कोरोना कालखंड का ऐतिहासिक सच

“जब इंसाफ का देवता

‘धृतराष्ट्र’ और

तुषार मेहता उनका

‘संजय’ बना रहा…

INR (नारायण विश्वकर्मा)। सुप्रीम कोर्ट में प्रवासी मजदूरों के मामले में एक्सपोज होने के बाद सॉलिसीटर तुषार मेहता बौखला गये हैं। कोर्ट में उनके बोलने का अंदाज ही जुदा था। उनकी भाषा शैली भी आपत्तिजनक थी। हाल ये था कि उन्हें अपने पद की गरिमा तक का भी ख्याल नहीं रहा।

दरअसल प्रवासी मजदूरों के सवाल पर देश भर में केंद्र सरकार की फजीहत हो रही थी। उसमें सुप्रीम कोर्ट भी कटघरे में खड़ा नजर आ रहा था। वहीं राज्यों के कई हाईकोर्ट प्रवासी मजदूरों के साथ खड़ा नजर आया। सोशल मीडिया के कई पत्रकार केंद्र सरकार को आईना दिखा रहे थे।

खास तौर पर कुछ पूर्व जज और एक्टिविस्टों ने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सख्त नाराजगी जतायी थी। इसकी वजह से केंद्र के पाले में बैठे सुप्रीम कोर्ट की किरकिरी हो रही थी। ये सब तुषार मेहता को गंवारा न था।

विडंबना देखिये कि इसके बावजूद प्रवासी मजदूरों के बारे में तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में सफेद झूठ बोलने से बाज नहीं आये। लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट में न सिर्फ उनका झूठ बेनकाब हुआ, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों को मजदूरों के हित में कई दिशा-निर्देश जारी कियेे।

आपको याद होगा कि मैंने पिछले दिन ‘हाकिमों को शायद उस खत ने झिंझोड़ा होगा..!’ शीर्षक से जिस पत्र का जिक्र किया था, वह सच साबित हुआ।

ऐसे में अहम सवाल है कि केंद्र की नुमाइंदगी करनेवाले साॅलिसीटर तुषार मेहता ने सोशल मीडिया के पत्रकार समूह, हाईकोर्ट और पूर्व जजों के बारे में जिस तरह की अमर्यादित टिप्पणी की है, क्या उन पर विधि सम्मत कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

क्या उनके खिलाफ अवमानना का मामला नहीं बनता है? सुुुप्रीम कोर्ट में उनका सफेद झूठ उजागर होने के बाद क्या उन्हें अपने पद पर बने रहने का हक है? क्या अपने पद और प्रतिष्ठा के अनुरूप उन्होंने केंद्र की नुमाइंदगी की?

आखिर उन्होंने किस आधार पर कोर्ट में यह बयान दे दिया कि (31 मार्च) देश में कहीं भी मजदूर सड़क पर नहीं है और कोरोना को अच्छी तरह से केंद्र सरकार हैंडल कर रही है।

इसलिए इस मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है। क्यों न्याय के मंदिर में बैठे ‘धृतराष्ट्र’ ने तुषार मेहता को ही ‘संजय’ मान कर फैसला लिया? ये है न्यायिक इतिहास का काला अध्याय।

तुषार मेहता की हठधर्मिता देखिये, वह सुप्रीम कोर्ट में शब्दों की मर्यादा भूल जाता है। उन्होंने आलोचकों को ‘गिद्ध’ बताने जुर्रत की। यानी मुर्दे नोंच कर खानेवाले चील पक्षी।

उन्होंने आलोचकों को नकारात्मक सोच वाला बता दिया। उनका कहना था कि सरकार बेहतर काम कर रही है लेकिन उनके आलोचक नकारात्मकता फैला रहे हैं।

दरअसल, ऐसे लोग तुषार मेहता के निशाने पर थे, जो लगातार सच्चाई सामने लाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें मुख्य रूप से न्यायिक बिरादरी से आनेवाले पूर्व जज मार्केंडेय काटजू, मदन वी लोकुर और गोपाल गौड़ा जैसे लोग शामिल थे।

ये लोग लगातार सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सवाल उठा रहे थे। पूर्व जज गोपाल गौड़ा की तल्ख टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट मजबूर हुआ और सरकार के खिलाफ बोलना पड़ा तो तुषार मेहता तिलमिला उठे।

उनके बौखलाने का दूसरा कारण था हाईकोर्ट। हाईकोर्ट ने जिस तरह से प्रवासी मजदूरों को लेकर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किये। उन्होंने कोर्ट में कह दिया कि हाईकोर्ट इस तरह से व्यवहार कर रहा है जैसे वो समानान्तर सरकार चला रहा हो।

हालांकि तुषार मेहता का यह वक्तव्य कोर्ट की आवमानना है। तुषार मेहता सोशल मीडिया पर भी भड़का हुआ था। चूंकि गोदी मीडिया मैनेज था।

गोदी मीडिया के प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के संपादकों और कुछ दुलरुए टीवी योद्धाओं को बुलाकर कहा गया था कि सरकार के पक्ष में पोजिटिव खबरों पर ही फोकस करें।

लेकिन सोशल मीडिया मैनेज नहीं था। सोशल मीडिया के पत्रकार ग्रुप और कुछ स्वतंत्र पत्रकार केंद्र सरकार को एक्सपोज कर रहे थे। भड़के तुषार मेहता ने सोशल मीडिया को ही गिद्ध की संज्ञा दी।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया में गरीब मजदूरों की बात कर रहे हैं वो गिद्ध हैं और ‘कयामत के पैगम्बर’ हैं। उन्हें सच्चाई नजर नहीं आ रही है, जबकि केंद्र सरकार मजदूरों को खाना खिला रही है। उनका ख्याल रख रही है।

सुप्रीम कोर्ट कई मुद्दों पर केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठा रहा था और तुषार मेहता अपनी कठदलीली पर उतारू थे।

तुषार मेहता की दलील थी कि जो गरीब मजदूर ट्रेन के टिकट के पैसे दे रहा है वे या तो जिस राज्य से वो चल रहा है, और जोे राज्य को वो जा रहा है, वो पैसे दे रहा है।

वहीं, रेलवे बोर्ड के चेयरमैन ने कहा था कि हम मजदूरों से पैसे इसलिए ले रहे हैं क्योंकि मजदूर कहीं ऐसे ही रेलवे स्टेशन नहीं पहुंच जाये। यह हास्यास्पद दलील थी।

वहीं दूसरी ओर टीवी पर भाजपा के प्रवक्ता कह रहे थे कि जो मजदूर घर जा रहा है, केंद्र उससे पैसे नहीं ले रहा है, जबकि उन्हें टिकट के पैसे देने पड़ रहे थे। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा था कि 85 फीसदी भारत सरकार पे कर रही है।

तुषार मेहता को कोर्ट में स्वीकार करना पड़ा कि हम पैसे नहीं दे रहे थे। तमाम गोदी मीडिया और भाजपा का प्रचार तंत्र 85-15 का खूब राग अलापा।

इसके अलावा स्वयं रेलमंत्री पीयूष गोयल ने एक खबरिया चैनल पर कहा कि 85 फीसदी अगर हम किराया नहीं लेते तो मजदूर स्टेशन पर अराजकता फैला सकते थे। भीड़ बेकाबू हो जाती, जिससे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन सही ढंग से नहीं हो पाता।

सुप्रीट कोर्ट ने तुषार मेहता की कठदलीली को ठुकराते हुए दूसरी बार सूमोटो लिया और कहा कि जो प्रवासी सड़क पर चल रहा है सरकार उसके लिए कुछ करे, जबकि पूर्व के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इससे अपना पल्ला झाड़ लिया था और कह दिया था कि यह राज्य सरकार का मामला है।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जब भी राज्य सरकारें ट्रेनों के लिए अनुरोध करती है रेलवे को उन्हें मुहैया कराना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रवासी मजदूरों को संबंधित राज्य द्वारा उन स्थानों पर भोजन उपलब्ध कराया जायेगा, जिन्हें प्रचारित और अधिसूचित किया जायेगा।

इसका मतलब ये हुआ पहले आप मजदूरों को भोजन-पानी नहीं दे रहे थे।

यह भी कहा गया कि ट्रेन यात्रा के दौरान, जहां से यात्रा शुरू होती है वो राज्य सरकार मजदूरों को भोजन-पानी उपलब्ध करवाये। बसों में भोजन और पानी भी उपलब्ध कराया जायेगा।

हर सरकार अपने दोष को छुपाना चाहती है। उन्हें अपना दामन कभी दागदार नहीं लगता। वो हर समय अपने दामन को पाक-साफ बताने की फिराक में रहता है।

बहरहाल, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि राष्ट्रीय आपदा की इस घड़ी में सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के रवैये पर कड़ी निगरानी रखेगा और सिस्टम को दुरूस्त करेगा।

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