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उग्रवाद और पंचायत चुनाव पर नई सोच से झारखंड को कितना बदल पायेगे गुरूजी

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आज हमारे समाज-परिवार मे प्रायः दो सगे भाईयो के बीच आपसी बंटबारे के बाद जो ईर्ष्या और जलन कुछ समय तक उत्पन्न रहता है, वही झलक झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के चेहरे पर साफ पढी जा सकती है.ऐसे भी यहाँ के निकम्मे नेताओ की नज़र मे झारखंड की बदहाली का प्रमुख कारण बिहारी कल्चर का हावी रहना है. हाँ,यह सवाल दिगर है कि बिहारी कल्चर का कोई अता-पता पुछने पर सब बगले झांकने लगते है.
बहरहाल,झारखंड मे अभी दो ऐसे मुद्दे है,जो शिबू सरकार के लिये एक बडी चुनौती लगती है.पहला उग्रवाद और दूसरा सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव कराना.इस सन्दर्भ मे श्री सोरेन राजधानी रांची मे जो कुछ बोलते है,उनकी नोटिश नही ली जाती क्योंकि उनका खुद की स्वीरोक्ति है कि रांची मे सिर्फ राजनीतिक बाते होती है और की जाती है.काम की बाते राजधानी से बाहर होनी चाहिये.
कहने का अर्थ यह है कि राजधानी रांची मे किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर उनके विचार के लक्ष्य कुछ और होते है और उसके बाहर कुछ अलग. सामान्यतः अपने स्थाई निवास बोकारो इस्पात नगर मे जो कुछ बोलते है,अक्षरशः वे उसी का पालन करते है,आगे ध्यान मे रखते है.विधानसभा चुनाव के बाद उन्होने रांची मे जहाँ अपने बयानो से सभी राजनीतिक दलो समेत मीडिया की धडकने अंतिम समय तक बढाये रखा,वही बोकारो मे एक सवाल के जबाब मे शुरू मे ही कांग्रेस की नौटंकी देखने के बाद चुटकी मे ही सरकार बना लेने का दावा कर दिया था. और अंततः हुआ भी ठीक वैसा ही.
इधर बोकारो मे भाजपा-आजसू-जदयू गठबन्धन के बल प्रांत के मुखिया बने झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने स्पष्ट कहा है कि उनकी सरकार हर हाल मे पंचायत चुनाव करायेगी क्योंकि पंचायत चुनाव न होने से केन्द्र सरकार का ढेर सारा पैसा लौट जाता है.लेकिन साथ मे उन्होने जो कहा उसके काफी दूरगामी परिणाम निकलेगे.श्री सोरेन ने पश्चिम बंगाल राज्य की तर्ज पर पंचायत चुनाव को दलीय आधार पर कराने की घोषणा की है.जिसकी मांग प्रमुख विपक्षी गठबन्धन कांग्रेस-झाविमो ने की है.उल्लेखणीय है कि बिहार मे जब 22 वर्षो बाद पंचायत चुनाव होनी तय हुआ तो वहाँ के सारे राजनीतिक दलो ने गांवो को सीधे राजनीति गुटबाजी का अड्डा न बनाने का निर्णय लिया था.इस चिंता पर सारे दल एकमत थे कि पंचायत के निचले स्तर के चुनाव मे राजनीति होने से सामाजिक कटुता बढेगी.चूकि मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की झामुमो का ग्रामीण क्षेत्रो मे ही मुल जनाधार है. उन्हें पूर्ण विश्वास है कि पश्चिम बंगाल की तरह यदि “लाल झंडे”की राजनीति यहाँ भी अपनाई गई तो उनके “हरा झंडा” की तूती बोलेगी.
सत्ता संभालते ही श्री सोरेन ने उग्रवाद पर भी अपना अलग नज़रिया अपना रखा है.”यहाँ हमसे बडा कोई उग्रवादी नही है”,”यहाँ उग्रवाद की समस्या नही,उसमे शामिल सब गांव के भोले-भाले छोकडा लोग है.” जैसे जुमले अपना कर केन्द्र सरकार तक को दंग कर दिया.यहाँ की पुलिस-प्रशासन ने नक्सलियो के विरूद्ध अपनी कार्रवाई लगभग बन्द कर दी है.उधर उग्रवादियो के तेवर मे कोई कमी नहीं आई है.उनकी हत्या,विस्फोट,बन्द जैसे नीति अपनाकर “लेवी” वसूलने का धन्धा अब कही अधिक बढ गई है.एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार उग्रवादी संगठने अकेले झारखंड जोन से करीव 20 हजार करोड रूपये प्रति वर्ष लेवी वसुल रहे है.
झारखंड मे उग्रवाद की भीषण समस्या के प्रति राज्य के मुखिया द्वारा इस तरह के विचार? इस सवाल पर झामुमो सुप्रीमो के एक करीवी रणनीतिकार का कहना है कि झामुमो के पास जो ग्रामीण स्तर पर मजबूत संगठन है,गुरूजी उसका सार्थक इस्तेमाल करना चाहते है.तीर-धनुष जैसे परंपरागत हथियारो से लैश झामुमो कार्यकर्ता सरकार की नीतियो के तहत उग्रवादियो से विकास के मुख्यधारा मे लौटने के लिये दवाव बनायेगे और जरूरत पडने पर सरकारी सहयोग से सीधा मुकाबला भी करेगे.जैसा कि पश्चिम बंगाल मे लाल झण्डे वाले वाम दल करते आये है.

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