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राजनीतिक दोस्तों के भी रियल ‘शत्रु’ हैं बिहारी बाबू !

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‘दुश्मनी जमकर करों, लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हों जाएँ तो शर्मिन्दा न हो’

……उर्दू शायर वशीर बद्र की यह पंक्ति बिहार के सबसे हॉट सीट ‘पटना साहिब’ लोकसभा सीट पर फिट बैठती हैं जहाँ दो राजनीतिक दोस्तों की दोस्ती और शत्रुता भी चुनाव में देखने को मिलेगी।

पटना (जयप्रकाश नवीन)। राजनीति वो तिलिस्म है जहां जनता से किए जाने वाले वादे और सत्ता के बड़े दावे एक साथ गूंजते हैं; क्योंकि राजनीति की दुनिया में परदे के पीछे साम, दाम, दंड, भेद हर वो तरीका आजमाया जाता है जो नेताओं को पहुंचा सके सत्ता के करीब।

आम आदमी की चौखट से निकल कर सत्ता की दहलीज तक पहुंचने में नेताओं को ना जाने कितने चक्रव्यूह तोड़ने पड़ते हैं और इस पूरी कवायद में जब कभी नेता की राह में कोई रुकावट खड़ी होती है या फिर पार्टी के प्रति उनकी वफादारी और प्रतिबद्धता का इनाम नहीं मिलता है तो वो हो जाते हैं ‘बागी’।

ऐसे ही भाजपा के एक ‘बागी’ सांसद सिने स्टार शत्रुहन सिन्हा तीसरी बार पटना साहिब लोकसभा सीट पर हैट्रिक की तैयारी में है।

इस बार वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। जहां उनका मुकाबला केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से होगा।

1992 से उनके राजनीतिक जीवन की एक नियति बन गई हैं, जहाँ राजनीति में अपने दोस्त के लिए रियल ‘शत्रु’ बनकर उभरते हैं ।

पटना साहिब का अपना इतिहास रहा है। इसी  ऐतिहासिक पटना साहिब नगरी में चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। यहाँ एक बार फिर से नई स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। जहाँ सियासत का घमासान है, रोमांचकता है, दोस्ती है और फिर ‘शत्रु’ की शत्रुता भी है।

पटना साहिब लोकसभा सीट पर दो दोस्तों के बीच कठिन संघर्ष का महौल तैयार हो रहा है।जहां ‘दोस्ती’ और ‘शत्रुता’ के बीच मुकाबला 19 मई को होगा।

शॉटगन शत्रुहन सिन्हा के सामने एक बार फिर से दोस्ती की ‘अग्निपरीक्षा’ है। इससे पहले उन्होंने 1992 में दिल्ली उपचुनाव में अपने जिगरी दोस्त सिने अभिनेता राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ा था, जिसमें वें 27000 मतों से हार गए थे। राजेश खन्ना भले ही चुनाव जीत गए, लेकिन दोनों की दोस्ती में ऐसा खटास आया कि राजेश खन्ना मरते दम तक ‘शत्रु’ के शत्रु ही रहे।

स्वयं शत्रुहन सिन्हा भी स्वीकार करते हैं कि राजेश खन्ना के साथ उनका चुनाव लड़ना उनके जीवन की एक बड़ी भूल थी। इस भूल की वजह से उन्होंने एक अच्छा दोस्त खो दिया ।

पटना साहिब लोकसभा से दो बार सांसद रहे अभिनेता शत्रुहन सिन्हा भाजपा से  35 साल पुराने रिश्ते का ब्रेकअप कर कांग्रेस के हाथ के साथ तीसरी बार चुनाव मैदान में है। जहां इस बार उनका कड़ा मुकाबला अपने ही राजनीतिक मित्र केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से हो रहा है।

1992 के बाद से सिने अभिनेता शत्रुहन सिन्हा के राजनीतिक जीवन की यह नियति बन गई है कि वे राजनीति में अपने दोस्तों के लिए’शत्रु’ ही बन जाते हैं। उनका यह तीसरा मौका होगा, जब उनके सामने उनके अंतरंग मित्र ही उनके लिए चुनौती होंगे ।

सबसे पहले उन्होंने दिल्ली लोकसभा का उपचुनाव लड़ा था, जहां उनका मुकाबला अजीज राजेश खन्ना से था। जहां से चुनाव भी हारे और दोस्त भी खो दिए।

दूसरी बार 2009 में पटना साहिब से इनके मित्र और टीवी कलाकार शेखर सुमन कांग्रेस की टिकट पर इनके सामने चुनाव मैदान में थे। जहां श्री सिन्हा ने एक बड़े अंतर से अपने मित्र शेखर सुमन को शिकस्त देकर पहली बार लोकसभा पहुँचे थे।

इस बार फिर पटना साहिब में उनके लिए दोस्ती की ‘अग्निपरीक्षा’ होगी।जहां उनके राजनीतिक मित्र ही नहीं बल्कि करीबी केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद आमने सामने होंगे ।

पटना साहिब लोकसभा में छह विधानसभा क्षेत्र है और कुल मतदाताओं की कुल संख्या 21 लाख 36 हजार है।। नये परिसीमन में पटना साहिब भाजपा के लिए सुरक्षित सीट माना जाता है। 

तभी तो भाजपा के शत्रुहन सिन्हा ने 2009 में टीवी कलाकार और कांग्रेस प्रत्याशी शेखर सुमन को बड़े मतों के अंतर से पराजित किया था।

2014 में भी श्री सिन्हा ने ढाई लाख से ज्यादा मतों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे। लेकिन इस बार परिस्थितियाँ बदल गई है।

सिने स्टार शत्रुहन सिन्हा कांग्रेस के टिकट पर यहाँ से चुनाव मैदान में है। जहाँ उनका मुकाबला केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से होना है।

फिलहाल अन्य उम्मीदवार अभी मैदान में नहीं आए हैं, लेकिन शिवसेना की ओर से युवा प्रत्याशी सुमित रंजन सिन्हा के मैदान में आने की चर्चा है। वही कभी बीजेपी से टिकट की संभावना तलाश रहे अशोक गुप्ता निर्दलीय मैदान में आ चुके हैं ।

पटना साहिब लोकसभा चुनाव में हैट्रिक का सपना देख रहे शत्रुहन सिन्हा के लिए राहे आसान नहीं दिखती। कायस्थ, वैश्य और यादव बहुल ‘साहिब’ में श्री सिन्हा का गणित गड़बड़ा रहा है। पिछली बार पौने पांच लाख मतदाताओं ने उन्हें पसंद किया था। लेकिन अब पासा पलट गया है।

पटना साहिब क्षेत्र में दस लाख से ज्यादा कायस्थ मतदाता है।जो भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता है। कायस्थ सिने स्टार शत्रुहन सिन्हा से इसलिए भी नाराज है कि वे समाज के लिए सर्व सुलभ नहीं होते है।

बिहारी बाबू ने जिनके समर्थन पर दस साल तक सत्ता में मलाई चाटी, वे सब उनके खिलाफ दिखते हैं। यहाँ तक कि कांग्रेस का एक धड़ा भी उनके उम्मीदवारी के खिलाफ है।

पिछले बार भाजपा से रहते हुए श्री सिन्हा ने दो लाख पैसठ हजार मतों से चुनाव जीता था । इस बार वहीं वोट उनके लिए परेशानी बन सकती है। अपने ही जीत के अंतर को पाटना उनके लिए मुश्किल दिख रहा है।

पटना साहिब से दोनों दोस्तों के बीच हार-जीत की सर्वव्यापी चर्चा होनी तय है। वही केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद अगर जीतते हैं तो भाजपा के दिल को इस गर्मी में बर्फ सी ठंडक मिल जाएंगी।

वहीं अगर श्री सिन्हा पटना साहिब का किला फतह कर लेते हैं तो बिहार में कांग्रेस को ताकत मिल सकती है। श्री सिन्हा का कद भी बढ़ जाएगा। वे राजनीति के महानायक बन कर उभर सकते हैं।

वहीं यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या शत्रुहन सिन्हा 1992 का दिल्ली लोकसभा उपचुनाव की तरह ‘साहिब’ सीट अपने दोस्त से हार जाएंगे या उस रिकार्ड को तोडेगे ? फिलहाल पटना साहिब लोकसभा का चुनाव अंतिम चरण में 19 मई को होना है। इसलिए ‘साहिब’ की जनता भी फिलहाल ‘खामोश’ है।

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