सीएम हेमंत ने पीएम मोदी को दिया बड़ा झटका,कॉमर्शियल माइनिंग पर लगाया ब्रेक, मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

INR / नारायण विश्वकर्मा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोरोना कालखंड में जल्दबाजी में लिये गये फैसले पर हेमंत सरकार ने ब्रेक लगा दिया है। प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी परियोजना कॉमर्शियल माइनिंग को लेकर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शायद एक रणनीति के तहत कुछ दिन पहले कॉमर्शियल माइनिंग को लेकर केंद्र के प्रस्ताव को सिद्धांततः मान लिया था। अखबारों में यह खबर भी आयी कि इस संबंध में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री को पत्र भेज दिया है।

उस पत्र में यह भी जिक्र था कि कोरोना के कारण बरसात के बाद इसपर काम शुरू किया जा सकता है। हालांकि इससे पूर्व उन्होंने कॉमर्शियल माइनिंग पर सख्त ऐतराज जताया था।

कहा था कि क्यों न खनन का अधिकार जमीन मालिकों को ही दे दिया जाये। लेकिन अचानक 20 जून को अखबारों में यह खबर आयी कि 18 जून को इस मामले को लेकर झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गयी है।

19 जून को सोशल मीडिया के कई न्यूज पोर्टल पर हमने लिखा कि कॉमर्शियल माइनिंग पर पहले हेमंत सरकार की ना थी, फिर हां क्यों हो गयी?’ जानकारी नहीं मिल पाने के कारण स्वाभाविक रूप से यह गलती हो गयी। इसके लिए हमें खेद है।

अब ये खबर है कि झारखंड सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 18 जून को लांच की गयी केंद्र की महत्वाकांक्षी परियोजना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। प्रधानमंत्री ने कॉमर्शियल माइनिंग के लिए 41 कोल ब्लॉक की वर्चुअल नीलामी की घोषणा की थी।

झारखंड सरकार ने अपनी याचिका में कोयला मंत्रालय को कोयला खदानों की प्रस्तावित नीलामी रोकने का निर्देश देने की मांग की है।

‘निर्यातक हम क्यों नहीं बन सकते?’

झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी है कि वैश्विक महामारी कोरोना की स्थिति में बाजार मूल्य नहीं मिलेगा और आदिवासी कोयले की खानों के वाणिज्यिक दोहन से तबाह हो जाएंगे।

दायर याचिका में, राज्य सरकार ने कहा कि नीलामी का फैसला अवैध था, क्योंकि खनन कानून को संशोधित करने के लिए समुचित आधार तैयार नहीं किया गया था।

राज्य में विशाल जनजातीय आबादी और विशाल वन भूमि पर प्रतिकूल सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव का उचित मूल्यांकन करने में केंद्र सरकार विफल रही है।

याचिका में सवाल उठाया गया है कि अगर भारत दुनिया में चौथा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक है, तो हम सबसे बड़े निर्यातक क्यों नहीं बन सकते?

‘मोदी सरकार का नापाक मंसूबा सफल नहीं होगा’

सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित नीलामी रोकने के मामले पर कोयला श्रमिक संगठनों ने झारखंड सरकार के इस कदम की सराहना की है।

इंटक माइनिंग फेडरेशन के अध्यक्ष जयमंगल सिंह उर्फ अनूप सिंह ने कहा है कि कोलियरी के राष्ट्रीयकरण को निजीकरण में तब्दील करने की रणनीति पर चोट करना जरूरी है।

मोदी सरकार का यह नापाक मंसूबा कभी सफल नहीं होने दिया जायेगा। शुक्र है झारखंड के मुख्यमंत्री ने आदिवासी हितों और वन भूमि की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

उन्होंने कहा कि कोलियरी के राष्ट्रीयकरण के बाद लाखों लोगों ने अपनी जमीन गंवायी, लेकिन आज 50 साल बाद भी लोगों को अपनी जमीन के मुआवजे का इंतजार है। हजारों विस्थापितों को नौकरी नहीं मिली। लाखों परिवार उजड़ गये।

केंद्र सरकार ने इस मामले में कभी कोल इंडिया से जवाबतलब करने की जहमत नहीं उठायी। बीसीसीएल, सीसीएल या ईसीएल प्रबंधनों ने पास विस्थापितों के सही आंकड़े तक मौजूद नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि जब कोलियरियों में कोल माफियाओं का बोलबाला था और मजदूरों का भविष्य अंधकारमय था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कोलियरियों का राष्ट्रीयकरण किया था।

उनकी दूरदर्शिता के कारण ही कोलियरी क्षेत्रों में गुरबत की जिंदगी गुजार रहे लाखों गरीब मजदूरों को न्याय मिल पाया था। उनके साहसिक कदम को आज मोदी सरकार मटियामेट करने पर आमादा है।

उन्होंने कहा कि झारखंड के तमाम श्रमिक संगठन और हेमंत सरकार इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। जुलाई माह की प्रस्तावित तीन दिवसीय हड़ताल में मोदी सरकार को करारा जवाब मिलेगा।

उल्लेखनीय है कि नीलामी प्रक्रिया में झारखंड की 22 कोयला खदानें शामिल हैं। यानी 41 कोल ब्लॉक में से आधे झारखंड के कोयला क्षेत्र नीलामी की भेंट चढ़ जायेंगे। वैसे इस नीलामी पर राज्य के खाते में करीब 90 हजार करोड़ रुपये आने की उम्मीद जतायी गयी है।

यह राशि रॉयल्टी के अलावा खनिज विकास कोष में कंपनियों के अंशदान के रूप में मिलेगी। अनुमान के तौर पर 22 खदानों से लगभग 3 हजार करोड़ रुपये हर साल झारखंड सरकार के खजाने में आयेंगे।

खदानों के नीलाम होने पर राज्य में लगभग 30 हजार लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिलने की संभावना भी जतायी गयी है।

बहरहाल, अचानक सुप्रीम कोर्ट में कॉमर्शियल माइनिंग पर रोक की मांग को लेकर दायर याचिका से यह मामला अब केंद्र-राज्य सरकारों के बीच प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। अब इस मामले में केंद्र सरकार क्या रुख अपनाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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