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संवेदनशील हैं तो शाकाहारी बनिए

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-: नवीन शर्मा :-

हमारे देश में आमतौर पर शाकाहार को जातिगत और धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। अगर कोई व्यक्ति ब्राह्मण है तो उसे शाकाहारी ही होना चाहिए या अगर कोई राजपूत है तो वो मांसाहारी ही होगा।

लेकिन ये दीवारें गिर रही हैं । ब्राह्मण भी मांसाहार कर रहे हैं, और कई अन्य जातियों के लोग भी शाकाहारी हो रहे हैं। कई लोग जो मांसाहारी हैं वे भी सप्ताह के दो -तीन दिन जैसे मंगलवार, गुरुवार को मांसाहार से परहेज करते हैं। इसी तरह पूर्णिमा या अन्य कई पर्व त्यौहार जैसे छठ में मांसाहार प्राय वर्जित रहता है।

मेरा मानना है कि इस तरह के दोहरे मानदंड की जरूरत नहीं है। अगर मांसाहार सही है तो हर दिन सही है अगर गलत मानते हैं तो किसी भी दिन मत खाइये।

शाकाहार को लेकर महावीर के उपदेशों ने भारतीय समाज में महत्वपर्ण भूमिका निभाई थी। अहिंसा परमो धर्म के उनके उपदेश की वजह से जीव हत्या पर रोक को प्रोत्साहन मिला।

जैन समुदाय के लोग शाकाहारी ही होते हैं। इसी तरह स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज ने भी शाकाहार की वकालत की थी।

अब इस मसले पर थोड़ा अलग दृष्टि से देखने की जरूरत है। मेरा मानना है कि शाकाहारी बनने के लिए किसी धार्मिक विश्वास और स्वर्ग -नरक के झमेले की कोई जरूरत नहीं है।

बस अगर कोई भी व्यकित सचमुच संवेदनशील और सजग है तो उसके पास तो शाकाहारी बनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मेरी चुनौती है कि ऐसा कोई भी व्यक्ति बस एक बार कसाई के यहां जाए और किसी भी जानवर को काटने के दौरान उसकी झटपटाहट, उसके चीत्कार और बेबसी को ध्यान से देख कर महसूस करे।

उस जानवर की जगह खुद को रखे और सोचे की मुझे भी महज खाने के लिए कोई काटे तो कैसा महसूस होगा। बस इतना करने के बाद तय मानिये की आप अगली बार किसी भी जानवर को अपनी डायनिंग टेबल पर सजा हुआ देखना पसंद नहीं करेंगे।

प्रकृति ने मानव को जानवरों से अलग एक अतिरिक्त उपहार दिया है। वह है विवेक। जो भी पशु, पक्षी है उनका स्वभाव तय है कोई बाध शाकाहारी हो नहीं सकता और ना ही गाय मांसाहारी हो सकती है।

आदमी के पास ही यह विकल्प है कि वो दोनों में से एक चीज चुन ले। प्राचीन काल में जब सभ्यता प्रारंभ हो रही थी तब आदिमानव के पास खाने के विकल्प काफी सीमित थे। वह कंदमूल और शिकार कर अपना पेट भरता था। खेती की उसे जानकारी नहीं थी।

आज सभ्यता काफी आगे जा चुकी है। खेती के जरिये हमने खाने के लिए दर्जनों अनाज और सैकड़ों सब्जियों का विकल्प तैयार कर लिया है। तो ऐसे में अब आदिमानव ही बने रहने का कोई तुक नजर नहीं आता है।

मांसाहार से ये माना की प्रोटीन मिलता है लेकिन उससे भी ज्यादा खतरनाक बीमारियां भी उपहार में मिल जाती हैं। मैड काऊ डिजीज और बर्ड फ्लू की बीमारियों से हजारों लोगों की मौत हो जाती है।

इसके बाद भी अगर कोई मांसाहार जारी रखता है तो मानना होगा कि वो स्वाद के लिए  अपना जीवन दाव पर लगाने के लिए तैयार है। अब आपको तय करना है कि जीभ के जरा से स्वाद के लिए आप कितना रिस्क उठाने के लिए तैयार हैं।   

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