‘भाजपा भगाओ-देश बचाओ’ से साबित, लालू आज भी सबसे बड़े कद्दावर नेता

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पटना (जयप्रकाश)। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में राजद द्वारा आयोजित “भाजपा भगाओ” रैली भी ऐतिहासिक रही। गठबंधन टूटने के बाद से ही इस रैली की सफलता पर संदेह व्यक्त किया जा रहा था। उपर से कई जिलों में बाढ़ की भयावह स्थिति के बाद लगने लगा था कि रैली में भीड़ नहीं होगी। लेकिन सभी अनुमानों को झुठलाते हुए रैली में अप्रत्याशित भीड़ से राजद समेत सभी विपक्षी दल के नेता खुश जरूर होंगे ।

यह रैली भाड़े पर लाई गई भीड़ के रूप में नही थी। न ही पैसे का प्रलोभन देकर गाड़ियों में ठूस ठूसकर लाई गई थी। भले ही “भाजपा भगाओ” रैली थी लेकिन पिछले महीने के घटनाक्रम के बाद यह रैली “आक्रोश रैली” में परिवर्तित हो गई ।

पहले जहाँ भाजपा को भगाने की बात हो रही थी, वही इस रैली के बहाने नीतीश कुमार पर भी हमला किया गया।

लालू शरद से लेकर तमाम बड़े छोटे नेताओं ने इस मंच से नीतीश पर गठबंधन तोड़ने और जनादेश के अपमान का आरोप लगाया ।

रविवार को राजद द्वारा पूर्व निर्धारित “भाजपा भगाओ” रैली की अभूतपूर्व सफलता के बाद साफ हो गया है कि बिहार में तमाम उतार चढ़ाव के बीच आज भी राजद सुप्रीमो लालूप्रसाद का जलवा जनता के बीच कायम है।

चारा घोटाला से लेकर कई अन्य घोटाले,  विवादों, जंगल राज से लेकर बेनामी संपति का मामला हर बार लगा वे राजनीति में हाशिए पर चलें जाएंगे। बिहार की राजनीति में 15 साल लालू-राबडी का एकछत्र राज करने के बाद 2005 में सत्ता से बेदखल हो गए।

दस साल तक बिहार की सत्ता से दूर रहने के बाद लगा था, अब बिहार में लालू युग का अंत हो गया । लेकिन राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है ।

2015 में अचानक बिहार की राजनीति में उलटफेर के बीच बीस साल के बाद लालू-नीतीश एक साथ हुए। दोनों ने बिहार में कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया। सफलता भी मिलीं। लालू प्रसाद यादव की राजद को 100 में 80 सीटें मिली।

नीतीश एक बार फिर सीएम बनें तो लालूप्रसाद के दोनों पुत्र तेजस्वी डिप्टी सीएम तो तेज प्रताप स्वास्थ्य मंत्री। लेकिन राजनीति में घोटालों का भूत पीछे पड़ा रहा। मिट्टी घोटाला तथा बेनामी संपति का भूत लालू प्रसाद के पुत्र और बेटी दामाद के पीछे लग गया ।

सीएम नीतीश कुमार के लिए डिप्टी सीएम गले की फांस बन गए । अंत में नीतीश कुमार के सामने इस्तीफा देने के सिवा बचा कुछ नहीं। चूँकि लालू प्रसाद ने 27 अगस्त को भाजपा भगाओ रैली गठबंधन में बने रहने के पहले ही तय कर रखी थी।

लालू प्रसाद के व्यक्तित्व की यह खासियत रही है कि तमाम झंझावतों के बीच वह गरीबों और अतिपिछडों के बीच लोकप्रिय रहे हैं । राजनीति में विदूषक के रूप में पहचान रखने वाले राजद सुप्रीमो हमेशा देसी कहावतों और देहाती मुहावरों से हंसाकर लोट पोट कर देते हैं । लोकसभा में उनकी अंग्रेज़ी बोलने की शैली पर जोरदार ठहाके लगते थें। हर कोई उनके भाषा शैली से प्रभावित रहा है ।

बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद रैलियों के महारथी रहे हैं । गाहे बगाहे अपनी शक्ति का प्रदर्शन रैलियों के माध्यम से करते रहे हैं ।
1995 में जब वे बिहार के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने इसी गांधी मैदान में गरीब रैली की थी।

1996 में गरीब महारैला ने रैलियों के सहारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया था । सामाजिक न्याय का नारा बुलंद कर गरीब गुरबों के दिल पर तबसे उनका राज हो गया ।

1997 फिर   से गरीब -महागरीब महारैला कर अपनी ताकत दिखाने का काम किया ।जनता के बीच उनकी एक कहावत”जब तक समोसे में रहेगा आलू तब तक बिहार में रहेगा लालू” काफी लोकप्रिय रही।

2004 लालू प्रसाद एक बार फिर  अपनी रैली से सूर्खियां बटोरी,जब उन्होंने “लाठी रैली “की।यह रैली भी अपने आप में ऐतिहासिक कही जाएगी । इस रैली के बहाने लालू प्रसाद पर नीतीश समेत भाजपा तथा अन्य दलों ने चुटकी भी ली कि जमाना अब लाठी का नहीं रहा कलम का है ।

2007 में उन्होंने ” चेतावनी रैली” तथा 2012 में “परिवर्तन रैली ” कर अपने विरोधियों को पस्त करते रहे हैं । जब-जब लालू प्रसाद को लगा उनकी राजनीतिक सांख खतरे में है, तब-तब समय के साथ रैली कर अपने विरोधियों को जबाब देते हैं । यही उनकी राजनीतिक शैली रही है ।

आज की महारैली ने साबित कर दिया है कि लालू प्रसाद यादव का जादू जनता के बीच आज भी कायम है । “भाजपा भगाओ” रैली की अपार सफलता के बाद एक बार फिर साबित हुआ लालू प्रसाद रैली के महारथी ऐसे ही नहीं है । आज की भीड़ देखकर बंगाल की सीएम ममता दीदी ने भी लालू प्रसाद का लोहा माना और कहा कि भीड़ जुटाने की कूबत लालूजी में हैं । वे ग्रासरूट के नेता हैं ।

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