राजनीतिक नेपथ्य में धकेले गए राम मंदिर आंदोलन के नायक और भाजपा का भविष्य

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INR. एक समय अयोध्या में  राममंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया था। पिछले चार दशक से इस मुद्दे पर एक खास राजनीतिक दल ने जमकर सियासी रोटियां सेंकी हैं।

लेकिन आज उसी दल ने इस मुद्दे के साथ राम मंदिर आंदोलन के नायकों को भी भूल गई है। राम मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं को राजनीतिक हाशिए पर धकेला जा रहा है।

90 के दशक के पूर्व देश में राम मंदिर आंदोलन की लहर सी चल पड़ी थी।  लालकृष्ण आडवाणी राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे।

इसी मुद्दे की बुनियाद पर 1989 के लोकसभा के चुनाव में नौ साल पुरानी बीजेपी दो  सीटों से बढ़कर 85 पर पहुंच गई थी। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज केंद्र व देश के 19 राज्यों की सत्ता पर काबिज होकर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी बनी हुई है।

राम मंदिर आंदोलन  के मुद्दे से  भाजपा आज केंद्र में एक ताकतवर सरकार के रूप में उभरी हुई है। दूसरी बार भी सत्ता में वापसी को लेकर मैदान में मजबूती से डटी हुई है।

राम मंदिर आंदोलन के प्रणेता और नायक भाजपा की राजनीति पटल से आज गायब हैं।उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है। भाजपा में अटल,आडवाणी और जोशी युग समाप्त हो गया है।

उनके जगह एक ताकतवर नेता पीएम नरेंद्र मोदी ने जगह स्थापित कर ली है। राम मंदिर के शलाका पुरुष लालकृष्ण आडवाणी भी इस बार राजनीतिक नेपथ्य में चले गए हैं।

साथ ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई अन्य दिग्गजों का भी पार्टी ने बेटिकट कर दिया है। राम मंदिर के सभी नायकों के लिए पार्टी ‘खलनायक’ बनकर उभरी है।

राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लगभग सभी   वरिष्ठ नेताओं को भाजपा ने इस बार बेटिकट कर दिया है। जिससे वें चुनाव मैदान में नहीं है। राम मंदिर आंदोलन के शलाका पुरुष और राम रथ यात्रा के के नायक लालकृष्ण आडवाणी को इस बार भाजपा ने टिकट नहीं दिया है।

राम मंदिर आंदोलन के दौरान रथयात्रा के कारण लालकृष्ण आडवाणी सुर्खियों में आए थे जहां उन्हें बिहार में लालू प्रसाद की सरकार ने गिरफ्तार किया था। उनकी गिरफ्तारी ने उन्हें रातों रात भाजपा में हीरो बना दिया था। 

राम रथ यात्रा और लालकृष्ण आडवाणी के व्यक्तित्व की ही यह देन थी कि  1991 में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े जिन लोगों को भाजपा ने टिकट दिया था  वें सभी सांसद बन गए।

भाजपा में अटल -आडवाणी और जोशी युग की शुरुआत हो चुकी थी। राम मंदिर आंदोलन से जुड़े एक और दिग्गज  वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को पिछले बार कानपुर से टिकट मिला था। लेकिन इस बार उनके साथ भी बीजेपी का रवैया उपेक्षित रहा।

मुरली मनोहर जोशी भी लालकृष्ण आडवाणी की तरह  तिरंगा यात्रा निकालकर सुर्खियों में आएं थे। उन्होंने  दक्षिण भारत से लेकर कश्मीर तक तिरंगा यात्रा निकाली थी। यहाँ तक कि उन्होंने  कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा भी  फहराया था।फिर वहाँ से यह यात्रा अयोध्या पहुँची थी।

राम मंदिर आंदोलन के  तीसरे बड़े हीरो विनय कटियार भी भाजपा की राजनीति में हाशिए पर हैं। श्री कटियार  अयोध्या में रहकर राम मंदिर आंदोलन चलाने का श्रेय उन्हें जाता है। उन्हें भी इस बार टिकट नहीं मिला है। जबकि विनय कटियार भाजपा में एक कद्दावर नेता माने जाते थे।

राम मंदिर आंदोलन के एक और हीरो  जौनपुर और हरिद्वार से सांसद रहें स्वामी चिन्यमानंद सरस्वती भी राजनीतिक पटल से गायब है।जबकि वे अटलबिहारी सरकार में गृह राज्यमंत्री भी थे।

अयोध्या के राम जन्म भूमि न्यास के सदस्य भगवाधारी डा. रामविलास दास वेदांती मछली शहर तथा प्रतापगढ से सांसद रह चुके हैं। लेकिन भाजपा ने इन्हें  कहीं से टिकट नहीं दिया  है। वे टिकट नहीं मिलने से पार्टी से नाराज भी चल रहे हैं। उनके बयान भी  मीडिया में  आए थे कि भाजपा राम मंदिर के संकल्प को भूल चुकी है। जिसका परिणाम भाजपा को भुगतना पड़ सकता है।

राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी पंक्ति में रही भाजपा की एक बड़ी नेता  भगवा चोले वाली साध्वी उमा भारती भी इस बार बीजेपी की राजनीति से गायब हैं।

साध्वी उमा भारती एक समय  मंदिर आंदोलन के लिए अपने सिर के बाल मुडवा कर कार सेवकों के बीच पहुँच गई थी। गंगा सफाई योजना को लेकर साध्वी उमा भारती इन दिनों चर्चा में भी थी।

भाजपा के एक अन्य दिग्गज कलराज मिश्र अयोध्या से विशेष रूप से जुड़े रहे और हर आंदोलन में उनकी उपस्थिति देखी जाती थी। उन्हें भी उम्र का तकाजा बता कर चुनाव मैदान से बाहर कर दिया। वही भाजपा के पिछड़े वर्ग से आने वाले ओमप्रकाश वर्मा को भी पार्टी ने दरकिनार कर रखा है।

पार्टी के इस रवैये से समर्थकों में नाराजगी भी है। पार्टी की इस दोगली नीति को लेकर चर्चा जोरों पर है। पार्टी 75 साल के लोगों की टिकट काट रही है तो तो फिर अंबेदकर नगर से 75 वर्षीय मुकुट बिहारी वर्मा को टिकट बीजेपी ने कैसे दे दिया।

राम मंदिर आंदोलन के दौरान यूपी के सीएम रहे कल्याण सिंह उन दिनों जननायक के रूप में देखें जाते थे।

वहीं अकेले इस समय संवैधानिक पद पर हैं। वे एक मात्र राम मंदिर आंदोलन के नेता हैं, जो किसी पद पर हैं। बाकी को बीजेपी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है या फिर उनका टिकट काट दिया है।

भाजपा को सत्ता के केंद्र तक पहुँचाने में राम मंदिर आंदोलन का उल्लेखनीय भूमिका रही है। लेकिन भाजपा नेतृत्व ने राम मंदिर आंदोलन के नायकों को ही राजनीतिक नेप्थय में धकेल दिया है।

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