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SC का यह फैसला CBI की साख बचाने की बड़ी कोशिश

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कह सकते हैं कि इंदिरा गांधी ने जो शुरुआत की थी, मोदी जी उसको जवानी प्रदान कर रहे हैं। यानी कांग्रेस को यह बीजेपी या कहें संघ का जवाब है। लेकिन चिंता का विषय ये है कि इस जवाब में जनता, जनतंत्र और जनहित का क्या ?…..”

मशहूर सिने लेखक धनंजय कुमार का सटीक विश्लेषण…..

सीबीआई मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले को दोनों पक्ष अपनी अपनी जीत के तौर पर देख रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुद्धिमता भरा फैसला लेते हुए सरकार द्वारा आधी रात को नियुक्त सीबीआई के अंतरिम निदेशक एम। नागेश्वर राव को बस केयरटेकर बनाकर और आलोक वर्मा के खिलाफ लगे आरोप की भी रिटायर्ड जज की देखरेख में जांच कर १५ दिनों में रिपोर्ट सौंपने की बात कर संदेहों के दलदल में धंसी सीबीआई की साख को बचाने की कोशिश की है।

आरोप की परिणति जांच है। और जांच अगर विभाग करता तो तय है संदेह का धुंआ और काला होता। ये आरोप पुख्ता होता कि सरकार अपने तरीके से सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है या अगर सुप्रीम कोर्ट यदि नियमों के आधार पर आलोक वर्मा के अधिकार छीने जाने को गलत ठहरा, उनके अधिकार वापस करवाती, तो कीचड़ सुप्रीम कोर्ट पर आता कि विरोधियों के दबाव में है सुप्रीम कोर्ट।

यह हमारे लोकतंत्र का सबसे खतरनाक और अन्धकार भरा समय है, जब लोकतंत्र के सारे मंदिर स्वार्थ और दबाव के गर्त में जाते दिख रहे हैं। नैतिकता हर जगह कचरे के डब्बे में डाल दी गयी है और जोड़ तोड़ का गणित सत्ता संचालन का मूल फ़ॉर्मूला बन गया है।

देश के सुदूर गाँवों में बसी जनता ही नहीं, महानगरों के प्रबुद्ध भी भ्रमित हैं। समझ नहीं आ रहा क्या किया जाय ? जनहित और जनतंत्र को कैसे बचाया जाय?

1977 के बाद कांग्रेस भी उद्योगपतियों को टुकड़े टुकड़े में देश बेचती रही और मोदी सरकार ने भी उसी सड़क को और विस्तार दिया है। ऐसा लगता है, जैसे सरकार जनहित के बजाय उद्योगपतियों के हित के लिए ही बनती है। जनता के लिए भाषण और सस्ता राशन है, जबकि उद्योगपतियों के लिए लाल कालीन और देश की संपत्ति।

नेहरू ने आजादी के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाने का ख्वाब औद्योगिकीकरण के रास्ते देखा था, इसलिए पूरे देश में सरकार ने उद्योग धंधे लगाए और उद्योगपतियों को भी ज्यादा से ज्यादा उद्योग लगाने के लिए प्रेरित किया। आम आदमी के हिस्से नौकरियाँ और सब्सिडी ही तय की गयीं।

ग्लोबलाइजेशन के बाद जब नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में पूंजीवाद की नाव पर देश को सवार किया, तो देश में किसकी क्या हैसियत है, ये और भी खुलकर आ गया। और अपने जनतंत्र से आस लगाए थोड़े पढ़े लिखों को भी अब यह समझ में आने लगा है कि हमारे देश पर पहला हक़ उद्योगपतियों का है, फिर नेताओं और नौकरशाहों का और फिर दलालों का। आम आदमी के हाथ सिर्फ खुरचन है।

उम्मीद थी संघ और बीजेपी, जो राष्ट्र की बात करते नहीं थकते, शासन की दिशा बदलेंगे, लेकिन दुखद स्थिति ये है कि ये कांग्रेस से भी तीन कदम आगे है। वाजपेयी सरकार में सिर्फ प्रमोद महाजन ही विलेन दिखते थे, यहाँ तो पूरी जमात ही विलेन दिख रही है।

निकट भविष्य में देश की शासन व्यवस्था बदलेगी, ऐसा दिख नहीं रहा, किसी को कांग्रेस के गांधी नेहरू से बदला लेकर हिन्दू राष्ट्र बनाना है तो किसी को देश लूटकर अय्याशी करनी है। और जनता भी अलग अलग बाड़े में खड़े होकर नारे लगा रही है।

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