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‘लोकनायक’ के अधूरे चेले ‘लालू-नीतीश-सुशील-पासवान’

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पटना  (जयप्रकाश नवीन)। “खलक खुदा का मुलुक बाश्शा का—-  हुकुम शहर कोतवाल का, …हर खासो-आम को आगाह किया जाता है ….कि खबरदार रहें — और अपने-अपने किवाडो को अंदर से — कुंडी चढ़ाकर बंद कर ले,…गिरा ले खिडकियों के परदे…… और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजे…  क्योंकि… एक बहतर वर्ष का बूढ़ा आदमी….. अपनी कांपती आवाज में ….सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है “

धर्मवीर भारती ने यह कविता उस समय लिखी थी जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण का ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन अपने चरम पर था। बहतर वर्ष के इस क्रांतिवीर ने तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई थी।

तब धर्म वीर भारती की कविता प्रासंगिक कही जा सकती थी।लेकिन इस आंदोलन के 43 साल  बाद फर्क इतना है कि बस बाश्शा की शक्ल बदल गई है,आत्मा वही है।आम आदमी आज भी पीस रहा है और बादशाह मजे में हैं । आज वही बादशाह है, जो कभी जेपी के चेले हुआ करते थें ।

जिस जेपी ने “संपूर्ण क्रांति” का नारा दिया, जो संपूर्ण क्रांति के नायक थें, लेकिन जेपी के कथित चेले आज भी बिहार में उनके अधूरे चेले माने जाते हैं ।

1974 में जेपी जिन आदर्शों और मूल्यों को लेकर चले थे वे संपूर्ण क्रांति के रूप में कुछ  परिभाषित और कुछ अपरिभाषित रहे ।उनके आंदोलन की पैदाइश सरकारों और उनके कथित चेले इस क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया यह सर्वविदित है।

संपूर्ण क्रांति आंदोलन से उपजी सरकारें और जेपी के चेलो की करतूतो ने उस आंदोलन के मूल्यों और आदर्शों को मटियामेट करने का काम किया है।उपर से उनकी ढिठाई देखिए जेपी आंदोलन में भागीदारी की बात काफी करते है, लेकिन असल राजनीतिक जीवन में उनके आदर्श को ,उनके सिद्धांतों को उतारने का संकल्प नहीं लेते हैं ।

बिहार की राजनीति में आज सभी बड़े चेहरे जो लोकनायक के द्वारा चलाए गए ‘संपूर्ण क्रांति’ के रंगरूट रहे वो आज देश और राज्य की राजनीतिक में भागीदार हैं ।

जेपी के दाहिने हाथ माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान के बीच एक बात समान रही और वो ये कि इन सभी नेताओं का करियर एक ही सियासी अखाड़े से लगभग एक ही समय में हुआ।

जेपी आंदोलन में छात्र नेता के रूप में उभरे और बुलंद मुकाम हासिल की।बिहार से निकल कर ये सभी राज्य और केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हैं । जिस जेपी ने नैतिकता, ईमानदारी तथा सादगी का जीवन जिया, पद लिप्सा से वह कोसो दूर रहे, राष्ट्र निर्माण का अनिवार्य आधार मानकर उसे सुदृढ़ करने के अभियान में आजीवन लगे रहें।

लेकिन आज उनके यही कथित चेले नैतिकता, ईमानदारी, राजनीतिक सुचिता को ताक पर रखकर सतालोलुप और भोगी बन चुके हैं ।सता के संर्घष में सारी मर्यादा लांघ चुके हैं । घटिया बयान बाजी और शब्द व्यंग्य वाण ऐसे होते है जैसे लगता है आपस में कुते बिल्ली लड रहा हो।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आजादी के पहले अंग्रेजों को भगाने के लिए सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूँका था ।आजादी के बाद वही जेपी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा आंदोलन छेडते हैं ।संपूर्ण क्रांति का आह्वान करते हैं। उन्हें कभी सत्ता का मोह नहीं रहा ।कभी कांग्रेस में रहे जेपी कांग्रेस की इंदिरा गांधी की दमनकारी नीति और भ्रष्ट सत्ता उनसे देखी नहीं गई।

उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई, और ऐसी आवाज उठी कि इंदिरा गांधी की सिंहासन ही डोल गई।सता जेपी के आंदोलन से डर गई।देश में आपातकाल लागू करना पड़ा।मीसा कानून अस्तित्व में आ गई ।जेपी समेत सैकड़ों नेताओं के साथ लगभग 30 हजार लोगों को जेलों में ठूस दिया गया ।

आपातकाल के बाद घोषित आम चुनाव में जेपी की संपूर्ण क्रांति का ही असर था कि 1977 के इस आम चुनाव में” जनता आगे और नेता पीछे ” रही। हालाँकि बाद के सालों में जेपी के शिष्यों ने ही अपने स्वार्थ हित और सतालोलुपता के कारण उनके सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी।

जेपी आंदोलन की सबसे बड़ी उपज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार की राजनीति में डेढ़ दशक तक एकछत्र राज्य किया ।वे स्वयं कई बार केन्द्रीय मंत्री रहें ।

लेकिन बिडम्बना देखिए जेपी ने जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति आंदोलन का नेतृत्व किया, और जिस क्रांति में कभी लालू प्रसाद यादव शामिल हुए थें ।

आज वही लालू प्रसाद यादव और उनका पूरा परिवार भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपति में फंसा हुआ है। लालूप्रसाद स्वंय चारा घोटाला मामले में सजायाप्ता हैं।

जेपी के दूसरे शिष्य बिहार के सीएम नीतीश कुमार सत्ता के खेल में अपना पाला बदलते आ रहे हैं ।लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने जेपी के भूलाए जाने पर नीतीश कुमार पर तंज भी कसा था ।

जबकि एक अन्य शिष्य रामविलास पासवान राजनीतिक मौसम वैज्ञानिक माने जाते हैं। जिनके बारे में कहा जाता है, जो सत्ता में होता है, रामविलास पासवान उसका पल्ला पकड़ लेते हैं ।

जेपी जिस मतलब परस्त और दलगत राजनीति से दूर रहे रामविलास पासवान उतना ही करीब । रामविलास पासवान कभी जेपी के विचारों को समझ ही नहीं पाए।

जेपी वंशवाद के खिलाफ थे। लेकिन आज जेपी के शिष्य इसके समर्थक हैं । संपूर्ण क्रांति के ये नायक (कथित चेले) अपने कुनबे को राजनीतिक विस्तार देने में लगे हुए हैं।

लालू प्रसाद यादव ने तो पत्नी राबडी देवी से लेकर दोनों बेटों और बेटी मीसा भारती को मैदान में उतारे हुए हैं । रामविलास पासवान भी भाई और पुत्र मोह में फंसे हुए हैं ।

इसके अलावा अन्य शिष्य अपने सगे संबंधियों तथा बेटों के राजनीतिक कैरियर के लिए टिकट बंटबारे के दौरान या तो मुँह फूला लेते है या फिर पाला ही बदल डालते हैं ।

अपने बयानों में बदजुबानी दिखाने वाले जेपी के ये कथित चेले उनका स्थान लेना तो दूर, जेपी के इर्द गिर्द भी नही पहुंच सकें।आपस में सभी एक दूसरे पर  जेपी जो करना चाहते थे, उसे अपने जीवन काल में मूर्त रूप नहीं दे सकें, उनका संपूर्ण क्रांति का सपना आज भी अधूरा है। इसका प्रमुख कारण वे सिर्फ़ जेपी के नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं, उनके सिद्धांतों को राजनीतिक जीवन में कभी उतारने का प्रयास नहीं किया ।

जेपी को लगा था कि राजशक्ति और लोकशक्ति के समंवय से देश में परिवर्तन होगा लेकिन ऐसा न हुआ ।प्रतिनिधि वापसी का अधिकार जनता को मिले इसे जेपी के आशीर्वाद से बनी सरकार और चेलों ने सिरे से खारिज कर दिया।

आज फिर से जेपी के सभी चेले एक मंच पर या फिर अलग-अलग जयंती पर उन्हें याद करेंगे लेकिन उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, नैतिकता, समाजसेवा, उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास नहीं करेंगे ।

जेपी को लगा था कि राजशक्ति और लोकशक्ति के समन्वय से देश में परिवर्तन होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ । प्रतिनिधि वापसी का अधिकार जनता को मिले इसके लिए भी संर्घष किया था ।लेकिन जेपी के आशीर्वाद से बनी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया ।

तभी तो जेपी के बाद न तो लालू प्रसाद और न ही नीतीश कुमार उनका स्थान ले सकें ।भले ही ये बिहार की राजनीति के कदावर नेता मानें जाते हों लेकिन जेपी की तरह उनका कद दूर-दूर तक नहीं दिखता हैं । तभी तो ये जेपी के अधूरे चेले कहें जाते हैं ।

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