शायद हाकिमों को उस खत ने झिंझोड़ा होगा..!

109

“विलंबित न्याय प्रणाली पर एक बार फिर वही राग छेड़ना पड़ा….‘हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी….! अंततः हमें यह भी मानना पड़ेगा कि न्यायिक व्यवस्था के तहत ही सरकारें प्रभावित होती हैं। वरना सरकारी सिस्टम की सड़ांध से मुल्क को बचाना मुश्किल होगा…”

 नारायण विश्वकर्मा / INR डेस्क

आखिरकार दो महीने खून से लथपथ और त्रासदी भरे सफर से कारवां गुजर जाने के बाद हमारी न्यायिक व्यवस्था जम्हाई लेते हुए आंखें खोलती हैं। लेकिन इसमें भी संदेह है कि आंखें खुद खुल गयीं या खोली गयीं।

मुझे ऐसा आभास होता है कि संभवतः ‘हाकिमों’ को उस खत ने नींद से झिंझोड़ा होगा, जो कुछ दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट के 20 वरिष्ठ वकील और कुछ एक्टिविस्टों ने सुप्रीम कोर्ट को लिखा था। 

प्रवासी मजदूरों पर आई घोर विपदा और राष्ट्रीय आपदा की इस घड़ी में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिये गये हालिया फैसले और उनके रवैये पर वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ सख्त एतराज किया था।

पत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि देश की इस विकट परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के साथ खड़ा है, जबकि उसे जनहित के पक्ष में बतौर अभिभावक की भूमिका में खड़ा होना चाहिए था।

पत्र में उन दो मामलों का भी बेबाकी से जिक्र किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों की समस्याओं पर न्यायोचित फैसला नहीं दिया था।

ज्ञात हो कि 31 मार्च को प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को लेकर दायर याचिका की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से ही इंकार कर दिया। केंद्र सरकार की ओर जो दलील पेश की गयी थी, उसी को सही मान लिया गया था।

सॉलिसीटर तुषार मेहता की यह दलील कि प्रवासी मजदूर हाइवे पर पैदल नहीं चल रहे हैं। ऐसा केंद्र सरकार के गृह सचिव ने उन्हें बताया था। जो लोग दिखे हैं, उसे पास के शेल्टर होम ले जाया गया और खाने-पीने का पैकेट दिया जा चुका है।

इस संबंध मेंं वकीलों की दलील है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च को ही दखल दिया होता तो मई माह के प्रथम सप्ताह में प्रवासी मजदूर इस कदर सड़कों पर बेबस नजर नहीं आते। उस वक्त देश में 50 हजार कोरोना के मरीज आ चुके थे।

यानी एक तरफ कोरोना के मरीज बढ़े तो दूसरी तरफ लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर सड़कों पर चले जा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट अगर 31 मार्च को ही केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदेही तय कर देता तो लाखों प्रवासी मजदूरों के समक्ष विकराल समस्या नहीं खड़ी होती।

इसी तरह 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में दूसरी याचिका का भी पत्र में जिक्र किया गया है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अपील की गयी थी कि जिलों में जो जिलाधिकारी हैं, उनको हिदायत दी जाये कि वे प्रवासी मजदूरों का रजिस्ट्रेशन करें और उन्हें हर हाल में सही-सलामत घर पहुंचाने की व्यवस्था करें।

इसपर सुप्रीम कोर्ट की दलील को हास्यास्पद माना गया। पत्र में कहा गया कि अगर कोई रेलवे ट्रैक पर चला जा रहा है, तो कोई कैसे उन्हें रोक पायेगा? जो लोग सड़कों पर चले जा रहे हैं, उसकी मॉनिटरिंग कैसे की जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आप लोग अखबारों के अंदर की खबरों को पढ़कर चले आते हैं। अपने आपको बहुत काबिल समझते हैं और उसके आधार पर कोर्ट से उम्मीद करते हैं कि कोई फैसला दे दे। इसके लिए कोर्ट आपको स्पेशल पास जारी कर देगा, आपलोग राज्य सरकारों से चीजों को इंप्लीमेंट कराने की कोशिश करें।

उसी दौरान उधर, मद्रास हाईकोर्ट ने प्रवासी मजदूरों के मामले में तमिलनाडू सरकार को कड़ी फटकार लगायी थी। तमिलनाडू सरकार से 12 प्वाइंट पर जवाब मांगते हुए हाईकोर्ट ने सभी जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया था।

मद्रास हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रवासी मजदूरों की हालत देखकर आंखों में आंसू आ जाते हैं। कुछ इसी तरह की उम्मीद लोग सुप्रीम कोर्ट से कर रहे थे।

पत्र में इस बात हवाला दिया गया कि आखिर कोर्ट केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदेही क्यों नहीं तय कर रहा है? केंद्र सरकार प्रवासी मजदूरों के मसले को पाॅलिसी डिसीजन बता रही थी।

वकीलों का कहना था कि ये सिर्फ पाॅलिसी डिसीजन का मसला नहीं है। जब लोगों की नौकरियां, उनकी स्वतंत्रता, उनका जीवन खतरे में हो तो यह मसला सिर्फ पॉलिसी डिसीजन का नहीं रह जाता। ये मौलिक अधिकार का हनन है।

नागरिकों को जो समानता का अधिकार मिला है, अगर उसपर आंच आती है, तो इसे सरकार की नीति कहकर नहीं टाला जा सकता। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19ए या फिर 21 से जुड़ जाता है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की नीति समझकर जो फैसला लिया, उसे सही नहीं कहा जा सकता। ऐसे फैसले को न्यायसंगत कैसे माना जाए, जब लाखों मजदूर पैदल सड़कों पर भूखे-प्यासे जीते-मरते चले जा रहे हैं और अपनी जान भी गंवा रहे हैं। ये देशव्यापी संकट की घड़ी है।

ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट को अभिभावक की भूमिका निभानी चाहिए। स्वतः संज्ञान लेकर सरकारों को दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए।

पत्र में कहा गया कि ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक भूमिका का निर्वहन नहीं करता है तो भारत का लोकतंत्र कैसे बचेगा और कानून का शासन कैसे स्थापित रहेगा?

पत्र में कांगे्रस नेता कपिल सिब्बल, पी.चिदंबरम के अलावा एक्टिविस्ट लोगों में आनंद ग्रोवर, इंदिरा जय सिंह, संतोष पॉल, सिद्धार्थ लूथरा, विकास सिंह, जनक द्वारका दास, महालक्ष्मी पौनी आदि वरिष्ठ वकीलों के हस्ताक्षर हैं।

पूर्व जज गोपाल गौड़ा की तल्ख टिप्पणीः सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज गोपाल गौड़ा ने डेक्कन हेराल्ड में एक काॅलम लिखा है, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर तल्ख टिप्पणी की है। गोपाल गौड़ा ने तो सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर ही सवाल उठा दिया है।

उन्होंने कहा है कि प्रवासी मजदूरों की बेबसी-लाचारी देखकर जब पूरा देश स्तब्ध है, तो ऐसी हालत में सुप्रीम कोर्ट अपने संवैधानिक दायित्व को कैसे भूल गया?

ताज्जुब की बात है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल देने से बचता रहा, बल्कि सरकार से सवाल पूछने से भी गुरेज किया। इसकी वजह से कार्यपालिका को अबतक जवाबदेह नहीं बनाया गया है। और तो और ऐसा तब हो रहा है, जब सरकार अदालत में झूठा बयान दे रही है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट किसी भी तरह की कार्रवाई करने से परहेज कर रहा है।

वे आगे लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट अपने संवैधानिक अधिकारों को खो दिया है, बल्कि समाज के कमजोर तबके के प्रति अभूतपूर्व हृदयहीनता दिखा रहा है।

उन्होंने चीफ जस्टिस के बयान पर आश्चर्य प्रकट करते हुए लिखा है कि सुप्रीम का ये कहना कि जबतक लोगों को खाना मिल जाता है, तबतक उन्हें वेतन देने की जरूरत नहीं है। इस तरह के बयान यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के साथ है।

श्री गौड़ा कहते हैं कि जिस तरह से 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल के समय हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सामने नजीर पेश की थी, आज वही दृश्य उत्पन्न हो गया है। उस समय सुप्रीम कोर्ट वही करता और कहता था, जो केंद्र सरकार चाहती थी।

उसी संदर्भ का हवाला देते हुए श्री गौड़ा ने कहा कि मौजूदा संकट में विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट को नेतृत्व देने में सुप्रीम कोर्ट बहुत पीछे रह गया है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट से बेहतर काम हाईकोर्ट कर रहे हैं।

गुजरात, ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटका, आंध्र प्रदेश के अलावा मद्रास हाईकोर्ट की गौड़ा ने जमकर तारीफ की। श्री गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के रुख को ‘एडीएम जबलपुर’ मामले की पुनरावृत्ति बताया है। जब केंद्र के सामने सुप्रीम कोर्ट ने घुटने टेक दिये थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गैरजिम्मेदाराना हरकत कोरोना कालखंड का काला अध्याय माना जायेगा।

बहरहाल, सुप्रीम के तीन जजों की बेंच ने कमोबेश वकीलों और एक्टिविस्टों द्वारा लिखे गये पत्र के आलोक में ही मजदूरों के हक में फैसला दिया है। 

अब देखना है कि 5 जून को होनेवाली सुनवाई में हाकिमों द्वारा केंद्र और राज्य सरकारों को क्या दिशा-निर्देश मिलता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here