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जाति आधारित जनगणना मनमोहन सरकार के लिए सरदर्द बना

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जाति जनगणना पर फ़ैसला नहीं

जाति के आधार पर जनगणना आख़िरी बार 1931 में हुई थीजनगणना में जाति को आधार बनाया जाए या नहीं, इस सवाल पर मंत्रिमंडल समूह (जीओएम) की बैठक में गुरुवार को कोई फ़ैसला नहीं हो सका.

इस समूह में शामिल कपिल सिब्बल ने बैठक के बाद पत्रकारों से इतना ही कहा, “जीओएम में इस विषय पर पूरी तरह से चर्चा हुई और ये फैसला हुआ है कि हम दोबारा मिलेंगे, जल्दी मिलेंगे.”अभी यह घोषणा नहीं की गई है कि अगली बैठक कब होगी.

दरअसल इस मसले पर सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस और यूपीए गठबंधन के कई दलों के बीच मतभेद है.
इसी की वजह से मंत्रिमंडल में इस मसले पर कोई फैसला नहीं हो सका था और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर निर्णय लेने का जिम्मा मंत्रिमंडल समूह पर छोड़ दिया है.इस मंत्रिमंडल समूह का नेतृत्व वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी कर रहे हैं.

गुरुवार को हुई बैठक में क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली, गृहमंत्री पी चिदंबरम, मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल, शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी और सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक शामिल हुए.लेकिन अक्षय ऊर्जा मंत्री फारूक़ अब्दुल्ला, कृषि मंत्री शरद पवार और रेलमंत्री ममता बनर्जी इस बैठक में शामिल नहीं हुए क्योंकि दिल्ली में नहीं थे.
ग़ौरतलब है कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), समाजवादी पार्टी (एसपी) और जनता दल यूनाइडेट (जेडीयू) जाति आधारित जनगणना की वकालत कर रहे हैं.शुरुआत में भाजपा भी इस मांग का समर्थन कर रही थी लेकिन बाद में भाजपा के भीतर भी कुछ मतभेद उभर आए हैं.सत्तारूढ़ गठबंधन यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर खुले मतभेद हैं.

संसद में जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर हुई बहस के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया था कि विभिन्न दलों की राय को ध्यान में रखते हुए वे इसे मंत्रिमंडल के समक्ष रखेंगे.

लेकिन मंत्रिमंडल में इस पर एक राय नहीं बन पाई.

जाति आधारित जनगणना का विरोध करने वालों का कहना है कि जब भारत को जाति-विहीन समाज बनाने की बात कही जाती है तब फिर जाति के आधार पर जनगणना क्यों होनी चाहिए.लेकिन इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि अगर जातियाँ हैं तो उनकी जानकारी हासिल करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए.भारत में 1931 में आख़िरी बार जाति के आधार पर जनगणना हुई थी…………………बीबीसी हिन्दी सेवा से साभार

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