कोरोना से खुली केंद्रीकृत विकास की पोल, बदलना होगा मौजूदा विकास मॉडल

0
239

INR(नवीन शर्मा). कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देश में 50 दिनों से अधिक समय से लॉकडाउन चल रहा है। लॉकडाउन की वजह उद्योग धंधे और अधिकतर कामकाज बंद होने के कारण सामान्य मजदूर और स्किल्ड वर्कर भी अपने घरों को लौटने को मजबूर हैं। अब इसमें सबसे बड़ी परेशानी ये हो रही है।

23 मार्च से ही आवागमन के सारे माध्यम विमान, रेल और सड़क यातायात पूरी तरह बंद कर दिया गया था। इस कारण लाखों मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल, साइकिल या मालवाहक ट्रकों में भेड़ बकरियों की तरह लदा कर किसी तरह घर पहुंच रहे हैं।

इनके घर लौटने की जद्दोजहद इस भीषण गर्मी के मौसम में कई लोगों की जिंदगी का सफर बीच रास्ते में ही खत्म कर दे रही है। गर्भवतियों और बच्चों की मीलों पैदल चलने की तस्वीरें दिल दहलाने वाली हैं। अभी एक मई से कुछ श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलनी शुरू हुई और उनसे ये प्रवासी कामगार घर लौट रहे हैं।

आज जो उथल-पुथल का दौर चल रहा है उसने हमारा ध्यान इस बात कि तरफ भी दिलाने की कोशिश की है कि हम एक बार गंभीरता से उस मॉडल पर भी विचार कर लें जिस पर हम अंग्रेज़ों की गुलामी के दौर से लेकर आज तक चलते आए हैं।
इस स्थिति में हमें जबरदस्ती धकेल देने के लिए हमें इस नामुराद कोरोना को धन्यवाद देना होगा। आपको अजीब लग सकता है कि जो कोरोना वायरस लाखों लोगों की जान ले रहा हो उसे थैंक्यू क्यों कहें तो मेरा मानना है कि कोरोना ने ही हमारी हाई स्पीड में चल रही विकास की ट्रेन में अचानक से पॉवर ब्रेक लगा दिया है।

ताकि हम जरा ठहर कर शांति से विचार विमर्श कर सकें कि हम जो अब तक पश्चिमी देशों का अंधानुकरण कर रहे हैं वो क्या वाकई हमारे लिए उचित है या फ़िर हमें अपना कोई और मॉडल सोचना चाहिए।

अंग्रेजों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त कर चंद शहरों का विकास कियाः मध्यकालीन भारत में भले ही विदेशी हमलावरों जैसे सल्तनत कालीन शासकों और मुगलों ने भारत में सत्ता पर कब्जा जमा लिया था लेकिन उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं किया था।

उस दौर में भी अधिकतर गांव लगभग पूरी तरह से आत्मनिर्भर थे।अच्छे कृषि उत्पादन और हस्तशिल्प तथा लघु व कुटीर उद्योगों की बदौलत भारत की अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में थी। भारत का निर्यात भी अच्छा था। इसी समृद्धि में हिस्सा लेने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी, सहित यूरोप के कई देशों की कंपनियों ने मुगलों के दरबार में सर झुका कर खड़े होकर व्यापार के लिए अनुमति देने की गुजारिश की थी।

फरमान जारी होने पर इन्होंने समुद्र तटीय इलाकों में अपनी कोठियां (व्यापारिक गोदाम) बनाई थीं। अब हम भारतीयों में एकजुटता और राष्ट्रीय भावना की कमी का फायदा उठाकर इन शातिर अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को ही अपनी सेना में भर्ती कर भारतीय राजाओं और शासकों को अलग-थलग कर बारी बारी से हरा कर पूरे देश पर कब्जा जमा लिया।

औद्योगिक क्रांति में भारत का कच्चा माल हुआ इस्तेमालः इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति को गति देने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को कृषि उत्पादों चाय, नील, कपास आदि तथा खनिजों लोहा, कोयला आदि कच्चा माल का सबसे बड़ा सप्लायर बना दिया।

भारत के कपास के बल पर ही मानचेस्टर और लीवरपुल के कॉटन कारखानों ने तरक्की की थी। अंग्रेजों ने भारत को कच्चे माल के निर्यातक और तैयार माल के ग्राहक के रूप तब्दील कर दिया।

महज चार पांच शहरों का ही केंद्रीकृत विकासः अंग्रेजों ने इतने बड़े देश में सिर्फ आधा दर्जन शहरों का ही विकास किया और वो भी अपनी सुविधा के लिए। इनमें कलकत्ता, बंबई, मद्रास और दिल्ली । दिल्ली तो वैसे भी बहुत पहले से राजधानी थी और अच्छी पहले से अच्छी व्यापारिक मंडी थी।

अन्य तीनों शहर समुद्र तट के किनारे थे और यही अंग्रेजों के कच्चा माल बाहर भेजने और तैयार माल लाने के केंद्र के रूप में विकसित हुए। अंग्रेजों ने अनमने ढंग से जो थोड़ा बहुत विकास किया वो इन्हीं शहरों तक सीमित था। अन्य शहरों के विकास की गति कछुआ चाल की तरह बेहद धीमी थी।

आजादी के बाद भी लगभग वही मॉडल चलाः अंग्रेजों से आजादी के बाद देश के विकास की गति थोड़ी तेज तो हुई लेकिन केंद्रीकृत विकास की अवधारणा बहुत हद तक कायम ही रही। इन चार बड़े मैट्रोपोलिटीन शहरों के अलावा करीब दर्जन भर ए क्लास शहर बन गए हैं, लेकिन ये इतने विशाल देश (क्षेत्रफल में दुनिया का सातवां) और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी 130 करोड़ लोगों के लिए नाकाफी है।

देश के अंदर भी पूरब और पश्चिम सा भेदभावः वैसे तो जब विकास की बात होती है या तुलना होती है तो पश्चिम यानि यूरोप और अमेरिका विकसित। वहीं पूरब का मतलब एशिया के अविकसित और विकासशील देश। हमारे देश को भी अगर आप दो भागों में बांट कर देखेंगे तो करीब-करीब पूरब और पश्चिम का ऐसा भेदभाव आप साफ नोटिस कर सकते हैं।

इसमें हम पश्चिम और दक्षिण को तथा उत्तर और पूर्व को एकसाथ रखते हैं। चलिए पश्चिम के राज्यों पर नजर डालिए। पंजाब, देश के सबसे विकसित राज्यों में शुमार है। कृषि, उद्योग और पंजाबी अप्रवासियों के धन के बल पर यह राज्य अमीर है।

गुजरात भी अपने परंपरागत व्यापार की बदौलत विकसित राज्य है। महाराष्ट्र देश में सबसे अधिक नगरीय विकास करने वाला राज्य है। गोवा जैसा छोटा राज्य पर्यटन उद्योग के बल पर अच्छी स्थिति में है।

केरल भी अपने मसालों, पर्यटन और सर्वाधिक साक्षर लोगों और मिडिल ईस्ट से अप्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए डॉलर के बल पर अच्छी स्थिति में है। दक्षिण में कर्नाटक की स्थिति अच्छी है। उसके बाद आंध्र प्रदेश भी ठीक है तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में गरीबी दिख जाती है।

अब जरा पूरब पर नजर डालिए बंगाल का विकास तो 25 साल वाले वामपंथी दलों के शासन काल में लगभग थम सा गया था। प्रारंभ में इन्होने भूमि सुधार किए जिसकी बदौलत लंबे समय तक सत्ता में बने रहे। बाद में इनका फोकस सिर्फ सत्ता पर लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने पर था भले ही विकास जाए भाड़ में।

बिहार एक अजीब सा राज्य है इसके बारे में जरा ध्यान से देखना चाहिए। यहां के लोग राजनीति में माहिर हैं इसी वजह से केंद्र में भी बिहारी नेताओं का बोलबाला रहा है लेकिन इन नेताओं ने अपनी झोली ज्यादा भरी राज्य को कम लाभ पहुंचाया है।

यहां गंगा, कोशी, घाघरा, सोन व पुनपुन जैसी नदियों के कारण उपजाऊ भूमि है। अच्छी फसल भी होती है। लेकिन भूमि का बंटवारा उचित नहीं है।

राज्य में भूमिहीन लोगों की बड़ी आबादी है। कानून और व्यवस्था भगवान भरोसे रही है। इसलिए अपराधियों का बोलबाला है। ये ही राजनीति में भी आ जाते हैं। लाखों बिहारी दूसरे राज्यों में काम की तलाश में पलायन करते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here