शिबू सोरेन:झारखंड का सबसे कद्दावर नेता

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“काफी दम है इस बूढे शेर मे”!!
कोई गुरू कहता है तो कोई गुरूघंटाल.आदिवासियो का एक तबका उन्हे दिशोम गुरू मानता है तो एक तबका झारखण्ड का सौदेबाज.आखिर उग्रवाद और भ्रष्टाचार का प्रर्याय बने इस बदहाल नवप्रांत के सबसे बडे कद्दावर नेता की क्या है सही तस्वीर. जी चौंकिये मत! बात है झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) सुप्रीमो शिबू सोरेन की. एक सुदूर देहाती जंगली गांव से तीर-धनुष के बल भीषण संघर्ष करते हुये भारतीय संसद मे मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाले इस शख्सियत को आज की तारीख मे भी कोई नजरन्दाज नही कर सकता.यदि इनमे धैर्य होता और पेण्डुलम की तरह कभी कांग्रेस-कभी भाजपा की ओर नही डोलते तो आज ये किसी अन्य राजनीतिक दल के मोहताज नही होते. वेशक गुरूजी के नाम से चर्चित शिबू सोरेन आसन्न विधानसभा चुनाव मे एनडीए या यूपीए से इतर एकला चलो की रणनीति अपनाकर वे खुद ये टटोलना चाहते है कि अब तक उन्होने कितना खोया है और प्रदेश मे उनकी क्या औकात बची है.क्योकि वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुये तमाड विधानसभा उपचुनाव मे एक निर्दलीय प्रत्याशी से करारी हार से उबरे भी न थे कि अचानक उन्हे अपने राजनीतिक उतराधिकारी पुत्र नलिन सोरेन की रहस्यमय मौत का सदमा झेलना पडा. इस हालिया दुर्दिन भरे दिन मे श्री सोरेन को पंगु “बूढा खिलाडी” मानते हुये उन्हे अपने हाल पर छोड दिया. अब सबाल उठता है कि आसन्न विधान सभा के इस आम चुनाव मे सभी सीटो पर किस्मत आजमा रहे “गुरूजी”की पार्टी झामुमो का प्रदर्शन कैसा रहेगा तो एक बात बिल्कुल साफ है कि वे चुनाव परिणाम बाद भले ही अकेले दम पर सरकार बनाने की कूबत मे न हो लेकिन, सौ फीसदी संभावना है कि उसके समर्थन या फिर नेत्रीत्व के वगैर सरकार सरंचना संभव नही है.राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि इस बार झामुमो को 18-25 सीटे मिल सकती है.

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