अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी को आपातकाल से जोड़ने के मायने?

राजनामा.कॉम। आज भारत में सोशल मीडिया पर सुबह से दो ही ख़बरें छाई रहीं। पहला अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव और दूसरा अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी।  रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी को बुधवार सुबह महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

चैनल के मुताबिक़ मुंबई पुलिस की एक टीम सुबह अर्नब गोस्वामी के घर पहुँची और उन्हें पुलिस वैन में बैठाकर अपने साथ ले गई।

पुलिस का कहना है कि अर्नब गोस्वामी को 53 साल के एक इंटीरियर डिज़ाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ अर्नब गोस्वामी ने आरोप लगाया है कि मुंबई पुलिस ने उनके, उनकी पत्नी, बेटे और सास-ससुर के साथ हाथापाई की। रिपब्लिक टीवी चैनल ने इस पूरे मामले पर बयान जारी कर अपना पक्ष भी रखा है।

राम बहादुर राय मानते हैं कि अर्नब गोस्वामी का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या फिर प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ नहीं है। ये आत्महत्या के लिए मजबूर करने का मामला है। अगर उनकी किसी लिखी बात को लेकर या किसी रिपोर्ट को लेकर कोई एक्शन होता, तो पत्रकार के तौर पर हम विरोध कर सकते हैं।

उनका मानना है कि अगर मुंबई पुलिस ने कोई ज़्यादती की है, जैसे आधी रात को घर में घुस जाना या फिर मार-पीट करना तो ये अर्नब के लिए भी ग़लत है और ये बात विनोद वर्मा के लिए भी लागू होनी चाहिए, प्रशांत कनौजिया के लिए भी, केरल के पत्रकार के लिए भी और भीमा कोरेगाँव के अभियुक्तों के लिए भी।

“पुलिस की ज़्यादती किसी पत्रकार के साथ हो या नागरिक के साथ हो या फिर किसी बुद्धिजीवी के साथ, किसी भी सूरत में इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। सिर्फ़ आप प्रेस से हैं, इसलिए आपको कोई अधिकार नहीं मिल जाता।”

राम बहादुर इमरजेंसी के दौरान छात्रसंगठन एबीवीपी से जुड़े थे और बाद में पत्रकारिता से जुड़े। वो इमरजेंसी के दौरान जेल भी गए थे। इस पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार पर ये भी आरोप लग रहे हैं कि राज्य सरकार ने बदले की कार्रवाई की है।

दरअसल, अप्रैल के महीने में महाराष्ट्र के पालघर से सूरत जा रहे दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इसी मुद्दे पर अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी को लेकर टिप्पणी की थी।

अर्नब ने अपने शो कहा था, “अगर किसी मौलवी या पादरी की इस तरह से हत्या हुई होती तो क्या मीडिया, सेक्युलर गैंग और राजनीतिक दल आज शांत होते? अगर पादरियों की हत्या होती तो क्या ‘इटली वाली सोनिया गांधी’ आज चुप रहतीं?”

उसके बाद मुंबई समेत पूरे देश में कई जगह उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई। महाराष्ट्र सरकार और अर्नब गोस्वामी के बीच इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा विवाद हुआ था।

दूसरा विवाद सुशांत सिंह राजपूत मामले को लेकर भी हुआ, जब रिपब्लिक टीवी ने मुंबई पुलिस पर पूरे मामले की ठीक से जाँच ना करने के आरोप लगाए। मुंबई पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज़ किया था।

सुशांत मामले में महाराष्ट्र सरकार पर भी आरोप लगाए गए और विवाद बढ़ता गया। आज की घटना को कई पत्रकार बदले की कार्रवाई और राजनीति से प्रेरित क़दम भी बता रहे हैं।

कई राष्ट्रीय टीवी चैनल के एडिटरों ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। इंडिया टीवी के प्रमुख रजत शर्मा, एनडीटीवी की सोनिया सिंह और टाइम्स नाऊ से जुड़े राहुल शिवशंकर भी इनमें शामिल हैं।

रजत शर्मा न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोशिएसन (एनबीए) के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, “मैं आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में अर्नब गोस्वामी की अचानक हुई गिरफ़्तारी की निंदा करता हूँ। मैं उनके स्टूडियो ट्रायल वाली पत्रकारिता स्टाइल से सहमत नहीं हूँ, लेकिन एक पत्रकार को सत्ता में बैठे लोग इस तरह से परेशान करें, ये भी उचित नहीं है। एक मीडिया के एडिटर के साथ ऐसा बर्ताव सही नहीं है।”

तो क्या वाक़ई में महाराष्ट्र में सरकार के ख़िलाफ़ बोलने और लिखने की आज़ादी नहीं बची है? ये जानने के लिए हमने मराठी पत्रकारों से भी बात की। लोकमत अख़बार में काम करने वाले यदु जोशी महाराष्ट्र में 30 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र में इमरजेंसी जैसे हालात है, ऐसा मुझे नहीं लगता। आज भी महाराष्ट्र में पत्रकार सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं, मैं भी लिख रहा हूँ, लेकिन ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि पत्रकारों का दमन चल रहा है। अर्नब का मामला अलग है। उसका सभी पार्टियाँ राजनीतिक मुद्दा बना रही है।”

“जिस ढंग से अर्नब ने कुछ महीनों से स्टैंड लिया है, उसको आज की घटना के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। जबकि अर्नब को गिरफ़्तार 2018 के एक इंटीरियर डिज़ाइनर की आत्महत्या के मामले में किया गया है। इस मामले में उनकी पत्नी ने शिकायत की थी, ये भी एक पहलू है।”

“मुबंई पुलिस को अपनी साफ़ छवि बरक़रार रखने के लिए सुबह का घटनाक्रम टालना चाहिए था। अगर मुंबई पुलिस जिस ढंग से पेश आई, वो नहीं आती, तो ये ज़रूर कहा जाता कि अर्नब को अन्वय नाइक की आत्महत्या मामले में गिरफ़्तार किया गया है। उसमें बदले की भावना नहीं है।”

इस मुद्दे पर दिल्ली के पत्रकारों और एडिटरों की राय मुंबई और महाराष्ट्र के जर्नलिस्टों की राय से अलग दिख रही है।निखिल वागले, स्वतंत्र पत्रकार हैं। इसके पहले उन्होंने टीवी और अख़बार दोनों में काम किया है।

ट्विटर पर एडिटर्स गिल्ड का बयान ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा कि अर्नब की गिरफ्तारी का पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है। ये एक पुराना मामला है जिसमें देवेंद्र फडणवीस सरकार ने जाँच करने से इन्कार कर दिया था। पीड़ित परिवार ने पूरे मामले में जाँच की माँग की है।

यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि महाराष्ट्र देश का सबसे अकेला राज्य है, जहाँ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क़ानून है। 2017 में बने इस क़ानून को 2019 में राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिली है।

इस क़ानून के मुताबिक़ ड्यूटी पर तैनात किसी पत्रकार या उससे जुड़ी संस्था पर हमला किया जाता है, तो उसे जेल और जुर्माना भरना होगा।

महाराष्ट्र में टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन नाम की एक संस्था भी है। महाराष्ट्र में काम करने वाले पत्रकार इसके सदस्य होते हैं। वर्तमान में इनके 475 सदस्य हैं, जिसमें रिपब्लिक टीवी के कुछ पत्रकार भी शामिल हैं।

अर्नब की गिरफ्तारी के बाद इन्होंने अपना बयान जारी कर कहा है, “रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी एक व्यक्तिगत मामले को लेकर हुई है।

पत्रकारिता से इसका कोई संबंध नहीं है। क़ानून के सामने सभी समान होते हैं। इसलिए क़ानून को अपना काम करने दीजिए। न्याय व्यवस्था से सत्य जनता के सामने आएगा और हम पत्रकार के नाते सच के साथ हैं।”

दरअसल महाराष्ट्र सरकार, मुंबई पुलिस और रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी के बीच तनाव बीते कई महीनों से चल रहा था। पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या के बाद रिपब्लिक टीवी पर एक चर्चा आयोजित की गई थी।

इस चर्चा में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लेकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने अर्नब गोस्वामी की भाषा को लेकर सवाल उठाए थे।

अर्नब के बयान पर उनके ख़िलाफ़ मुंबई के अलावा भी कई जगह एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ से अर्नब गोस्वामी को अंतरिम राहत मिल गई थी। इसके बाद 22-23 अप्रैल की मध्य रात्रि में उन पर कुछ लोगों ने कथित तौर पर हमला किया।

इस हमले से जुड़ा एक वीडियो पोस्ट करते हुए अर्नब ने कहा था, ”मैं ऑफ़िस से घर लौट रहा था, तभी रास्ते में बाइक सवार दो गुंडों ने हमला किया। मैं अपनी कार में पत्नी के साथ था। हमलावरों ने खिड़की तोड़ने की कोशिश की। ये कांग्रेस के गुंडे थे।”

इसके बाद मुंबई पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार भी कर लिया था। लेकिन पहले मामले में 28 अप्रैल को मुंबई पुलिस ने अर्नब गोस्वामी से क़रीब 10 घंटे तक पूछताछ की।

इसके बाद फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में भी रिपब्लिक टीवी पर कई खब़रें दिखाई गईं, जिनमें मुबंई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर मामले को ठीक से हैंडल ना करने का आरोप लगाया गया।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर भी अर्नब ने कई गंभीर आरोप लगाए।

इसके बाद 8 सितंबर को रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया गया। उस वक़्त भी इंटीरियर डिज़ाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले का ज़िक्र विधानसभा में हुआ था।

उसके बाद 8 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने टीआरपी स्कैम का पर्दाफ़ाश करने का दावा किया। दूसरे चैनलों के साथ रिपब्लिक टीवी पर भी पैसे देकर अपने चैनल की टीआरपी (टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट्स) को बढ़ाने के आरोप लगे।

इसके बाद 23 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की। मुंबई पुलिस को कथित तौर पर बदनाम करने के मामले में चैनल के चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई।

कंगना रनौत ने भी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में शिवसेना, महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस पर आरोप लगाए थे।

इसके बाद उनके ऑफ़िस में हुई तोड़फोड़ पर भी सवाल उठे। मामला कोर्ट भी पहुँचा। वहीं सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने के आरोप में कंगना और उनकी बहन को भी नोटिस भेजा गया है।

दूसरी ओर शिवसेना के नेता संजय राउत रिपब्लिक टीवी पर मुंबई पुलिस की कार्रवाई को जायज़ ठहरा रहे हैं।

उन्होंने कहा, “सर्वोच्च न्यायालय ने इस चैनल के बारे में कहा था कि आप न्यायालय नहीं हो, जाँच एजेंसी नहीं हो, इसलिए आप किसी के ख़िलाफ़ कुछ भी ग़लत-सलत बोलकर लोगों को बहकावे में नहीं ला सकते।”

संजय राउत ने उल्टा सवाल किया कि ये हमारा कहना नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय का है, तो क्या आप सर्वोच्च न्यायालय से भी कहेंगे कि ये काला दिन है?  (साभारः बीबीसी)

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