हैं। लाकडाउन की मार झेल रहे प्रवासी मजदूर भी सरकार से खासे नाराज हैं। इनकी नाराजगी सतारूढ़ एनडीए को भारी पड़ सकती है।

    राजद नेता तेजस्वी ने घोषणा की है कि उनकी सरकार बनी तो दस लाख सरकारी नौकरी देंगे। तेजस्वी इस मुद्दे पर डटे हैं। अपनी हर सभा में यही बात दोहरा भी रहे हैं। इस मुद्दे पर तेजस्वी को युवा वर्ग का साथ मिलता दिख रहा है।

    तेजस्वी के दस लाख नौकरी देने की घोषणा पर सीएम नीतीश कुमार कहते हैं कि उनलोगों ने पिछले 15 साल में 95 हजार नौकरियां दी,जबकि एनडीए ने छह लाख नौकरियां दी।

    सीएम नीतीश अपनी सभाओं में दस लाख नौकरी देने की घोषणा को हवा-हवाई बता रहे हैं। बाद में भाजपा ने ज़बाब में 19 लाख रोजगार देने की बात कर दी। अब सीएम नीतीश कुमार इस मामले पर चुप्पी ओढ़ ली है।

    एनडीए के पहले कार्यकाल में विकास दिख रहा था। लेकिन उसके बाद एजेंडा कमजोर हो गया। गैर कृषि क्षेत्र , निर्माण , बिजली और सड़क के मोर्चे पर राज्य ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

    लेकिन दोहरे अंकों में विकास दर के बाबजूद राज्य में सबसे गरीब लोग हैं। बिहार में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी 34 फीसदी है। बिहार में प्रति व्यक्ति आय 3,650 रुपये महीना है, जबकि राष्ट्रीय आय 11,625 रुपये है।

    वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास: किसी भी राज्य में जब चुनाव होते हैं तो वहां के मुद्दे स्थानीय होते हैं। मसलन रोजगार की समस्या,शिक्षा, बिजली-पानी, सड़क , स्वास्थ्य और विकास।

    बिहार में भी संभवतः यही मुद्दे रहें हैं। लेकिन राजनीतिक दल अपने अंदाज से मुद्दे जनता पर थोपने शुरू कर देते हैं। जब बिहार चुनाव में दस लाख सरकारी नौकरी देने की घोषणा महागठबंधन ने की तो लगा कि एनडीए के लिए चाहकर भी इन मुद्दों से इतर कोई नई कहानी नहीं गढ़ पाएगा।

    तेजस्वी के ज़बाब में भाजपा अचानक 19 लाख रोजगार की बात करने लगा। मतदाताओं को भी लगने लगा कि इस बार का चुनाव रोजगार के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है। पहले चरण तक सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। जब तक पीएम मोदी की अब तक चुनावी दंगल में इंट्री नहीं हुई थी। उनके आते ही कैंपेन का मूड पिछली चुनाव की तरह हो गया। बिहार के वास्तविक मुद्दे से भटकाने का काम शुरू हो गया।

    पहले चरण में एनडीए की हालत खराब होते देख नेताओं की भाषा शैली बदलने लगीं। दूसरे और आखिरी चरण का चुनाव प्रचार खत्म होते-होते आरक्षण, भारत माता, पुलवामा, धारा 370,राम मंदिर, आतंकवादी,अराजक जैसे मुद्दे हावी हो गये।

    नेताओं के बोल बिगड़ने लगा। महागठबंधन के जीतने पर बिहार में आतंकवादियों की शरणस्थली और जंगलराज बनने का डर दिखाया जाने लगा। नेताओं पर व्यक्तिगत हमले किए जाने लगे। मां-बाप को संबोधित कर चुनाव में वोट मांगा जाने लगा।

    राजनीतिक में वास्तविक मुद्दे से ध्यान हटाने का यह एक तरीका है। मुश्किल यह है कि कोई भी राजनीतिक दल शिक्षा,स्वास्थ्य, रोजगार, उधोग जैसे मुद्दे नहीं उठाती है।

    कहां है विकास: बिहार में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। असल में यह एक मिथक है,जिसका प्रचार बिहार के लोगों को बेबकूफ बनाने के लिए राजनीतिक दल बरसों से कर रहे हैं। जबकि हकीकत अलग है।

    बिहार में जिस तरह से व्यवस्थित तरीके से शिक्षा और स्वास्थ्य को खत्म हुए,उसी तरह से उधोग-धंधो को नष्ट किया गया। एक समय बिहार में हर जिले में औसतन तीन या उससे ज्यादा चीनी मिले हुआ करती थी, पर आज सभी ठप्प है।

    कृषि आधारित उद्योग के लिए बिहार सबसे आदर्श जगह है। एक सुधा डेयरी लगी तो बिहार देश का दूसरा सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राज्य बनकर उभरा। फल-सब्जियों के उत्पादन में भी बिहार अव्वल है, फिर भी न कोई कृषि आधारित उद्योग लगा और न ही पुराने कल-कारखाने पिछले तीस सालों में लगें।

    बिहार में शिक्षा की स्थिति इतनी खराब क्यों हैं, शिक्षा पिछले कुछ सालों में व्यवस्थित तरीके से कमजोर होते गई है। शिक्षा पर खर्च के मामले में बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है।

    स्कूलों में दो लाख से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली है। ठेके पर जिन शिक्षकों को रखा गया उनमें से अधिकतर शिक्षण के बुनियादी पैमानों पर फेल हो जाएंगे। सरकार ने वोट बैंक के लिए ऐसे शिक्षकों को फलने-फूलने का मौका दिया।

    बिहार में विकास के इतने काम हुए तो बिहार गरीब राज्य क्यों हैं। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी 34 फीसदी है। देश के 23 राज्यों की स्थिति इससे बेहतर है। बिहार में प्रति व्यक्ति आय 3,650 रूपये है, जबकि राष्ट्रीय आय औसत 11,625 रूपए है।

    साक्षरता के पैमाने पर बिहार देश का दूसरा सबसे बड़ा पिछड़ा राज्य है। जहां 30फीसदी लोग अब भी निरक्षर हैं। महिलाओं की हित की बात कहने वाली सरकार के राज्य में महिलाओं में निरक्षरता का आंकड़ा लगभग 50 फीसदी है। गरीबी प्रति व्यक्ति आय और निरक्षरता का आंकड़ा अपने आप में विकास और सुशासन के दावों की पोल खोलने वाला है।

    जीत के अपने-अपने दावे: बिहार में तीसरे और आखिरी चरण का चुनाव प्रचार गुरुवार को थम गया। चुनाव प्रचार समय सीमा खत्म होने के बाद सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने जीत के दावे किये हैं।

    कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने दावा किया है कि कांग्रेस 40-50सीटें जीतेगी।जबकि जदयू के प्रदेश अध्यक्ष सह सांसद बशिष्ठ नारायण सिंह ने पिछले चुनाव से ज्यादा सीटें जीतने की बात कही है। उधर, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल ने बिहार में एनडीए सरकार बनने का दावा किया है।

    फिलहाल, बिहार में गुरुवार शाम को तीसरे और आखिरी चरण का चुनाव प्रचार का शोर थम गया। सभी राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने को लेकर सारी ताकत झोंक दी है। सात नबंबर को 78 सीटों पर मतदान होना है।

    चुनाव यह वो घडी है, जब सियासी पार्टियां हर जरूरत मंद आंख में सुनहरे ख्वाब उतारती है। इसमें वादे हैं, दावे हैं। तीसरे और आखिरी चरण में मतदान में महज 48 घंटे बचे हैं।

    जब 10 नबंबर को ईवीएम से वोटों की गिनती होगी, तब तय हो जाएगा कि बिहार की जनता को मशीन पर लगा कौन सी पार्टी का बटन सबसे ज्यादा पसंद आया।

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