अब भारतीय लोकतंत्र में गाली खाता विपक्ष

पिछले 70 सालों में पूर्ववर्ती सरकारों ने कुछ भी नहीं किया। उन्हें लगता है वे भारत के प्रतीक है। आज इनके शासन में विपक्ष को सवाल करने का हक नहीं है। लोकतंत्र की यही मर्यादा है कि सत्ता से सवाल पूछा जाएं और तीखा सवाल पूछा जाएं।

INR.(जयप्रकाश नवीन)।हुकूमत से एजाज़ अगर चाहते हो, अंधेरा है, लेकिन लिखों रोशनी है” …आज देश के सियासत में शायर निश्तर खानखाही की उक्त पंक्तियाँ सटीक बैठती है। यूँ तो लोकतंत्र में एक कारगर विपक्ष और मीडिया बहुत जरूरी है। इसके बिना हम स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना नहीं कर सकते हैं।

लेकिन जब लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को कुचल दिया जाए, उसकी असहमति को “राष्ट्रवाद” के विरूद्ध बताकर गला घोंट दिया जाएं तब ऐसे लोकतंत्र के क्या मायने हो सकते हैं। राजनीति में विरोधी होते हैं, दुश्मन नहीं। लेकिन यहाँ विपक्ष के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार किया जा रहा है।

पिछले दिनों कांग्रेस सासंद राहुल गांधी ने प्रवासी मजदूरों से बात क्या कर ली, उनकी समस्याओं और पीड़ा  को करीब से क्या जाना केंद्रीय वित्त मंत्री को बहुत नागवार गुजरा।

उन्होंने इसे राहुल गांधी की ड्रामेबाजी करार देते हुए कहा कि राहुल गांधी ने मजदूरों का समय बर्बाद किया। वही जब कांग्रेस के पूर्वांचल प्रभारी प्रियंका गांधी ने प्रवासी मजदूरों के लिए बस की व्यवस्था की तो सत्ता पक्ष इसे राजनीति करना बताया।

वही जब कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पीएम केयर का हिसाब जानना चाहा तो उनपर देश के कई राज्यों में मुकदमे दर्ज हो गए। लोकतंत्र में सवाल, असहमति, मत-मतांतर,विरोध -प्रतिरोध, अभिव्यक्ति प्रदर्शन, धरना-जुलूस, दलील  यह सब प्राण कहा जाता है।

लेकिन आज सत्ता में बैठे लोग अपने प्रचंड बहुमत के मद में चूर हैं।उन्हें विपक्ष और असहमति पसंद नहीं है।यह सब उनके निशाने पर हैं।असहमति के नाम पर ‘राष्ट्रद्रोही’ घोषित किया जा रहा है।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक देश है। भारत स्वंय अपने आप में इतना समृद्ध है कि उसका अस्तित्व किसी संगठन या व्यक्ति के अधीन नहीं रहा है। इस देश में शक, हूण आये, सिकंदर, मुगल आएं, अंग्रेज आएं।

फिर देश आजाद हुआ। पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू आएं, इंदिरा आईं, अटलबिहारी वाजपेयी आएँ, मनमोहन सिंह आएँ और गए अब नरेंद्र मोदी आएं। परंतु भारत अपनी गति से आगे बढ़ता रहा और हर शासक को जिसने अपने आप को भारत से महान अथवा भारत के समकक्ष समझा उसको इस देश ने उसकी हैसियत बताने से परहेज नहीं किया।

इस देश के शासक सता के विलास में इतिहास के सबक भूल जाते हैं। फिर इस भ्रम में जीने लगते हैं वे दुनिया के ताकतवर शासक है। उनका कद देश से जहान से ऊंचा है।

शायद यही भ्रम इंदिरा गांधी को हो गया था। आपातकाल लगाकर और मीडिया को खामोश कर विपक्ष की आवाज दबाने का काम किया। इसी देश ने उन्हें ऐसा सबक सीखाया कि वे अपना अहंकार भूल गयी।

लेकिन देश में फिर परिस्थितियाँ बदली है। संघ की कोख से जन्मी भाजपा की सरकार में विपक्ष को खामोश किया जा रहा है। प्रधानमंत्री को भ्रम हो गया है। देश की तरक्की उनकी ही वजह से हो रही है।

आजादी के पहले भी सवाल किये जाते थें। पश्चिम बंगाल में भीषण अकाल पर भी पंडित नेहरू ने अंग्रेजों से सवाल किया था। अंग्रेज सरकार सुने या न सुने सवाल किया जाता था।

लोकतंत्र में विपक्ष का काम यही है सता पक्ष की नींद हराम किए रहे। लेकिन आज देश में मान्यता एवं परम्परा का भाषण देकर विपक्ष को देशद्रोही कह कर चुप करा दिया जाता है। इसमें सरकार का साथ देश की मीडिया भी दे रही है।भारतीय लोकतंत्र के लिए यह कोई शुभ लक्षण नहीं है।

लोकतंत्र में एक कारगर विपक्ष जरूरी है। जब-जब देश में विपक्ष कमजोर रहा है शासकों की मनमानी बढ़ी है।सता बेलगाम न हो जाएँ इसलिए विपक्ष की भूमिका और जवाबदेही बहुत बड़ी है। जब विपक्ष अपनी छाप नहीं छोड़ पाएँ तो प्रतिपक्ष का स्थान खाली -खाली नजर आता है।

इस शून्यता को कभी सताधारी पार्टी के अंदर से उठती आवाजें भरती थी कभी मीडिया और कभी नागरिक समूह।लेकिन विपक्ष आज मीडिया से महदूद है और मीडिया सत्ता के करीब।एक समय जब विपक्ष कमजोर होता था तो मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती थी आज जब सरकार कमजोर पड़ने लगती है तो मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित अमेरिकी पत्रकार और चिंतक वाल्टेयर लिपमान ने कभी कहा था-“किसी भी संवेदनशील इंसान की तरह एक अच्छा राजनेता हमेशा अपने प्रतिबद्ध समर्थकों से ज्यादा विपक्ष से सीखता है। “

भारत के लोकतंत्र में विपक्ष ने  एक से बढ़कर एक  सम्मानित नेता दिए हैं।डाॅ राममनोहर लोहिया,जयप्रकाश नारायण, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पीलू मोदी, जे बी कृपलानी,अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नंबूदरीपाद,प्रकाश वीर शास्त्री,ज्योति बसु, मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीस, मधु दंडवते, रवि राय,आचार्य नरेंद्र देव,नीतीश कुमार आदि।एक से एक होनहार और तपस्वी नेता रहे हैं।

इन नेताओं ने अपना लंबा समय प्रतिपक्ष में व्यतीत किया और भारत के राजनीतिक फलक पर सितारे की तरह उभरे और चमके। विपक्षी नेताओं के रूप में ये हमेशा प्रवाह के विपरीत चलें और अपना अलग स्थान हासिल किया। ये वो दौर था जब नेता देश सेवा की ललक और जनता के प्रति समर्पित जीवन को लेकर राजनीति में आते थें। न कि किसी क्लब से।

ये नेता अक्सर गांव-कस्बों में घूमते रहते, रेल के सबसे सस्ते डिब्बे में सफर करते दिख जाते या फिर चाय दुकानों पर मिल जाते थें।ये नेता अपने साथ किसी कैमरा वाले को लेकर घूमा नहीं करते थें।

इन नेताओं का नेतृत्व गाँव-देहात, खेत-खलिहान, झोपड़ पट्टी और मलिन बस्तियों की धूसर पगडंडियों से चलकर आता था।जो उनके चेहरे पर भारत की छाप झलकती थी। लेकिन अब ऐसे चेहरे न विपक्ष में हैं और न ही सत्ता पक्ष में।

ब्रिटेन के दो बार प्रधानमंत्री रह चुके बेंजामिन डिजरायली कहते थें-“कोई भी सरकार एक मजबूत विपक्ष के बिना लंबे समय तक नहीं चल सकती है।”

देश की ज्वलंत मुद्दों नोटबंदी,जीएसटी, एनआरसी -का,भ्रष्टाचार,बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था और कोरोना महामारी, प्रवासी मजदूरों की पलायन की भयावह स्थिति से संबंधित कई मुद्दे विपक्ष के सामने हैं लेकिन विपक्ष इन मुद्दों पर चुप है। नागरिक चुप है।

सता से सवाल नहीं कर सकते क्योंकि वे जानते हैं न मीडिया उनकी आवाज सुनेगा न सत्ता पक्ष उलटे उसे देशद्रोही घोषित कर दिया जाएगा।उनके शासन काल पर अंगूली उठा दी जाएगी।गाली से नवाज दिया जाएगा।लोकतांत्रिक देश में विपक्ष की आवाज दबाना दुखद स्थिति है।

सरकार देश के लोकतंत्र से भी बड़ी हो चुकी है कि विपक्ष उनसे सवाल नहीं कर सकता है।लोकतंत्र का कमाल रहा है कि इसमें प्रधानमंत्री का भी उतरदायित्व है और चाहे वो पंडित नेहरू रहे हो या अटलबिहारी या फिर नरेंद्र मोदी। जब कभी भी जो प्रधानमंत्री रहा है उससे सवाल किया गया है।

उस समय भी जब अटलबिहारी 1957 में पहली बार लोकसभा में आकर उन्होंने पंडित नेहरू से प्रश्न पूछा होगा। लेकिन पंडित नेहरू ने उन्हें देशद्रोही नहीं बताया। पंडित जवाहरलाल नेहरू हमेशा विपक्ष के काबिल नेताओं को भारत का प्रतिनिधि बनाकर विदेश भेजा करते थें।

बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी भी इसका पालन करती रही। जिसका उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सहित कई नेता रहे हैं। बाद में राजीव गांधी के भी विपक्षी नेताओं के साथ मधुर संबंध रहे हैं।

राजीव गांधी ने अपने रिकॉर्ड प्रचंड बहुमत के बाबजूद जो शालीनता दिखाई वह आज के नेताओं में संभव नहीं है। दुनिया में कई ऐसे उदाहरण है, जहाँ विपक्ष ने अपने विरोधी नेताओं को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी।

अब्राहम लिंकन हो या फिर हाल ही में नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रुईटे ने लेबर पार्टी के एक सासंद को मार्टिन वान रिन को स्वास्थ्य मंत्री बनाकर विश्व के देशों के लिए अकल्पनीय उदाहरण पेश किया है।

क्या भारत की राजनीति इस उदाहरण से कोई सीख ले सकती है। जबाब आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में संभव नहीं दिखता है। वो भी एक एक दौर था, जब नेतृत्व का निर्माण सीने की नपाई से नहीं, बल्कि विचारों की अभिव्यक्ति से होती थी।

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