बुढ़ापे में दाने-दाने को मोहताज रहे आत्महत्या(!!) करने वाला हिंसावादी कानू सान्याल.

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विचारधारा जीवन को एक दायरे में बांधती है और जीने का जोश देती है, लेकिन जब वह भटक जाती है, तो जी का जंजाल बन जाती है। झंडाबरदारों को तो दुर्दिन दिखाती ही है, विकृति बन उस समाज को भी पेरती है, जो उसके केंद्रबिंदु में होता है। कुछ ऐसा ही हुआ है नक्सलवादी विचारधारा के साथ। कम से कम कानू सान्याल को देखकर तो यही लगता है। कभी देश-समाज को बदलने का सपना देखने वाले शख्स को हर उस व्यक्ति से शिकायत है, जिससे उसने उम्मीद बांधी थी। वैचारिक रिश्ते तो साथ छोड़ गए, अंतत: खून का रिश्ता ही काम आ रहा है। भाई के खर्च पर 81 साल के कानू की जिंदगी की गाड़ी जैसे-तैसे खिंच रही है, अब कोई हाल-खबर लेने भी नहीं आता है। पश्चिम बंगाल के एक गांव की झोपड़ी में नक्सलवाद का कथा पुरुष घुट-घुटकर मर रहा है। भाई पैसा न दे, तो कानू सान्याल सांस चालू रखने वाली दवा भी न खा सकें। ठीक बगल की झोपड़ी में रोज मौत की बुलाती एक औरत, साथियों की चरम दगाबाजी की निशानी है। फिर भी दोनों को कोई मलाल नहीं; मदद की अपेक्षा भी नहीं। और ऐसे ही कई और गुणों के चलते दोनों जनता के लड़ाकों के लिए नसीहत हैं। दोनों गवाह हैं कि कैसे और क्यों कोई आंदोलन बीच रास्ते से भटक जाता है; जनता बेच दी जाती है? वाकई, कानू सान्याल और लखी होना मुश्किल है। अभी के दौर में तो असंभव। कानू दा, नाम के मोहताज नहीं हैं। मगर लखी को हाथीघिसा पहुंचकर ही जाना। वे भारत में नक्सलवादी आंदोलन के प्रारंभिक कमानदारों में एक जंगल संथाल की बेवा हैं। जंगल, नक्सलबाड़ी का लड़ाका। चारु मजूमदार, खोखोन मजूमदार, सोरेन बोस, कानू सान्याल का हमकदम। खैर, कानू दा 81 साल के हो चुके हैं। बीमार हैं। दो अखबार लेते हैं। सामने के खेत, खुला आकाश, उड़ते पंछी, चरते जानवर, चिथड़ों में लिपटे नंगे पांव स्कूल जाते नौनिहाल ..,चश्मे के पीछे से सब देखते हैं। कुछ भी तो नहीं बदला! यही उनकी घुटन है। उन्होंने इसी सबको बदलने के लिए भारतीय व्यवस्था को चुनौती दी थी। कई राज्यों की पुलिस तलाशती थी। .. और अब गुटीय लाइन पर अपने भी मिलने नहीं आते। कानू की जिंदगी बड़ी मुश्किल से गुजर रही है। प्रदीप सान्याल (भाई) के पैसे से दवा खरीदी जाती है। चूंकि कार या पेट्रोल की हैसियत नहीं है, सो चाहते हुए भी कहीं निकल नहीं पाते। कानू दा को यह बात बहुत कचोटती है कि कभी साथी रहे लोग या उनकी सरकार (पश्चिम बंगाल का माकपा राज) ने मरणासन्न अवस्था में भी उनकी सुधि नहीं ली। बुद्धदेव भट्टाचार्य (मुख्यमंत्री) सार्वजनिक सभाओं में अक्सर कहते हैं-पश्चिम बंगाल में अब कोई नक्सली नहीं रहा। एक कानू बाबू है। उनको भी हम अपने साथ करना चाहते हैं। यह मुनादी है कि कैसे नक्सल आंदोलन के किरदारों को उनके ही पुराने साथियों (माकपा) ने दबाया, कुचला? ऐसे में सहयोग की अपेक्षा बेकार है। और हम ऐसा करते भी नहीं-कानू दा बोले। झोपड़ी में रह रहे कानू सान्याल बैचलर है. …………..(साभार सूचना).

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