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    जानिएः भारत में कहां है दुनिया का सबसे पुराना बांध

    INR. क्या आपको पता है कि विश्व का सबसे प्राचीन बांध भारत में है? जी हां, इसका जिक्र बुधवार को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भी अपने संबोधन के दौरान किया। वे तमिलनाडु में तिरुवल्लुवर विश्वविद्यालय के 16वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे।

    कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, “कृषि में उपजाऊ होने के साथ-साथ साहित्य के रूप में तमिलनाडु एक अद्वितीय स्थान रहा है। और तो और यहां की इंजीनियरिंग विश्व में सबसे पुरानी इंजीनियरिंग में से एक है। प्रारंभिक चमत्कार कहलाने वाला दुनिया का सबसे प्राचीन बांध और सिंचाई प्रणालियों में से एक ”ग्रैंड एनीकट” भी मौजूद है।

    राष्ट्रपति ने जिस ”ग्रैंड एनीकट” बांध का जिक्र किया है उसकी कहानी जानना भी बहुत रोचक हो सकता है। दरअसल ”ग्रैंड एनीकट” बांध का निर्माण तकरीबन 2 हजार साल पहले तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली जिला स्थित कावेरी नदी पर किया गया था।

    इसे ”कल्लनई बांध” अथवा ”ग्रैंड एनीकट” के नाम से भी जाना जाता है। यह बांध आज भी न केवल सही सलामत है बल्कि सिंचाई का एक बहुत बड़ा साधन है। कहा जाता है कि ये दुनिया में सबसे पुराने बांधों में से एक है।

    बांध का निर्माण चोल काल में राजा करिकल चोल ने करवाया
    इस बांध का निर्माण संगम काल के चोल वंश के राजा करिकल चोल ने करवाया था ताकि कावेरी नदी की धारा के प्रभाव को मोड़ा जा सके। दरअसल, कावेरी नदी की जलधारा का प्रवाह बहुत तीव्र है।

    बरसात के मौसम में डेल्टा क्षेत्रों में यह अकसर बाढ़ का कारण भी बनती थी। इस वजह से इस नदी पर बांध का निर्माण कराया गया ताकि इसके पानी को सिंचाई के लिए इस्तेमाल में लिया जा सके।

    चोल वंश के राजा करिकल 190 ई. के आसपास सत्ता में आए। करिकल के शासनकाल को व्यापार, युद्ध और निर्माण कार्यों के लिए जाना गया। उन्होंने रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार का विस्तार कर अपने राज्यों के खजाने भरे।

    फिर उन्होंने व्यापार के माध्यम से प्राप्त धन का उपयोग युद्धों और निर्माण परियोजनाओं में किया। चोल वंश द्वारा नियंत्रित क्षेत्र का विस्तार सीलोन (Ceylon) तक हुआ है, लेकिन इस क्षेत्र में उनका सबसे अधिक योगदान ग्रैंड एनीकट है। आज भी इस बांध के एक छोर पर करिकल चोल की एक मूर्ति स्थापित है।

    कल्लनई बांध के मूल डिजाइन से लगभग 16 शताब्दियों तक की गई उद्देश्यों की पूर्ति
    कल्लनई बांध समय की कसौटी पर खरा उतरा है। अपने मूल निर्माण के 1800 से अधिक वर्षों के बाद भी यह बांध अपने इच्छित उद्देश्य को पूरा कर रहा है। किसी भी आधुनिक बांध के रूप में, कल्लनई बांध को रखरखाव की आवश्यकता थी।

    1800 के दशक में सबसे बड़ा बदलाव तब हुआ जब अंग्रेजों ने फैसला किया कि बांध को आधुनिकीकरण की जरूरत है। इस बांध से किसी की भी सराहना नहीं छीननी चाहिए, क्योंकि अधिकांश प्राचीन बांध जो आज भी खड़े हैं, कुछ इसी तरह के अपडेट से गुजरे हैं। इसे उनके इतिहास में जरूर इंगित करें।

    बताया जाता है कि इस बांध का मूल डिजाइन लगभग 16 शताब्दियों तक चला। प्राचीन भारतीय इंजीनियरों के अविश्वसनीय दिमागों का इस्तेमाल से बनाए गए इस बांध के लिए एक वसीयतनामा है, जिन्होंने इसकी संरचना को डिजाइन किया था। इसके अलावा, प्रसिद्ध ब्रिटिश सिंचाई विशेषज्ञ सर आर्थर कॉटन ने कल्लनई बांध के बाद अपना स्वयं का बांध डिजाइन तैयार किया।

    इतना पुराना होने के बावजूद आज भी मजबूती के साथ टिका है ये बांध
    यही कारण है कि यह बांध इतना पुराना होने के बावजूद आज भी मजबूती के साथ टिका हुआ है। तमिलनाडु में आज भी इस बांध को सिंचाई कार्यों के लिए उपयोग में लिया जा रहा है।

    इस बांध को अपनी निर्माण शैली के कारण आर्किटेक्चर और इंजीनियरिंग के बेहतरीन कौशल के रूप में देखा जाता है। पूरी दुनिया के लिए इसे एक प्रेरणा स्त्रोत माना जाता है और हर साल अनगिनत संख्या में टूरिस्ट इस बांध को देखने आते हैं।

    पानी की तेज धार के कारण इस नदी पर किसी निर्माण या बांध का टिक पाना बहुत ही मुश्किल काम था। उस समय के कारीगरों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और और नदी की तेज धारा पर बांध बना दिया जो 2 हजार वर्ष बीत जाने के बाद आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है।

    किसी जमाने में तंजावुर को बाहर से खरीदना पड़ता था अन्न, अब होता है चावल का अच्छा उत्पादन
    कावेरी नदी, श्रीरंगम में दो अलग-अलग धाराओं में विभाजित होती है जिसमें से एक उत्तरी धारा को कोल्लिदम कहते हैं और दूसरी दक्षिणी धारा का नाम कावेरी ही है। जैसे-जैसे यह नीचे की तरफ बढ़ती हैं, दोनों धाराएं फिर एक साथ आती हैं।

    कल्लनई बांध को कावेरी नदी की दक्षिणी धारा पर बनाया गया है, जहां यह कोल्लिदम के पास आती है। बांध से कावेरी की धारा चार भागों में बंट गई- कोल्लिदम, कावेरी, वेंनारू और पुठु अरु।

    चोल राजा ने न सिर्फ यह बांध बनवाया बल्कि यहां से किसान अपने खेतों में पानी इस्तेमाल कर सकें इसके लिए कैनाल भी बनवाईं। इन चार धाराओं से डेल्टा क्षेत्रों में अच्छी सिंचाई होने लगी और देखते ही देखते यहां पर सूखे और अनाज की कमी की समस्या खत्म हो गई।

    कहते हैं किसी जमाने में तंजावुर को बाहर से अन्न खरीदना पड़ता था लेकिन अब यहां चावल का अच्छा उत्पादन होता है।

    आज यह बांध 400,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने में करता है मदद
    आज यह बांध 400,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने में मदद करता है। बांध के निर्माण के समय बड़े-बड़े पत्थरों को नदी के तल पर लगाया गया, जिनसे नदी की धारा की दिशा बदली गई। यह बांध अब भारतीय राज्य तमिलनाडु में है, लेकिन इसका इतिहास राज्य के निर्माण से लगभग 1,750 साल पहले का है।

    यह बांध वास्तव में देखने लायक है। चोल काल में इसकी लंबाई 329 मीटर, चौड़ाई 20 मीटर और ऊंचाई 5.4 मीटर है। चोल काल के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान इस बांध में हल्का-सा बदलाव हुआ। अब इस बांध की लंबाई लगभग 1 किलोमीटर, चौड़ाई 20 मीटर व और ऊंचाई 66 फीट है।

    साल 1804 में एक मिलिट्री इंजीनियर, कैप्टेन कॉल्डवेल को डेल्टा क्षेत्र में सिंचाई के निरिक्षण के लिए नियुक्त किया गया था। उन्होंने जब बांध का निरीक्षण किया तो उन्हें समझ में आया कि अगर बांध की ऊंचाई बढ़ा दी जाए तो लोगों को और ज्यादा पानी सिंचाई के लिए मिल सकता है।

    काल्डवेल के मार्गदर्शन में बांध की ऊंचाई को पत्थरों का उपयोग करके 0.69 मीटर और बढ़ाया गया। इससे बांध के पानी को सहेजने की क्षमता भी बढ़ गई। साल 1829 में ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त सर आर्थर टी कॉटन ने कल्लनई बांध की तकनीक को इस्तेमाल करते हुए ही इस क्षेत्र में और भी बांध बनवाए।

    उन्होंने ही इस बांध को ”ग्रैंड एनीकट” नाम दिया गया और उन्होंने इसे ”वंडर्स ऑफ़ इंजीनियरिंग” कहा था।

    कैसे पहुंचे यहां तक
    यदि आप भारत की इस अमूल्य तकनीकी विरासत के दर्शन करना चाहते हैं तो आपको तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में आना होगा। तिरुचिरापल्ली से कल्लनई बांध की दूरी महज 19 किलोमीटर है।

    यहां से सबसे पास तिरुचिरापल्ली एयरपोर्ट है जो 13 किमी दूरी पर है। रेलवे मार्ग की बात करें तो यहां सबसे नजदीक लालगुडी रेलवे स्टेशन है जो मात्र 4 किमी की दूरी पर है।

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