कहीं मनमोहन सरकार के लिए खतरे की घंटी न बन जाए विपक्ष के साथ ये “डील”

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आखिरकार सरकार ने हमलावर विपक्ष के आगे हथियार डाल दिए। संसद में दो दिन तक हुए हंगामे के बाद सरकार ने महंगाई के मुद्दे विपक्ष से समझौता कर लिया। इस समझौते के तहत बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा में महंगाई पर चर्चा होगी। चर्चा के बाद वोटिंग भी होगी, जिसके लिए सरकार पहले तैयार नहीं थी। सवाल है कि ये समझौता सरकार के लिए राहत की सांस लेकर आया है या खतरे की घंटी।
विपक्ष और सरकार के बीच तीन शर्तों पर समझौते
पहली शर्त- लोकसभा में महंगाई पर चर्चा
बुधवार को लोकसभा में नियम 184 के तहत महंगाई पर चर्चा होगी। नियम 184 का मतलब है बहस के बाद वोटिंग होगी और सरकार को अपने वोट जुटाने होंगे।
दूसरी शर्त- राज्यसभा में भी महंगाई पर चर्चा
बुधवार को लोकसभा में महंगाई पर चर्चा होने के बाद राज्यसभा में भी आगे जाकर महंगाई पर नियम 167 के तहत चर्चा की जाएगी। उधर लोकसभा में बुधवार को ही आतंकवाद पर नियम 176 के तहत छोटी बहस होगी।
तीसरी शर्त- लोकपाल बिल
अब तय हो गया है कि गुरुवार को संसद में लोकपाल बिल पेश किया जाएगा। पहले ये बिल बुधवार को पेश होना था।
जाहिर है विपक्ष इन मामलों में सरकार के झुकने में अपनी जीत देख रहा है। साथ ही लेफ्ट और एनडीए तृणमूल, बीएसपी और समाजवादी पार्टी को भी घेरने का मौका तलाश रहे हैं। क्योंकि ये दल संसद के बाहर तो महंगाई के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन संसद के भीतर सरकार के साथ खड़े हो जाते हैं। हालांकि बीएसपी और समाजवादी पार्टी भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर सरकार पर हमलावर हैं। लेकिन महंगाई के मुद्दे पर एनडीए और लेफ्ट दोनों साथ खड़े हैं।
साफ है सरकार संसद न चलने का ठीकरा अपने सिर नहीं फोड़ना चाहती है। लिहाजा उसने एक कदम पीछे आने का फैसला किया। लेकिन सरकार को बैकफुट पर देख विपक्ष के तेवर और आक्रामक हो गए हैं। विपक्ष की रणनीति है कि महंगाई और आतंकवाद के मुद्दे पर सरकार को घेरने के बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधा जाए। टेलीकॉम घोटाले के बाद सीएजी ने कलमाडी के मामले में भी पीएमओ का नाम लेकर विपक्ष को मजबूत हथियार थमा दिया है।
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