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अर्जुन मुंडा को ये बात भी समझनी होगी

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कांग्रेस-भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की जमीन पर लालू-शिबू जैसे स्वार्थी नेताओं द्वारा जबरिया बिहार के गर्भपात से जन्में झारखंड की स्थिति का अगर निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो इस प्रांत की हालत काफी दयनीय है.पिछले पन्द्रह वर्षों की अल्पआयु में ही भगवान बिरसा की जन्म-कर्मभूमि नेताओं के निकम्मेपन से मृत्युशया पर कराह रहा है और इसकी सुध लेने वाला कही कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा.
यह एक विडंबना ही है कि यहाँ की राजनीति जो विकास के हर क्षेत्र को नियंतित करने का मादा रखती है,उसपर नेताओं से अधिक पत्रकारिता कहीं अधिक हावी नज़र आती है.एक तरह से राजनीतिक जोड़-तोड़ के नए समीकरण कुछ इस तरह से गढे जाते हैं कि यहाँ के नेता उसी में उलझ कर रह जाते है. मै आज कल राजधानी रांची के जिस ओरमांझी क्षेत्र में स्थाई तौर पर रह रहा हूँ,यहाँ की राजनीतिक-पत्रकारीय घालमेल देखकर युहीं दंग रह जाता हूँ.मै भी कभी मुजफ्फरपुर,पटना,नालंदा,इंदौर,दिल्ली,जलंधर जैसे स्थानों पर सक्रीय पत्रकारिता की है लेकिन,इस तरह के हालात कभी महसूस तक नहीं किये.उदहारण के लिए यहाँ करीव एक दर्जन स्थानीय संवाददाता है लेकिन कोई सूचना-समाचार एक-दो लिखता है और एक ही लिखावट-तथ्य में संप्रेषित कर डालता है.समाचार पत्रों के संपादकगण भी सारे पत्रों में उसे सजाने में कोई गुरेज नहीं करते क्योंकि स्टार पर भी प्रायः यही तकनीक अपनाई जाती है.जाहिर है इस दव-पेंच में एकपक्षीय माहौल स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न हो जाता है और राजनेताओं में इतनी मानसिक स्वछता नही होती कि वे इस खेला को समझ पाए.
सच पूछिए तो वतौर दिमागी पेंडुलम की तरह डोलते रहे झामुमो के शिबू सोरेन और उनके महत्वाकांक्षी पुत्र हेमंत सोरेन की आपसी टकराव के कारण वर्तमान में जो ताज़ा हालत झारखंड उत्मन्न हुये हैं,उसमें मीडिया के भी काफी दाँव-पेंच छुपे है.हेमंत ये मान चुके है कि उनके पिता शिबू की उतराधिकारी उन्हें बनाना बहुत जरूरी है.कहते हैं कि इसे लेकर श्री शिबू सोरेन को अपनी पत्नी रूपी सोरेन,बड़े पुत्र स्व.दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन और उनकी झामुमो के विधायक दल के नेता पुत्र हेमंत सोरेन के भी भारी दबाब का सामना एक लंबे अरसे से करना पड़ रहा है.इस दबाब को आप पारिवारिक कलह की संज्ञा भी दे सकतें है.

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