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नक्सलियों के लिये शर्मनाक सबक है कानू सान्याल का आत्महत्या करना.

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खूनी नक्सल आंदोलन के जनक कहे जाने वाले वरिष्ठ माओवादी नेता कानू सान्याल ने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली। वह 78 साल के थे। उत्तरी बंगाल के अपने गांव नक्सलवाड़ी में उन्हें उनके घर में मृत पाया गया।
कानू सान्याल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के संस्थापक सदस्यों में थे। भारत में सशस्त्र संघर्ष के जरिए क्रांति लाने की नीति को आगे बढ़ाने वाले नेताओं में से वह एक थे।
सान्याल का संगठन कैसे काम करता था, इस बारे में कुछ भी पता नहीं है। सान्याल हिंसा के जरिए क्रांति में विश्वास करते थे, और उन्होंने खुले रूप में चीन से मिलने वाली मदद को भी स्वीकार किया था।
पिछले दिनों टाटा द्वारा सिंगुर में भूमि अधिग्रहण की खिलाफत करने वालों में से वे एक थे। 2006 में उन्हें न्यू जलपाईगुडी स्टेशन पर राजधानी एक्सप्रेस को रोकने के लिए गिरफ्तार भी किया गया था।
कानू सान्‍याल : जीवन परिचय
कानू सान्याल का जन्‍म 1932 में हुआ था। दार्जीलिंग के कर्सियांग में जन्में कानू सान्याल अपने पांच भाई बहनों में सबसे छोटे थे। सान्याल ने कर्सियांग के ही एमई स्कूल से 1964 में मैट्रिक की अपनी पढ़ाई पूरी की थी । बाद में इंटर की पढाई के लिए उन्होंने जलपाईगुड़ी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी । उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली। कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई। जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली। 1964 में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया। 1967७ में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की। अपने जीवन के लगभग 14 साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे। अंतिम दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रहते थे।

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