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संविधान के उपर संसद का प्रभुत्व नहीं :सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि ‘कानून का शासन’ संविधान के आधारभूत ढांचे का अभिन्न हिस्सा है.
प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिया की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, ‘हमारे संविधान में अवधारणा के रूप में कानून के शासन की कोई जगह नहीं है बल्कि इसे हमारे संविधान की मूलभूत विशेषता के रूप में रेखांकित किया गया है जिसे संसद द्वारा भी निरस्त या नष्ट नहीं किया जा सकता और वास्तव में यह इससे बंधी है.
पीठ ने कहा, ‘केशवानंद भारती के मामले में इस अदालत ने यह स्पष्ट किया था कि कानून का शासन मूलभूत ढांचे के सिद्धांत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है. कानून का शासन संसद की प्रधानता की पुष्टि करता है लेकिन साथ ही इसे संविधान के ऊपर प्रभुत्व देने से इंकार करता है.’
इसने कहा, ‘कोई भी कानून जो किसी व्यक्ति को निजी स्वार्थ से उसकी निजी संपत्ति से वंचित करे वह गैर कानूनी और अनुचित होगा और यह कानून के शासन को कमजोर करता है तथा इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.’
संविधान पीठ ने व्यवस्था दी कि कानून का शासन संसद की विधायी शक्तियों पर एक ‘अंतर्निहित परिसीमा’ है. पीठ ने हालांकि  संवैधानिक अदालतों को कानून के शासन के सिद्धांत को पूर्ण व्यवस्था मानने के प्रति आगाह किया और कहा कि सिद्धांत को दुर्लभ मामलों में उन कानूनों को खत्म के लिए क्रियान्वित किया जाना चाहिए जो दमनकारी हैं और जो हमारे संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन हैं.
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