समझिए समय की मांग, त्यागिए सरकारी नौकरी का मोह, जरुरी है यह

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पिछले 70 सालों में सरकारी कर्मचारी न सिर्फ मानसिक गुलाम बन गए बल्कि रिश्वतखोर और कामचोर भी बन गए। मंत्रियों और नेताओं के सामने तो दुम हिलाते रहे लेकिन आम जनता को जूते की नोंक पर रखते रहे…………”

-: सिने टीवी लेखकः धनजंय कुमार :-

इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क।  अखबार से लेकर सोशल मीडिया पर निरंतर ये खबर आ रही है कि नौकरियाँ लगातार घट रही हैं। और इसके लिए सरकार की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जो कि स्थिति का नकारात्मक विश्लेषण है।

चूंकि सरकार का विरोध करना है, इसलिए लोग रोज़ कोई नया नया एंगिल तलाशते रहते हैं। नौकरियाँ कम हो रही हैं ये भी विरोध का एक एंगिल है और देश विरोधी एंगिल है। जबकि नौकरियाँ कम करने का मकसद है लोगों को स्वावलंबी बनाने के लिए तैयार करना।

भारतीय सैकड़ों साल गुलाम रहे। कभी मुगलों के तो कभी अंग्रेजों के। नतीजा हुआ कि हम मानसिक तौर पर गुलाम हो गए। और आज़ादी के बाद भी उसी मानसिकता को आगे बढाया गया।

इसलिए सरकार ने पब्लिक सेक्टर की कम्पनियाँ शुरू कीं, ताकि नागरिकों को नौकरी दी जा सके और उन्हें गुलाम ही बनाकर रखा जा सके।

सरकारी कर्मचारियों को तमाम तरीके की सुविधाएं दी गयीं, रिटायर्ड होने के बाद पेंशन दी गयी, ताकि बिना काम किये ऐश से जीवन व्यतीत कर सकें।

ऐसा इसलिए किया गया ताकि भारतीय नागरिक मानसिक तौर पर गुलाम बने रहें और कांग्रेस सरकार को ताउम्र वोट देते रहें, उनकी तरफदारी करते रहे।

इसी वजह से केंद्र में जब पहली बार वाजपेयी सरकार आई, तो वाजपेयी सरकार ने सरकारी नौकरी वालों की पेंशन ख़त्म की, ताकि उनकी हरामखोरी ख़त्म हो। लेकिन वाजपेयी जी सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं थी, इसलिए बहुत ज़्यादा कड़े फैसले नहीं लिए जा सके।

और देखिये कांग्रेस सरकार ने आते ही पेंशन फिर से बहाल कर दी। सोचिये क्यों ? चूंकि उसे देश से मतलब नहीं है, शासन से मतलब है। वह देश को अपना जागीर समझती है। लेकिन बीजेपी सदा देश हित को पहले रखती है।

इसलिए दोबारा जब बीजेपी की सरकार आई और पूरी मज़बूती के साथ आई तो वाजपेयी जी का शुरू किया गया अधूरा काम पूरा करने का अभियान शुरू किया गया।

और इसी क्रम में यह सोचा गया कि पेंशन ख़त्म करने के बजाय क्यों न सीधा सरकारी नौकरियाँ ही ख़त्म कर दी जाय, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी !

इसीलिये अम्बानी और अडानी जैसे दो बहादुर और कुशल व्यापारियों का सहारा लिया गया। भाई सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है, सरकार का काम है एडमिनिस्ट्रेशन चलाना। बिजनेस करना व्यापारियों- उद्योगपतियों का काम है, न कि नेताओं और आईएएस अफसरों का।

अब कंपनी चूंकि सरकार की है, इसलिए बिजनेस डूबे या फले नौकरी करने वाले लोगों का क्या ?  सेलरी तो उतनी ही मिलनी है। इसलिए न लाभ कमाने की लालसा उनमें जमी, न नुकसान का डर उनके करीब आया।

नतीजा हुआ सरकारी कर्मचारी और अफसर दोनों सुस्त हो गए और आगे चलकर काम करने के घूस लेने लगे। इस तरह कहें तो कामचोरी और रिश्वतखोरी की आदत इसी वजह से भारतीयों में लगी।

अब सोचिये क्या प्राइवेट कंपनी में कामचोरी या रिश्वतखोरी की बात सोची भी जा सकती है ! तुरंत निकाल दिया जाएगा। और फिर व्यापार करना भी मनुष्य का एक गुण है। कोई भी आदमी व्यापारी नहीं हो सकता। और अगर आप खानदानी व्यापारी हैं तो जाहिर है कंपनी को बेहतर तरीके से चलायंगे।

अब अम्बानी और अदानी को देखिये कितनी कुशलता से अपना व्यापार फैला रहे हैं। और यही देखकर सरकार ने तय किया है कि सारी पब्लिक सेक्टर कंपनियों को धीरे धीरे व्यापारियों विशेषकर अम्बानी और अदानी के हाथ बेच दिया जाय।

सोचिये जब अनुभवहीन अफसर कमाई कर सकते हैं तो अनुभवी व्यापारी कितनी कमाई करेंगे और फिर सरकार उनसे भारी टैक्स वसूलेगी।

सरकार का वास्तविक काम यही तो है, व्यापारियों को व्यापार करने का बढ़िया माहौल देना और उनसे टैक्स वसूलकर नागरिक सुविधाओं के काम करना। सरकार इसी नीति पर काम कर रही है।

इसलिए नौकरियाँ घट रही हैं या पब्लिक सेक्टर कम्पनियां बेची जा रही हैं, जैसी खबरों को नकारात्मक तौर पर लेने की ज़रुरत नहीं है, बल्कि ये ज़रूरी और देश हित के कदम हैं। इससे देश को कई प्रकार के फायदे होंगे।

सबसे पहले तो नागरिक आत्मनिर्भर, मेहनती और ईमानदार बनेंगे, दूसरे व्यापारी ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाएंगे और सरकार को अधिक से अधिक टैक्स देंगे। सरकार पर नौकरी देने का बोझ नहीं रहेगा, सरकार लोकलुभावन और वोट पाने वाले काम नहीं कर पायेगी,

ऐसे में नेता भी निश्चिंत होकर देशसेवा के लिए समर्पित हो सकेंगे। अभी तो डर लगा रहता है, नौकरियाँ नहीं दी, तो वोटर नाराज़ हो जायेंगे, वोट नहीं देंगे और हम हार जायेंगे।

लेकिन सब निजी हो जाने के बाद नेता का ये डर समाप्त हो जाएगा। और तीसरे आम जनता जब पैसे देकर सुविधा खरीदेगी तो खराब सुविधा के लिए लडेगी भी।

अभी तो ये है कि सरकारी सुविधा है, रियायती सुविधा है, किसी से क्या शिकायत करना। तो इस तरह जनता उपभोक्ता के तौर पर जागरूक होगी और देश तरक्की की ओर बढेगा।

बातें तो बहुत है, लेकिन लंबा न करते हुए अब विराम देते हैं। पूरा यकीन है अब सरकारी नैकारियों के लाभ नुकसान को आप अच्छी तरह समझ गए होंगे। इसलिए हराम का खाने के बजाय मेहनत कर खाइए और सरकार को देश को मज़बूत बनाने में मदद कीजिये।

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