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भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए आत्म मंथन का जनादेश

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पांच राज्यों के परिणामों में दिखा लोकतंत्र का आईना….

INR(संतोष कुमार). पांच राज्यों में चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। इन पांच में से तीन राज्यों में जनादेश मोदी- शाह के खिलाफ गया है। यहां भाजपा के खिलाफ जनादेश नहीं कह सकते। कारण कि भाजपा के पास आज की तारीख में मोदी शाह के अलावा और कोई अन्य चेहरा नहीं है।

वैसे जब चुनावों में जीत हो तो मोदी मैजिक, हार का ठीकरा किसके सिर मढ़ा जाए। हालांकि गुजरात चुनाव से भजपा ने सबक नहीं ली, जहां ग्रामीण मतदाताओं ने भाजपा को सिरे से खारिज कर दिया था।

वैसे भाजपा यहां सरकार बनाने में सफल रही। लेकिन ऱाजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा फिर से ग्रामीण मतदाओं का विश्वास जीतने में नाकाम रही है, जिसका खामियाजा तीनों राज्यों में भाजपा को उठाना पड़ा है।

तीनों हिन्दी राज्यों में ग्रामीण मतदाओं की संख्या अधिक है, और तीन में से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तो शुद्ध रूप से किसानों का राज्य माना जाता है। ऐसे में किसानों और ग्रामीण मतदाताओं ने भाजपा और केंद्र की नीतियों को सिरे से खारिज कर दिया है। हालांकि तेलंगाना और मिजोरम में तो भाजपा और कांग्रेस दोनों की दुर्गति हुई है।

मतलब साफ है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है। जनता को आप अधिक दिनों तक गुमराह नहीं कर सकते। जनता को परिणाम चाहिए। हालांकि पांच राज्यों के परिणाम ने लोकतंत्र का वह आईना ला कर दोनों ही बड़ी पार्टियों के समक्ष रख दिया है, जिसमें दोनों ही बड़ी पार्टियां खुद का आकलन कर 2019 में जनता के समक्ष जाए तो बेहतर होगा।

एंटी इनकंबेंसी बताना गलत…..

पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजों को भाजपा एंटी इनकंबेंसी बता कर पल्ला झाड़ती नजर आ रही है, लेकिन इससे प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए मुश्किलें कम नहीं होंगी।

इस जनादेश का सम्मान प्रधानमंत्री और अमित शाह को करते हुए हार की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी। क्योंकि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई है, वहां मोदी लहर और जहां हार हुई है वहां एंटी इनकंबेंसी बताकर बच नहीं सकते।

ये मुद्दे हो सकते हैं, जिनकी वजह से भाजपा की हार हुई है….

पांचों राज्यों में कहीं भी केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों पर जनता को विश्वास में लेने में नाकाम रहे प्रधानमंत्री। नोटबंदी, एससी/ एसटी एक्ट कानून में बदलाव, आरक्षण नीति में बदलाव, महंगाई, पेट्रोल और डीजल के दामों में बढोत्तरी, किसानों और मजदूरों से दूरी, इन सभी मुद्दों ने भाजपा को सत्ता से दूर कर दिया।

भारत को चीन जापान अमेरिका रूस की श्रेणी में प्रधानमंत्री लाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर आज भी उस स्थिति में नहीं है कि आप उन प्रगतिशील राष्ट्रों के इर्द-गिर्द भी  खड़े रह सके।

निश्चित तौर पर 60 साल बनाम 5 साल काफी छोटा अवधि होता है, लेकिन आपने जनता से 60 साल के बदले 60 साल नहीं मांगा था। जनता आपकी योजनाओं का सीधा लाभ नहीं ले पा रहे।

आप अपनी योजनाओं पर आत्ममंथन करें और जरा जमीनी हकीकत जानकर देखें। उज्जवला योजना निश्चित तौर पर गरीबों के लिए एक बेहतरीन योजना हो सकता है, लेकिन मुफ्त गैस कनेक्शन, मुफ्त गैस चूल्हा मिलने के बाद गैस की कीमतों में बढ़ोतरी  के कारण क्या इस योजना के  लाभुक वास्तव में इस योजना का लाभ ले पा रहे हैं या इन्हें मुफ्त कनेक्शन मुफ्त चूल्हा जो दिया गया है, वह शोकेस की शोभा बढ़ा रहे हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना निश्चित तौर पर एक बेहतरीन योजना मानी जा रही है, लेकिन इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए राज्य सरकार वर्षों से बनी झुग्गी झोपड़ियों और बस्तियों को उजाड़ कर एक बड़े वर्ग की नाराजगी उठा रही है। इसका भी खामियाजा सत्ताधारी दल को उठाना पड़ रहा है।

आरक्षण नीतियों में बदलाव इस योजना के माध्यम से केंद्र सरकार एक वर्ग को खुश करने के लिए दूसरे वर्ग से दूरी बना रही है। एससी एसटी एक्ट में संशोधन हुआ तो जरूर लेकिन ज्यादातर मामलों में इस एक्ट का दुरुपयोग देखा जा रहा है। यह भी एक बड़ा कारण सत्ताधारी दल को सत्ता से दूर करने के रूप में माना जा रहा है।

आयुष्मान भारत योजना इस योजना के तहत आज भी लाभुक सही लाभ नहीं उठा पा रहे, बिचौलिया राज जस का तस बना हुआ है। ऐसे कई मुद्दे हैं जो भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर कर रहा है।

जरूरत है तो 2019 से पहले इन नीतियों पर सख्ती से पालन करने की और संशोधित कानूनों में व्यापक बदलाव की अन्यथा 2019 का जनादेश और भी भयावह हो सकता है।

कांग्रेस के लिए आत्ममंथन जरूरी……

5 में से 3 राज्यों में कांग्रेस की वापसी हुई है। निश्चित तौर पर 2019 से पहले कांग्रेस के लिए इन राज्यों में जीत एक बड़ी सौगात के रूप में देखी जा रही है।

राहुल गांधी बेहद ही कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर कर सामने आए हैं, लेकिन इस जीत से कांग्रेस को सतर्क रहना होगा और ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे 2019 में फिर से कांग्रेस सत्ता के आसपास भी नजर नहीं आ सके।

यहां जरूरत है इन राज्यों की जनता से किए गए वायदों पर खरा उतरने की। आज महागठबंधन में कांग्रेस एक मजबूत दावेदार के रूप में उभर कर आई है, लेकिन बिहार उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस को जमीन तलाशने के लिए गठबंधन के साथ जाना पड़ सकता है।

ऐसे में इन बड़े राज्यों में कांग्रेस नेतृत्व के साथ सहयोगी दल जाएंगे या नहीं यह भी एक बड़ा सवाल हो सकता है। गरीबों और किसानों के लिए स्पष्ट नीति कांग्रेस शासित राज्यों में बनाकर 2019 के लोकसभा में भुनाने का एक अच्छा अवसर कांग्रेस के पास हो सकता है।

भाजपा शासित राज्यों के लिए सबक…..

पांच राज्यों के जनादेश ने भाजपा शासित राज्यों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। ऐसे में 2019 से पहले इन राज्यों में भाजपा को सतर्कता बरतनी होगी। जहां सरकारी योजनाओं को जन- जन तक पहुंचाने के लिए भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर काम करने की आवश्यकता है।

अधिकारियों और अफसरशाही पर लगाम लगाने की आवश्यकता है। राज्यों को अपनी नीतियां बनानी होगी, इसके साथ ही उन नीतियों पर जनता का विश्वास भी हासिल करना होगा। क्षेत्रीय मुद्दों पर सरकार को सख्ती से जन भावनाओं का कद्र करते हुए उसे निपटाने की आवश्यकता है।

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