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रोंगटे खड़े कर देने वाली इस अंधविश्वासी परंपरा का इन्हें रहता है साल भर इंतजार

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“इनकी मान्यताएं हैं कि पेट की नाभि के पास की चमड़ी मोटी होती है, उस स्थान पर गर्म छड़ से दागने पर बच्चों में पेट से संबंधित बीमारियां नहीं होती….”

INR. कड़ाके की ठंड.. क्या बच्चे.. क्या बूढ़े, क्या जवान सभी इस सर्द मौसम में रजाई के भीतर आराम करते सूर्य देव के निकलने का इंतजार करते हैं। उसके बाद ही उनकी शुरू होती है दिनचर्या।

लेकिन कोल्हान की धरती अनोखी परंपराओ के लिए जानी जाती रही है। यहां आज भी पारंपरिक अंधविश्वास पर आस्था भारी है। पूरा कोल्हान कड़ाके की ठंड में ठिठुर रहा है, उधर यहां का संथाल समुदाय मकर संक्रांति के अहले सुबह सूर्योदय से पहले अपने दुधमुंएं मासूम पर अत्याचार करने के लिए घंटों लाईन में खड़े हैं।

कारण आज इन मासूमों को गर्म छड़ से दागा जाएगा, जिससे ये मासूम सदा के लिए निरोग हो जाएंगे….। अब आप समझ सकते हैं, आज भी यहां किस प्रकार से आस्था पर अंधविश्वास हावी है।

आम तौर पर जो मां अपने बच्चों को सीने से लगाकर इस कड़ाके की में रजाई के भीतर रहती है, वहीं संथाल समाज की माएं अपने दुधमुंहे बच्चों के शरीर पर गर्म लोहे से दाग लगवाती है।

झारखंड का आदिवासी समुदाय आज भी परंपराओं का वाहक है, लेकिन 21 वीं सदी के झारखंड में परंपरा के नाम पर मासूमों पर इस प्रकार का अत्याचार…

आखिर क्या कर रहा है, समाज का शिक्षित वर्ग ! क्या इन मासूमों पर अत्याचार के किसी  सटीक कारण को आज का विज्ञान परिभाषित करता है ?

जबकि इनकी मान्यताएं हैं कि पेट की नाभि के पास की चमड़ी मोटी होती है, उस स्थान पर गर्म छड़ से दागने पर बच्चों में पेट से संबंधित बीमारियां नहीं होती। अब इन महिलाओं को कौन समझाए..।

वैसे समाज के बुद्धिजीवी भी इस परंपरा को बंद करने के पक्षधर हैं, लेकिन पहल करने की हिमाकत किसी में नहीं है। सरायकेला, जमशेदपुर और चाईबासा के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ये परंपरा जिंदा है।

अब सरकार को इस दिशा में कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि इन मासूमों पर अत्याचार बंद हो सके।

 

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