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“ये झारखण्ड के प्रधान हैं!!”

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-मुकेश कुमार किन्नर-
जी हाँ ये भारतीय क़ानून है। इसे किसने लिखा ? बाबा आंबेडकर साहेब ने / गांघी जी ने /नेहरू जी ने या फ़िर हमारे राजेन्द्र बाबू ने । जिसके तहत झारखण्ड में ये नजारा दिख रहा है। केन्द्र सरकार ने ग्रामीण पंचायती राज्य व्यवस्था के तहत विकास कार्यों के मजबूती के लिए सारे अधिकार ग्राम प्रधानों को सौंप दी है । समूचे प्रांत में प्रधान के सारे पद अनुसूचित जाति जन जाति के लिए आरक्षित कर दी है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार करीव 35% प्रधान असिक्षित है । ७८ % से अधिक ग्राम प्रधान हरिया-दारू-गांजा-भांग जैसे दिमागी संतुलन ख़राब करने वाली नशा करते है। करीव ९२% ग्राम प्रधानो को विकास योजनाओं की सही जानकारी नहीं है । वामुश्किल एक-दो % से इतर लूट-खसोंट में संलिप्त हैं। आधे से अधिक प्रधान ग्रामीणों की की बैठक सुचारू ढंग से नही करते और सरकारी अधिकारियों से कभी कभार ही बातचीत कर पाते हैं। उक्त सर्वेक्षण में इस तरह के कई संवेदनशील तथ्य उभरकर सामने आई है।
उल्लेखनीय तत्थ है कि झारखण्ड प्रांत में करीव ३७% आबादी अनुसूचित जाति जन जाति की है, वही ८३% आबादी उन लोगों की है जिसे शाशन प्रसाशन मूलवासी मानता है या बाहरी।
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