सुभद्रा कुमारी चौहानः  खूब लड़ी मैदानी, वो तो झांसी वाली रानी थी..

(INR (Prasar Bharati News Service). हैरानी की बात है कि बरसों पुरानी यह कविता हमें आज भी याद है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने इसी तरह न जाने कितने ही ज़िन्दगीओ पर अपनी छाप छोड़ी हैं।

उत्तर प्रदेश, निहालगढ़ की बेटी, मध्य प्रदेश , जबलपुर की बहू और भारत का गर्व सुभद्रा कुमारी चौ हान के द्वारा लिखे गए एक-एक शब्द ऊर्जा का संचार करते हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से आम जन की आवाज़ बनीं सुभद्रा को पता था कब, कैसे और क्यों अपनी आवाज़ उठानी चाहिए।

चाहे वो शब्दों का सहारा लेकर आज़ादी के लिए लड़ना हो या फिर उन्हीं शब्दों के सहारे बेटियों और बहुओं पर होते अत्याचार के खिलाफ़ लोगों को जागरूक करना हो। सुभद्रा जी कभी हिचकिचाहि नहीं, डरी नहीं और अपने 43 साल के जीवन में ऐसा काम किया जिससे सालों बाद आज भी उन्हें याद किया जाता है।

संक्षिप्त जीवनी
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 में हुआ और एक दुर्भाग्य कार एक्सीडेंट में 15 फरवरी, 1948 को वो दुनिया छोड़ गईं। वो नागपुर से वापस जबलपुर आ रही थीं जब वह दुर्घटना हुई। हालांकि, इतनी कम जीवन काल में भी उन्होंने इतना नाम कमा लिया कि आज की युवा पीढ़ी के लिए एक मिसाल हैं।

जिस सदी में चौहान बड़ी हो रही थीं उस वक़्त भारत देश अपनी आज़ादी की लड़ाई में एक अहम मुकाम पर था। आए दिन कुछ ना कुछ ऐसा हो रहा था जिससे उनके अंदर वो आग जल चुकी थी, जिसे अपने देश की आज़ादी के लिए कुछ कर गुज़रना था। सुभद्रा जी पहली महिला सत्याग्रही थीं, जिन्हें कोर्ट अरेस्ट किया गया था। दो बार और उन्होंने जेल की राह देखी। सुभद्रा जी ने कभी भी खुद को आज़ादी की लड़ाई में पीछे नहीं पाया। ऐसी निडर थीं वो।

इसके साथ-साथ सुभद्रा जी ने समाज की कई खराब परम्पराओं के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई। महिलाओं के अधिकारों के लिए वे बढ़-चढ़ कर आगे आयीं। उन्होंने स्वयं कभी अपने ससुराल में घूंघट नहीं रखा।

फिल्में देखने की शौखिन सुभद्रा जी इन सब से दूर जब मार्मिक कविताएं लिखतीं तो शब्दों से ऐसा मोह का जाल बिछातीं जिससे कोई बच नहीं पता।

“तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं”

उनकी प्रमुख रचनाओं की बात करें तो निम्न रचनाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं-

कहानी संग्रह
• बिखरे मोती
• उन्मादिनी
• सीधे साधे चित्र

कविता संग्रह
• मुकुल
• त्रिधारा
• प्रसिद्ध पंक्तियाँ
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥
• सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
• मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन सुख या शांति नहीं होगी यही बात तुम भी कहते थे सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।

जीवनी
• ‘मिला तेज से तेज’
सुभद्रा कुमारी चौहान ने कुल 46 कहानियां लिखीं। हर एक कहानी में उनके आदर्श कूट-कूट कर भरे हुए दिखेगा। उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें सत सत नमन।

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