अपनी नाकामियो का ठिकरा बिहारियो पर अभी से फोडने लगे शिबू सोरेन

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शिबू सोरेन की गलतफहमी न.1

वेशक झारखंड के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने शिबू सोरेन का इरादा झारखंड को अपने सपनो के अनुरूप ढालना है.वे चाहते है कि उनकी सरकार उन वेवश लाचार लोगों तक ईमानदारी से पहुंचे,जिनकी गोद मे वे पले-बढे है. और एक अच्छा नेता भी वही होता है,जो अपने जमीन के दुःख दर्द को समझे तथा उस दिशा मे सार्थक पहल ही न करे अपितु ठोस कारगर कदम उठाये.लेकिन आदिवासियो के एक बडे तबके मे “दिशोम गुरू”, मीडिया की नज़र मे “गुरूजी” तथा विरोधियो की जुबान पर “गुरूघंटाल” के नाम से चर्चित झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया,जो अब भारतीय जनता पार्टी और आजसू के सहयोग से प्रांत का मुखिया बन गये है,उन्होने पदभार संभालते ही जिस तरह के सोच प्रकट की है,उसका अवलोकन करने से मात्र यही स्पष्ट होता है कि विशुद्ध ग्रामीण परिवेश की राजनीति करने वाला यह नेता अनेक गलतफहमियो का शिकार है.जिसे दूर किये वगैर झारखंड जैसे बदहाल प्रांत का विकास संभव ही नही है.आईये हम बात करते है मुख्यमंत्री शिबू सोरेन उर्फ गुरूजी की गलतफहमी न.1 की.गुरूजी का कहना है कि झारखंड की ताजा बदहाली के लिये बरकरार बिहारी शासन व्यवस्था है,बिहारी कल्चर है.जब तक समुचा शासन-तंत्र “उनके लोगों” का नही होगा,तब तक झारखंड मे कोए कार्य नही दिखेगा. गुरूजी ने प्रायः सभी समाचार पत्रो को कल दिये अपने ताजा साक्षात्कार मे कही है. हम नही समझते कि गुरूजी के दिलोदिमाग मे कायम इस तरह की मनसिकता से झारखंड का कुछ भी भला हो सकता है. एक सर्वेक्षण रिपोर्ट बताता है कि बिहार से अलग झारखण्ड राज्य गठन के बाद से लेकर इन नौ वर्षो मे शासन-तंत्र के भीतर यहाँ सब कुछ बदल गया है. ग्रामीण शासन व्यव्स्था के तहत सारे ग्राम प्रधान अदिवासियो के लिये आरक्षित है और सारा संचालन उन्ही के हाथो मे है. अभी तक राज्य के जितने भी “मुखिया” हुये है,सब आदिवासी समुदाय के लोग ही हुये है. राज्य के आला अधिकारी या कर्मचारी भी करीव 66% की तादात मे झारखंडी लोग ही काबिज है. ऐसे मे बिहारी मानसिकता का कयम सवाल उठाना गुरूजी के लिये कितना उचित है, यहाँ एक बहस का मुद्दा हो सकता है.क्योंकि गुरूजी अब आम नेता नही बल्कि,राज्य के मुखिया है.जहाँ तक बिहारी मानसिकता का सवाल है तो शायद गुरूजी यह भूल रहे है कि अब बिहार और बिहारी मानसिकता तेजी से बदल गई है. अब न तो पहले जैसा बिहार है और न ही पहले जैसी बिहारी मानसिकता. कभी भय,भुख व भ्रष्टाचार का पर्याय रहा बिहार अब सुख-चैन की बंशी बजाने लगा है. जहाँ राष्ट्रीय विकास दर 8.02% है,वही बिहार का विकास दर 10.30% है. कही सुखाड तो कही बाढ का दंश झेलने के बाबजूद आज देश का दूसरा विकसित राज्य बन गया है. यहाँ परिवर्तन पिछले चार सालो के भीतर आया है,जिस अंतराल मे झारखंड की दुर्गति हुई है.

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