विन्सेंट वान गॉग की ‘पोटैटो ईटर्स’ बना बिहार का मज़दूर

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अभी सिर्फ़ रोटी, चावल, नमक, प्याज़ और आलू दो वक्त खा रहे हैं, कुछ दिनों बाद भूखों मरेंगे। हम भी मरेंगे और बच्चा सब भी मर जाएगा। सरकार ने सिर्फ़ गेंहू चावल दिया है तो वही खा रहे हैं। बाकी यहां कोई काम धंधा नहीं है, उल्टे गांव वाला कोरोना कोरोना कहकर भगा देता है।

बीबीसी हिंदी के पटना संवाददाता सीटू तिवारी

43 साल के मोहम्मद तसीर मज़दूर हैं। वो राजस्थान में अलवर के भिवाड़ी से पैदल चलकर बिहार के मधुबनी ज़िले के लौकही प्रखंड स्थित अपने गांव ककरडोभ पहुंचे हैं।

वो कहते हैं, “पांव फूल गया, पैर में फोड़ा भी हो गया था। रास्ते में कई दिन भूखे रहे और कई दिन खाना पीना मिला।”

सात सदस्यों वाला मोहम्मद तसीर का पूरा परिवार अनपढ़ है और सिर्फ़ उनकी बेग़म का बैंक अकांउट है।

भिवाड़ी में रोज़ाना 8 घंटे की मज़दूरी करके 250 रुपये कमाने वाले तसीर अपने परिवार को हर महीने 3000 रुपये भेजते थे।

कैसे भेजते थे? मेरे इस सवाल पर उन्होंने कहा, “भिवाड़ी में बहुत सारे मज़दूर ककरडोभ के हैं। कोई न कोई आता-जाता रहता है। उसी के हाथ पैसा भिजवाते थे।”

ककरडोभ गांव के मोहम्मद तसीर सहित 5 लोग पैदल भिवाड़ी से आए हैं। इनमें से 30 साल के मोहम्मद मुबारक और 44 साल के राज कुमार राम से भी बीबीसी ने फ़ोन पर बात की।

30 साल के मुबारक के तीन छोटे बच्चे हैं। वो बताते हैं कि उन्हें याद ही नहीं कि उन्होंने अपने बच्चों के लिए कभी ईद में कपड़े ख़रीदे हों। क्वारंटीन सेंटर से छूटने के बाद बेरोज़गार बैठे मुबारक कहते हैं, “खाने को नहीं है तो ईद क्या मनेगी? सरकार से चावल मिला है। वो जब ख़त्म हो जाएगा तो जीना मरना अल्लाह की मर्जी से होगा।”

इन तीनों मज़दूरों में राज कुमार राम के आर्थिक हालात थोड़े बेहतर हैं। वजह ये कि उनका 18 साल का बेटा भी काम करता है।

राज कुमार के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। उनके पास बैंक खाता भी है और घर में कुछ अनाज बचा हुआ है।

अब तक गुजरात, लुधियाना, झारखंड, दिल्ली में मज़दूरी कर चुके राजकुमार बताते हैं, “अब तक हमें सरकार की तरफ़ से कोई रोज़गार नहीं मिला है। बाकी कोई पैसा भी नहीं मिला है क्योंकि हमें फ़ोन से फॉर्म भरना नहीं आता है।”

घर का कर्ज़ और गर्म छड़ः मधुबनी ज़िले से तकरीबन 100 किलोमीटर सुपौल ज़िले के मंझौल गांव के सुबोध मंडल के हाथ की चोटें ठीक हो गई हैं। वो रायपुर के एक सरिया प्लांट में गर्म सरिया की छड़ का बंडल बनाते थे।

वे कहते हैं, “हाथों में दस्ताना रहता है, हाथ कई बार जल जाता है, लेकिन सारे मुश्किल काम बिहारी ही करता है।”

22 साल के मैट्रिक पास इस नौजवान लड़के पर पिता की हृदय की बीमारी के चलते चार लाख रुपये का कर्ज़ है।

रायपुर में गर्म सरिया का बंडल बनाकर रोजाना 500 रुपये कमाने वाले सुबोध बेचैन होकर बार बार मुझसे फ़ोन पर पूछते हैं, “मनरेगा में सरकार कितने रुपये देगी?”

मैं जवाब देती हूं, “न्यूनतम मज़दूरी से भी कम, 194 रुपये जिसे इसी अप्रैल माह से बढ़ाया गया है।”

सुबोध निराशा से कहते हैं, “इतने में क्या होगा, कर्ज़ा देने वाला तो रोज़ पैसे मांगने आता है।”

भारत में कोरोनावायरस के मामलेः यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें…

रायपुर से कभी ट्रक के सहारे और कभी पैदल चलकर अपने गांव 2 मई को पहुंचे सुबोध का क्वारंटीन पूरा हो गया है। लेकिन उन्हें न तो जॉब कार्ड मिला और न ही किसी तरह का दूसरा रोज़गार।

उन्होंने कोरोना सहायता के लिए फॉर्म भी भरे हैं लेकिन अभी तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली है।

कुछ काम मिलता तो पैसे आतेः मैंने अपने साथी राजू हेम्ब्रम को जब नवीन सोरेन के घर भेजा तो दोपहर चढ़ी थी। मधेपुरा के गवालपाड़ा के नवीन सोरेन निर्माण मज़दूर हैं। वे लॉकडाउन के वक्त उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में काम कर रहे थे। अपने 71 साथियों के साथ वो ट्रक से अपने गांव पहुंचे हैं।

4 बच्चों के पिता नवीन बताते हैं, “सरकार से 5 किलो राशन प्रति व्यक्ति मिला है, लेकिन खाना पीना परिपूर्ण नहीं हो पा रहा है।”

27 अप्रैल को एमवीएन कॉलेज से अपना क्वारंटीन पूरा करके निकले नवीन बताते हैं, “बेरोज़गार बैठे हैं। बंदी (लॉकडाउन) ख़त्म नहीं होगी तो बच्चों की पढ़ाई लिखाई और खाना पीना सब ख़त्म हो जाएगा। यहां काम मिलता तो कुछ पैसे आते।”

सरकार के दावेः लॉकडाउन के बाद बिहार में 19 मई तक सिर्फ़ ट्रेन और बस से 6 लाख से ज़्यादा प्रवासी श्रमिकों को लाया जा चुका है। राज्य सरकार का अनुमान है कि मई माह के अंत तक कुल 12 लाख और श्रमिकों की वापसी होगी।

इन प्रवासी श्रमिकों के लिए श्रम नीति तैयार करने की बात सरकार लगातार कर रही है लेकिन इस पर अब तक कुछ भी ठोस नहीं हो पाया है।

गांव वापस लौटने की कोशिश करते मज़दूरों की कहानीः मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 21 मई को भी निर्देश दिया है कि रोज़गार देने के लिए टास्क फोर्स बिना किसी देरी के कार्य शुरू करे।

इस बीच सरकार ने मनरेगा से जुड़े काम में बिहार के अलग अलग हिस्सों में तेज़ी तो लाई है, लेकिन श्रमिकों की एक बड़ी आबादी के पास न तो जॉब कार्ड है और न ही उन्हें मनरेगा से कोई काम मिला है।

बिहार सरकार ने केन्द्र सरकार से मनरेगा के 100 कार्यदिवस को बढ़ाकर 200 करने का अनुरोध किया है।

जीवंत हो उठा पोटैटो ईटर्सः 1885 में नीदरलैंड के प्रसिद्ध पेंटर विन्सेंट वॉन गॉग ने एक पेंटिंग बनाई थी। इसमें पांच लोगों को आलू खाते और कॉफी पीते दर्शाया गया था। गहरे रंगों का इस्तेमाल करके इसमें ग्रामीण जीवन की दुश्वारियों का बखूबी चित्रण किया गया था।

कोरोना वायरस की वजह से महानगरों और बड़े शहरों से देश के सूदूर क्षेत्रों में अपने घरों के लिए सफ़र पर निकले और वहां पहुंच कर आगे के जीवन को लेकर उनकी हताशा बहुत हद तक विन्सेंट वॉन गॉग की इस पेंटिंग में दर्शाए गए खुरदुरे चेहरे वाले दुबले पतले किसानों और उनके चोटिल मेहनतकश हाथों की याद दिलाते हैं। (साभारः पटना से बीबीसी हिंदी के लिए सीटू तिवारी की ताजा रिपोर्ट)

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