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राम भरोसे चल रहा है झारखंड का बदहाल रिनपास

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सरकार 11 साल के बाद भी संस्थान को चलाने के लिए एक स्थायी निदेशक की नियुक्ति तक नहीं कर सकी है…..”

(INR). झारखंड सरकार का इकलौता मानसिक स्वास्थ्य संस्थान रांची तंत्रिका मनोचिकित्सा एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (रिनपास) स्वयं सरकार एवं इसके आला अधिकारियों की उपेक्षा के कारण बदहाली की ओर जा रहा है।

अधिकारियों के जवाबदेही से बचने का आलम यह है कि रिनपास के प्रभारी निदेशक को ही स्थायी निदेशक नियुक्ति के मापदंड तैयार करने की जिम्मेवारी सौंप दी गई है। इसपर अभी भी कार्य चल रहा है।

जबकि निदेशक की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास है तथा स्वास्थ्य विभाग को इस जिम्मेवारी को पूरा करवाना है। ऐसे में विभाग के वरीय पदाधिकारियों को ही इसका मापदंड का निर्धारण अपने स्तर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिनपास के संबंध में दिए गए निर्णय में निहित प्रक्रिया और मानदंड के आधार पर किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रतिवर्ष संस्थान की मॉनिटरिंग करने वाले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सुझाव पर भी स्वास्थ्य विभाग और सरकार आंखें बंद किए हुए हैं। इससे संस्थान की व्यवस्था चरमरा गई है। यह फिर से रांची मानसिक आरोग्यशाला की हालत की ओर जाता दिख रहा है।

रिनपास में 500 महिला और पुरुष मरीजों को भर्ती कर इलाज करने की व्यवस्था है। इसके ओपीडी में प्रतिदिन औसतन 350 मरीज ओपीडी में आते हैं। एडमिशन की मांग इतनी है कि 500 की जगह 600 मरीज संस्थान में रखने पड़ रहे हैं। लेकिन इसके कुल 670 सृजित पदों में से 416 पद रिक्त हैं।

ऐसे में मरीजों की देखभाल के स्तर की सहज कल्पना की जा सकती है। मनोचिकित्सा विभाग में मात्र दो शिक्षक हैं। जबकि 12 पद रिक्त हैं। मेंटल हेल्थ एक्ट के अनुसार 10 मरीज पर एक मनोचिकत्सक की जरूरत है।

मनोचिकित्सक प्राध्यापकों के पदों के रिक्त होने से एमडी और डीपीएम में सीटें बढ़ाने को एमसीआई से मंजूरी नहीं मिल पा रही है। 130 नर्सों के पदों में केवल 43 ही कार्यरत हैं। 72 मेल वार्डर में 34 तथा 36 महिला वार्डर की जगह 19 कार्यरत हैं।

दुखद बात यह है कि रिनपास में ग्रुप सी और डी के पदों की नियुक्ति नियमावली ही नहीं बन पाई है। ग्रुप ए और बी का बनाया गया है, लेकिन उसको अभी तक सरकार की मंजूरी नहीं मिली है।

साथ ही संस्थान के बॉयलाज को भी सरकार की मंजूरी नहीं मिल सकी है। इसके अभाव में संस्थान में विगत कुछ वर्षों में निर्माण, खरीद, नियुक्ति, प्रोन्नति में बड़े घपले घोटाले हुए हैं।

मानवाधिकार आयोग ने रिनपास के प्रबंधकारिणी समिति का पुनर्गठन करने का सुझाव राज्य सरकार को दिया है। स्पेशल रिपोर्टियर एस जालजा ने अपने आब्जर्वेशन और सुझाव का विस्तृत प्रतिवेदन राज्य के मुख्य सचिव को 20 दिसंबर 2016 को ही भेजा था।

वहीं आयोग के संयुक्त सचिव जयदीप सिंह कोचर ने पत्र भेजकर सरकार से इसपर जल्द कार्रवाई करने को कहा था। लेकिन इसपर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। रिपोर्ट में मौजूदा प्रबंधकारिणी समिति का पुनर्गठन करते हुए इसका अध्यक्ष प्रमंडलीय आयुक्त दक्षिणी छोटानागपुर की जगह विकास आयुक्त को बनाने का सुझाव दिया गया है।

समिति में झारखंड और बिहार के स्वास्थ्य सचिव सदस्य हैं। वहीं मुख्य सचिव और प्रधान सचिव समाज कल्याण इसके विशेष आमंत्रित सदस्य हैं।

उन्होंने संदेह जताया कि ये सभी वरीय पदाधिकारी प्रमंडलीय आयुक्त की अध्यक्षता वाली कमेटी की बैठक में शायद ही भाग लेंगे। उन्होंने समिति में प्रधान सचिव वित्त के सदस्य के रूप में नहीं होने पर चिंता जताई है।

कहा है कि रिनपास की नीतिगत और खर्च संबंधी मामलों में वित्त विभाग का अनुमोदन आवश्यक है। इसके साथ ही समिति में प्रख्यात मनोचिकित्सकों और एनजीओ प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की सलाह दी है।

वहीं प्रमंडलीय आयुक्त की अध्यक्षता में एक एग्जिक्यूटिव कमेटी बनाकर संस्थान की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को संभालने की जिम्मेवारी सौंपने का सुझाव दिया है।

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