» समस्तीपुर से लोजपा सांसद रामचंद्र पासवान का निधन   » दिल्ली की 15 साल तक चहेती सीएम रही शीला दीक्षित का निधन   » अपनी दादी इंदिरा गांधी के रास्ते पर चल पड़ी प्रियंका?   » हाई कोर्ट ने खुद पर लगाया एक लाख का जुर्माना!   » बेटी का वायरल फोटो देख पिता ने लगाई फांसी, छोटे भाई ने भी तोड़ा दम   » पुण्यतिथिः जब 1977 में येदुरप्पा संग चंडी पहुंचे थे जगजीवन बाबू   » बजट का है पुराना इतिहास और चर्चा में रहे कई बजट !   » BJP राष्‍ट्रीय महासचिव के MLA बेटा की खुली गुंडागर्दी, अफसर को यूं पीटा और बड़ी वेशर्मी से बोला- ‘आवेदन, निवेदन और फिर दनादन’ हमारी एक्‍शन लाइन   » कैदी तबरेज तो ठीक, लेकिन वहीं हुए पुलिस संहार को लेकर कहां है ओवैसी, आयोग, संसद और सरकार?   » उस खौफनाक मंजर को नहीं भूल पा रहा कुकड़ू बाजार  

विकास नहीं, मानसिक और आर्थिक गुलामी का दौर है ये !

Share Button

“व्यापार का बड़ा सिंपल तरीका है, पहले क्राइसिस क्रियेट करो, फिर विकल्प सामने कर दो! पब्लिक धन्य हो टूट पड़ती है। ग्लोबलाइजेशन के बाद देश में तेजी से इस फॉर्मूले पर काम हुआ है और अब भी जारी है….”

INR (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क)। औद्योगिकीकरण के चक्कर में पहले खेती को चौपट किया गया। खेती चौपट हुई तो मंझोले और बड़े किसान भी गाँव से दूर हुए। गाँव में पहले बड़े और मंझोले किसानों की पकड़ होती थी।

विश्लेषकः धनजंय कुमार जाने-माने एक विचारशील सिने-टीवी लेखक है…

हर बात के लिए सरकार का मुंह देखना नहीं होता था, किसान आपस में चन्दा करके बाढ़ और सूखे से बचाव कर लेते थे, लेकिन जब बड़े और मंझोले किसान के बच्चे गाँव से निकल कर शहर में नौकरी करने पर मजबूर कर दिए गए, किसानों की ताकत कम हुई और गाँव कमजोर हुए।

पहले गाँव में सब्जियां बिकती नहीं थीं, क्योकि सबके घर के आँगन के कोने, छप्पर या खांड में सब्जियां होती थी। गरीब लोग भी दुधारू मवेशी और बकरियां पालते थे, लेकिन आज खांड या आँगन में सब्जियां उगाने की प्रथा ख़त्म हो गयी।

मंझोले और बड़े किसानों के गाँव से निकल जाने से गाँवों में अराजकता की हालत है। ज़मीनों पर अतिक्रमण बड़े पैमाने पर हुआ है। गाँव के पोखर, तालाब, खत्ता, पाइन सबको भरकर खेत और घर बना दिए गए। अब तो लोग नदियों को भर भर कर घर बना रहे हैं। गाँवों की गलियाँ लगातार संकरी होती जा रही हैं। कोई रोकने टोकने और पूछने वाला नहीं है।

जबसे पंचायती राज की पुनर्स्थापना हुई है और विकास के नाम पर दिल्ली से गाँवों तक हर साल करोड़ों रुपये भेजे जाने लगे हैं तबसे गाँव के वार्ड मेंबर से लेकर विधायक तक और रेवेन्यु कर्मचारी से लेकर सीओ और बीडीओ तक विकास से ज्यादा लूट में व्यस्त हैं।

ग्लोबलाइजेशन के बाद सरकारें विकास के नाम पर गाँव गाँव सड़क और बिजली पहुंचाने को सबसे बड़ा विकास बता रही हैं, लेकिन ये नहीं बता रही हैं कि इन सडकों और बिजली के बहाने उद्योगपतियों को विशाल बाज़ार उपलब्ध करा रही है।

आम नागरिकों को भले विकास का झुनझुना पकड़ा दिया गया है, लेकिन वास्तविकता ये है कि इसके कंधे पर ग्लोबलाइजेशन की पालकी गाँव में उतारी जा रही है। ताकि देशी-विदेशी कम्पनियां गाड़ी से लेकर सर्फ़ की पुडिया और कोल्ड ड्रिंक तक गाँवों में बेच सके।

हद तो यह हो चुकी है कि बाज़ार से लाकर सब्जियां तक बेची जा रही हैं। दही दूध भी ब्रांडेड कम्पनियों के बिक रहे हैं। मैगी से लेकर चिप्स तक बेचे जा रहे हैं।

किसान का आलू बिक नहीं पा रहा और किसान का बेटा चिप्स का पैकेट बाज़ार से खरीद कर खा रहा है। स्थानीय किसान का टमाटर नहीं बिक रहा, लेकिन दुकानों में अलग अलग कंपनियों के टोमैटो केचअप सजे हैं।

गाँव की नदियों के बालू, पानी सब सरकार ठेके पर दे रही है, नतीजा है किसी को बालू चाहिए तो बाज़ार से खरीदिये। पहले नदी में पानी लगभग सालों भर होते थे, और जिसका मन होता था, मछली पकड़ लेता था, लेकिन अब नदी में ना पानी रहा, ना मछली।

जहां कहीं है भी तो टेंडर हो चुका है, इसलिए मछलियाँ भी अब बाहर से आती हैं। और आपको जानकार हैरत होगी कि बालू से लेकर मछली का कारोबार देश में लाखों करोड़ का हो गया है।

गाँव के नदी, पोखर, पाइन में पानी सालों भर या कम से मार्च तक तो होते ही थे, अब गाँव में न पोखर तालाब बचे, ना नदी में पानी। नतीजा है पानी के लिए गाँवों में हाहाकार मचा है। पानी की बोतलें अलग अलग कंपनियों की लगातार आ रही हैं, लेकिन गाँवों में जल स्तर लगातार नीचे जाते जा रहा है। लेकिन सरकार परेशान नहीं है।

पानी के नाम पर वाटर हार्वेस्टिंग उपकरण लगाए जा रहे हैं। ये नहीं हो रहा कि पोखर, तालाब और नदी को सूखने और अतिक्रमण से बचाएं। पर्यावरण को उजाड़ने का काम सरकारें और उनके द्वारा पोषित उद्योगपति पहले करते हैं, फिर पर्यावरण के नाम पर पेड़ लगाने का खर्चीला ढोंग किया जाता है।

इसी तरह सरकारी स्कूलों-कॉलेजों को सरकारों ने सुनियोजित तरीके से खस्ताहाल किया, ताकि शिक्षा को बाज़ार बनाया जा सके। महंगे प्राइवेट स्कूल, कोचिंग क्लासेज, इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज आज खूब तेजी से फूल फल रहे हैं, लेकिन सरकारी स्कूल लगातार बंद हो रहे हैं। क्यों ?

यह भी ग्लोबलाइजेशन और उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का ही तरीका है। भारत सरकार का बीएसएनएल घाटे में है, कर्मचारियों की छंटनी हो रही है, जबकि रिलायंस का जिओ देश को सबसे सस्ता नेटवर्क उपलब्ध करवा रहा है !

सरकारी बैकों से ज्यादा अच्छे प्राइवेट बैंक साबित हो रहे हैं क्यों ? सरकारी कम्पनियां लगातार प्राइवेट हाथों में बेचे जाने की तैयारी चल रही है क्यों ? और हद तो यह है कि आम नागरिकों के मन में भी बिठा दिया गया है कि सरकारी कर्मचारी ठीक से काम नहीं करते, खामखा परेशान करते हैं, जबकि प्राइवेट वाले तुरंत सर्विस देते हैं।

इसलिए अच्छा है कि सारी सरकारी कंपनियों को प्राइवेट के हवाले कर दिया जाय। विडम्बना तो देखिये रेलवे को भी प्राइवेट हाथों में देने की तैयारी है।

ये सब क्या है ? क्यों है ? दुःख की बात है कि हमारे देश की बहुसंख्य आबादी इस बात को समझ नहीं पा रही है। सच यह है कि यह जो विकास और सुख सुविधा हमारे सामने परोसा जा रहा है, उसकी भारी कीमत हमसे वसूली जा रही है।

ग्लोबलाइजेशन हमारी सुख शान्ति लील रहा है। यह केवल बाजार को ध्यान में रखकर आगे बढाया जा रहा है। आम आदमी की कीमत यहाँ बस मजदूर या उपभोक्ता की है। आप लाखों रुपये खर्च कर बेटे-बेटी को पढ़ा रहे हैं और पढ़ लिखकर वह किसी कॉर्पोरेट कंपनी में गुलामी करने को मजबूर है।

उसे अच्छी सेलेरी दी जा रही है, लेकिन बदले में उसका पूरा समय ले लिया जा रहा है। और महंगी शिक्षा के चलते जो पढ़ नहीं पा रहे, वो लाचार मजदूर बनने को अभिशप्त हैं।

और चिंता की बात यह है कि कोई सरकार विकास के नाम पर तो कोई राष्ट्रवाद के नाम पर आम जनता को बेवकूफ बना रही है। सच ये है कि नेता और बड़े नौकरशाह अपने तात्कालिक फायदे के लिए न केवल देश बल्कि देश के युवा को भी उद्योगपतियों के हाथ बेच रहे हैं।

आम आदमी को इस विकास का अर्थ समझना होगा, तभी यह देश बचेगा, नहीं तो एक बार गुलामी की राह पर चल पड़े हैं हम। ये मानसिक और आर्थिक गुलामी का दौर है।

आप पर शासन करने के लिए गोरों, कालों और हरे नीलों को आपके देश आने की ज़रुरत नहीं है। आपके देश के नेता खुद उनके एजेंट बने हैं। और आप हैं कि फूले नहीं समा रहे।

वक्त को पहचानिए, नहीं तो एक बार फिर आपकी पहचान खो जायेगी और इस बार शायद गांधी आपके देश में ना जन्में!

Share Button

Related News:

अभिनेता कादर खान के निधन की खबर अफवाह
देश के इन 112 विभूतियों को मिले हैं पद्म पुरस्कार
'कमल' खिलते ही त्रिपुरा में व्लादिमीर लेनिन की मूर्ति पर चलाया बुल्डोजर
नक्सलियों ने नोटबंदी के समय BJP MLC को दिए थे 5 करोड़ !
...और खून से लथपथ इंदिरा जी का सिर अपनी गोद में रख सोनिया चल पड़ी अस्पताल
अजातशत्रु स्तूपा को लेकर भारतीय पुरातत्व विभाग बना अंधा, छेड़छाड़ जारी
इमरान का संसद में बयान- कल भारत लौटेंगे अभिनंदन
खूंटी के इस गर्त में जाने की हैैं कई वजहें
जॉर्ज साहब चले गए, लेकिन उनके सवाल शेष हैं..
5 साल की सजा के 48 घंटे बाद ही जमानत पर यूं रिहा हुआ सलमान
बेटी का वायरल फोटो देख पिता ने लगाई फांसी, छोटे भाई ने भी तोड़ा दम
सुरक्षा गार्ड की दानवताः 6 वर्षीय बच्ची की पहले गला दबा की हत्या, फिर शव संग किया रेप
सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर दिये अहम फैसले, ये आपको जानना है जरुरी
‘लालू के खिलाफ आपस में मिले थे सुशील मोदी, नीतीश कुमार, राकेश अस्थाना और पीएमओ’
JUJ के पत्रकारों को सुरक्षा और न्याय के संदर्भ में झारखंड DGP ने दिये कई टिप्स
बिहार के सभी आंचलिक पत्रकारों की है यही राम कहानी
युवा तुर्क छात्र नेता कन्हैया का यहां से लोकसभा चुनाव लड़ना तय
घाटी का आतंकी फिदायीन जैश का 'अफजल गुरू स्क्वॉड'
कमिश्नर के घर जाने वाली CBI टीम को कोलकाता पुलिस ने हिरासत में लिया
राजगीर के कथित जर्नलिस्ट के होटल समेत कईयों को नोटिश, मामला मलमास मेला की जमीन पर अवैध कब्जा का
हाई कोर्ट ने खुद पर लगाया एक लाख का जुर्माना!
यहां टेंडर मैनेज कराने वाले सीएम क्या रोकेगें भ्रष्टाचार : बाबू लाल मरांडी
जयंती विशेष: के बी सहाय -एक अपराजेय योद्धा
बिहार की ये तिकड़ी संभालेगें इन राज्यों की कमान, शिक्षा माफियाओं के दवाब में हटाए गए मल्लिक?

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Loading...
loading...
» पुण्यतिथिः जब 1977 में येदुरप्पा संग चंडी पहुंचे थे जगजीवन बाबू   » कैदी तबरेज तो ठीक, लेकिन वहीं हुए पुलिस संहार को लेकर कहां है ओवैसी, आयोग, संसद और सरकार?   » डॉक्टरी भी चढ़ गयी ग्लोबलाइजेशन की भेंट !   » विकास नहीं, मानसिक और आर्थिक गुलामी का दौर है ये !   » एक ऐतिहासिक फैसलाः जिसने तैयार की ‘आपातकाल’ की पृष्ठभूमि   » एक सटीक विश्लेषणः नीतीश कुमार का अगला दांव क्या है ?   » ट्रोल्स 2 TMC MP बोलीं- अपराधियों के सफेद कुर्तों के दाग देखो !   » जब गुलजार ने नालंदा की ‘सांसद सुंदरी’ तारकेश्वरी पर बनाई फिल्म ‘आंधी’   » आभावों के बीच राष्ट्रीय खेल में यूं परचम लहरा रही एक सुदूर गांव की बेटियां   » मुंगेरः बाहुबलियों की चुनावी ज़ोर में बंदूक बनाने वाले गायब!  
error: Content is protected ! india news reporter