मिनिस्टर का कुत्ता VS महान गणितज्ञ वशिष्ठ बाबू का इलाज

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“हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है। लेकिन अब हमें इनके इलाज की नहीं, किताबों की चिंता है। बाक़ी तो यह पागल खुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया………… महान गणितज्ञ बशिष्ठ बाबू की भाभी प्रभावती ”

इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क। महान अर्थशास्त्री और गणितज्ञ जॉन फार्ब्स नैश ने नैश इक्वलीब्रियम दुनिया को दिया। लेकिन एक वक्त वो भी था, जब वो 1959 में सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हुए। अच्छा इलाज हुआ। बीमारी से उभरे और 1994 में नोबेल जीता। उन पर बहुत ही खूबसूरत फिल्म बनी “ए ब्यूटीफूल माइंड”। हमारे नैश कहां रहे ?

हमारे नैश राजधानी पटना शहर में रहे, लेकिन दूर रहने वालों की बात छोड़िए, उनके पड़ोसियों को भी इस बात की खबर नहीं। ये 70 साल का नैश ना जाने दिन भर दीवारों पर क्या गोदते रहे, कभी अमेरीका, कभी मनरेगा, कभी पाई, कभी एलजेब्रा…..जब लोग उनसे कहते कि उनकी गणित समझ नहीं आती तो वशिष्ठ दादा बड़े प्यार से बोलते, ‘पढ़ने से ही समझ में आएगा न’।

विश्व के दो प्रसिद्ध गणितज्ञ- जॉन नैश और वशिष्ठ नारायण सिंह। दोनों प्रॉडिजी। कम उम्र में ही दोनों सिद्ध-प्रसिद्ध! नैश अमेरिकी और भारतीय नागरिक वशिष्ठ Ph.D के लिए अमेरिका गए।

नैश पर उनकी एक छात्रा अलिशिया फ़िदा और अपुष्ट सूत्रों के अनुसार वशिष्ठ पर भी एक अमेरिकी बाला आसक्त। लेकिन उनका विवाह एक भारतीय नारी से। इसी बीच विस्फोटक प्रतिभा को स्कीजोफ़्रेनिक ग्रहण। यहाँ तक तो पलड़ा बराबर, मगर इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त क़दम रस्ते, कुछ तेज़ क़दम राहें!

नैश अमेरिकी थे, अमेरिका से बाहर जाते भी तो कहाँ। मगर वशिष्ठ अपनी क़ाबिलियत के बल पर अमेरिका गए थे। जब वही खंडित हो गई, तब वहाँ कौन बर्दाश्त करते उन्हें। लौटने के सिवा चारा क्या था। कोस सकते हैं अमेरिका को कि नासपीटे नवधनाढ्य ने हमारे बबुआ के लिए कुछ नहीं किया।

ख़ासकर तब जब आपको पता चलता है कि उसी अमेरिका ने नैश की नौकरी बरक़रार रखी। वहमों और बोध की गड़बड़ियों के बावजूद तनख़्वाह मिलती रही। वे meaningless research करते रहे।

अलिशिया ने उनसे विवाह किया और परछाईं बनकर साथ रही। हौले-हौले वे काफ़ी ठीक हुए। और एक वह दिन भी आया, जब प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के शिक्षक और छात्र उन्हें अपनी क़लमें देते नज़र आए। और नैश विस्मित। यह क्या?  उन्हें ‘Game Theory’ के लिए नोबेल मिला। यह उनका स्कीजोफ़्रेनिक ग्रहण के पूर्व का शोध था।

आइए अब वशिष्ठ की तरफ़ रुख करते हैं। वशिष्ठ भारत आए। उन्हें काम भी मिला। मगर रोग बढ़ रहा था और वे अपने काम के साथ न्याय नहीं कर पा रहे थे। तो कोई उनकी मदद कब तक करता।

भारत कोई अमेरिका थोड़े ही है कि सरकारी नियम ताक़ पर रख दिए जाते। मुँहदेखी होती तो एक महान लोकतंत्र और उसकी नैतिक छवि ध्वस्त न हो जाती। लिहाज़ा वशिष्ठ उच्छिष्ट भोजन की तरह रीसर्च के रसोई घर से बाहर।

अब ऐसे में उनकी पत्नी क्या क्या करतीं। सब कुछ खो चुके वशिष्ठ का साथ देतीं तो उनका क्या होता। उन्होंने सोच-समझकर अलग रास्ते पर चलने का निर्णय लिया।

नैश और अलिशिया की प्रेमकथा परवान चढ़ी। ख़ूब साहचर्य निभा। बच्चे भी हुए। मान-सम्मान की तो जैसे झड़ी लग गई। वे सारी दुनिया में आमंत्रित होते रहे। नैश को सुनना कपास हुए धागे को फिर से धागा बनने की कोशिश करते हुए देखने जैसा था।

मई 2007 का वह दिन कोई कैसे भूल सकता है, जब American Psychiatric Association के San Diego conference में उन्हें सुना गया। हर ख़ूबसूरत चीज़ ख़त्म होती है। दो साल पहले नूअर्क एयरपोर्ट से प्रिंसटन जाते वक़्त एक कार दुर्घटना में दोनों दिवंगत हो गए। दोनों एक साथ गए। इस अद्भुत प्रेमकथा का अंत भी कम रोमांटिक नहीं।

वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। मगर हर 24 मई को दुनिया-भर में नैश की प्रेमकथा का का छोटा-बड़ा पाठ होता है। और वशिष्ठ बाबू इधर अपने गाँव में रहे, बिलकुल न होने की तरह!

वही वशिष्ठ बाबू, जिन्होंने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी। उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था।

पटना साइंस कॉलेज में बतौर छात्र ग़लत पढ़ाने पर वह अपने गणित के अध्यापक को टोक देते थे। कॉलेज के प्रिंसिपल को जब पता चला तो उनकी अलग से परीक्षा ली गई, जिसमें उन्होंने सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ दिए।

वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में पढ़ते थे, तभी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी। कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए।

साल 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। नासा में भी काम किया, लेकिन मन नहीं लगा और 1971 में भारत लौट आए।

पहले आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी बंबई, और फिर आईएसआई कोलकाता में नौकरी की।

इस बीच 1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह से हो गई। घर वाले बताते हैं कि यही वह वक्त था, जब वशिष्ठ जी के असामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चला।

छोटी-छोटी बातों पर बहुत ग़ुस्सा हो जाना, पूरा घर सर पर उठा लेना, कमरा बंद करके दिन-दिन भर पढ़ते रहना, रात भर जागना उनके व्यवहार में शामिल था। वह कुछ दवाइयां भी खाते थे, लेकिन वे किस बीमीरी की थीं, इस सवाल को टाल दिया करते।”

इस असामान्य व्यवहार से वंदना भी जल्द परेशान हो गईं और तलाक़ ले लिया। यह वशिष्ठ नारायण के लिए बड़ा झटका था।

तक़रीबन यही वक्त था जब वह आईएसआई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे। कई प्रोफ़ेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया और यह बात उनको बहुत परेशान करती थी।

साल 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा। जिसके बाद शुरू हुआ उनका इलाज। जब बात नहीं बनी तो 1976 में उन्हें रांची में भर्ती कराया गया। घर वालों के मुताबिक़ इलाज अगर ठीक से चलता तो उनके ठीक होने की संभावना थी। लेकिन परिवार ग़रीब था और सरकार की तरफ से मदद कम।

1987 में वशिष्ठ नारायण अपने गांव लौट आए। लेकिन 89 में अचानक ग़ायब हो गए। साल 1993 में वह बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए।

उसके बाद मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिताते रहे। किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त रही…………………💐💐✍😥💐💐💐💐💐

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