बिहार:सुशासन मे छुपी है घोर कुशासन

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वेशक कभी बिहार की छाती पर बीस सालो तक मुंग दल कर एकछत्र राज करने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की सत्ता पतन के बाद जब राज्य मे व्याप्त कुव्यवस्था,आतंक,भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे लेकर श्री नीतिश कुमार के नेत्रित्व मे एनडीए यानि भाजपा-जदयू गंठबन्धन की सरकार बनी तो देश मे एक नया मैसेज गया.वह मैसेज था बिहार के करवट लेने का.श्री कुमार को जाति,वर्ग धर्म से उपर उठकर जिस तरह का जनसमर्थन मिला,वे एक परिपक्व लोकतंत्र के मिशाल माने गये. लेकिन आज नितिशराज के करीव चार वर्ष से उपर हो रहे है और अब उनके जनसमर्थको मे यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि प्रारंभिक दौर मे सुशासन और विकास के प्रयास तो उपरी तौर पर दिखे,लेकिन अन्दरूनी तौर पर काफी घाल-मेल है.खासकर ग्रामीण क्षेत्रो मे शासन-व्यवस्था और भी लच्चर होती जा रही है.

जिस तरह केन्द्र सरकार के निकम्मेपन से महँगाई आसमान छू रही है.ठीक उसी अनुपात मे सर्वत्र रिश्वतखोरी व कमीशनबाजी लोगो की कमर तोड रही है.इस सन्दर्भ मे राजधानी पटना,बैशाली,मुज़फ्फरपुर,मोतिहारी,दरभंगा,हाजीपुर,छपरा,सासाराम,जहानाबाद,गया व उससे जुडे जिला क्षेत्रो तो दूर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के गृह क्षेत्र नालन्दा का आंकलन करने पर स्थिति काफी भयावह नजर आती है.पुलिश थानो मे पहले सत्य घटनाओं की प्राथमिकी 200रूपये से 500रूपये का नजराना चढाने से दर्ज हो जाती थी,लेकिन अब 500रूपये से 2000रूपये से भी उपर हो गई है.जाति प्रमाण पत्र,आय प्रमाण पत्र,आवासीय प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र आदि बनाने की दर भी रिश्वतखोरो ने 10-20 रूपये की जगह 50-100रूपये तक बढा दी है.खेती-बारी की जमीनो के वैध खरीदगी मे निबन्धन से लेकर दाखिलखारीज तक की प्रक्रिया प्रति कठ्ठा 5000रूपये का चढावा चढाना पड रहा है. जनवितरण प्रणाली की दूकाने पूर्णतः कालाबाजारियो के कब्जे मे है.आंगनवाडी केन्द्र सेविकाओ के आंगन तक ही सीमित है.

समुचे नालन्दा जिले मे ग्रामीण विकास योजनाओं का आलम यह है कि पूर्व क्रियांवित एक ही योजना का प्राकल्लन तैयार कर मुखिया,पंचायत समिति,जिला परिषद,विधायक,सांसद मद की योजना बता सब के सब हड़पने मे लगे है.

मुख्यमंत्री की महात्वांकाक्षी शिक्षक बहाली घोषणा भी उनके जिला क्षेत्र मे मजाक बन कर रह गई. प्रतिभाशाली व योग्य अभियर्थिओ को नजरन्दाज कर शिक्षा माफियाओ ने 2लाख से 5लाख रूपये लेकर अयोग्य नकली डिग्रीधारी लोगो की बडे पैमाने पर बहाली की.इस मामले मे जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायत करने पर भी इस सन्दर्भ मे कोई जांच कार्रवाई नही हो रही है और हताश-कुंठा का शिकार बन घर बैठे है.

अब सवाल उठता है कि क्या बिहार के “सुशासन कुमार” और उनके जिले के आठो विधायक व चहेते सांसद से ये सब छुपी हुई है या फिर इस कुशासन मे आकंठ डूबे हुये है? वेशक ये सवाल मुख्यमंत्री को भी अपनी परिधि मे ले लेता है.

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