झारखंड के राज्यपाल ने नियम और परंपरा को ताक पर रखा

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लगता है कि नये साल 2010 की शुरूआत जिस तरह से चन्द्रग्रहण से हुई है और इसके नक्षत्र प्रभाव आगे के लिये नकारात्मक माने जा रहे है. ठीक उसी तरह झारखंड के महामहिम राज्यपाल के. शंकरनारायणन ने विधानसभा सत्र आहूत करने तथा सत्रावसान की तिथि को लेकर अब तक तक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओ पर ग्रहण लगाया है,वह प्रमाणित करता है कि उनके इरादे आगामी 7 जनवरी को बहुमत साबित करने जा रहे सत्तासीन शिबू सरकार के प्रति कुछ नेक नही है. उल्लेखणीय है कि विधानसभा का सत्र कल 4 जनवरी से शुरू हो रहा है.,जो शिबू सोरेन सरकार के बहुमत हासिल करते ही समाप्त हो जाने की घोषणा की गई है.यदि हम लोकतांत्रिक नियम व परंपरा की बात करें तो लोकसभा और विधानसभा आहूत करने का अधिकार क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्राप्त है. यदि इस आलोक मे राज्यपाल सत्र आहूत करते है तो आगे जरूरत के अनुसार विधानसभा के अध्यक्ष सत्र का संचालन करते है.हालांकि विशेषग्य कहते है कि राज्यपाल सत्र की अंतिम तिथि की घोषणा कर सकते है लेकिन ऐसी सूरत मे सत्र संचालन के क्रम मे निर्धारित तिथि को बढाने की जरूरत यदि विधनसभाध्यक्ष को आई या नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियो को दवाब बना तब क्या होगा? विधानसभाध्यक्ष चाहकर भी कुछ नही कर सकते.यही वजह है कि राज्यपाल द्वारा सत्र आहूत और सत्र समाप्त करने की घोषणा करने का न तो प्रावधान और न ही परंपरा.
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