बिहार चुनाव पूर्व लिट्टी-चोखा पर चर्चा से पहले उसकी महिमा तो जान लीजिए मेहरबां

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INR (पटना डेस्क).प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के एक कार्यक्रम ‘हूनर हाट’ में लिट्टी-चोखे का स्वाद क्या लिए राजनीतिक गलियारे में लिट्ठी-चोखे को लेकर हंगामा मच गया।पीएम मोदी द्वारा बिहारी व्यंजन के रूप में मशहूर लिट्ठी-चोखा का स्वाद लेना राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया।

सोशल मीडिया पर इसे लेकर चटखारेदार चर्चा होने लगी कि कहीं बिहार में चुनाव तो नही आ गया। जदयू ने तो बिहार में नारा ही दे डाला ‘लिट्ठी-चोखा खायेंगे,नीतीश को बिहार जीतायेगे।’

लिट्टी चोखा बिहार का एक मशहूर व्यंजन माना जाता है।इसे आम जनता का खानपान के रूप में भी देखा जाता है। जो अब अमूमन संभ्रांत वर्ग का भी पसंदीदा भोजन माना जाता है। बिहार में लिट्टी-चोखा को सिगनेनचर डिश के रूप में दर्जा प्राप्त है।

हालाँकि व्यंजन बनाना आमतौर पर काफी पेचीदा होता है। उन्हें बनाने में कई सामाग्री के साथ मेहनत भी बहुत लगती है। इस हिसाब से लिट्टी को व्यंजन तो नहीं कह सकते हैं।लेकिन इसे व्यंजन के रूप में ही देखा जाता है।

लिट्टी गुत्थे हुए आटे की लोई का गोला होता है। जिसमें सतु का इस्तेमाल होता है। लेकिन कभी-कभी  लोग इसे सादे लिट्टी और भरवां लिट्टी दोनों बनाए और खाएँ जाते हैं। इसके साथ चोखा का भी इस्तेमाल होता है।जो बैंगन या फिर टमाटर का भी हो सकता है।

इसे बनाने में ज्यादा सामानों की जरूरत भी नहीं पड़ती है। कभी कभार तो सिर्फ़ आटे से ही लोग लिट्टी बना लेते हैं। लेकिन समय के साथ लिट्टी-चोखा में भी बदलाव देखने को मिला है। यह अब बिहार से दूसरे राज्यों में आसानी से मिल जाता है।

सड़क किनारे लगें ठेले ही नहीं बल्कि बड़े -बड़े होटलों में भी लिट्टी-चोखा मेन्यू में शामिल है। वही शादी-समारोह में भी लिट्टी-चोखे का क्रेज ज्यादा दिखता है। आपको आसानी से लिट्टी-चोखे का स्टॉल मिल जाएगा, जहाँ मधुमक्खियों की तरह लोगों की भीड़ लगी रहती है।

लिट्टी-चोखा विशुद्ध रूप से आम आदमी या यह भी कह सकते हैं कि गरीब -गुरूबों का भी भोजन है।पिछले कुछ सालों में बिहारी कामगारों के देशभर में फैले होने के कारण इसके ठेले दूसरे राज्यों में दिखाई देते है। एक समय लिट्टी-चोखा महानगरों की पहुँच से दूर था। लेकिन अब बहुतायत दिखाई देते है।

अगर सेहत के हिसाब से देखें तो यह तले हुए समोसे से बेहतर होते है। हालाँकि घी में चुपडी लिट्टी की बात ही कुछ और होती है। सड़क किनारे मिलने वाले लिट्टी चोखे अब गैर बिहारियों की भी पसंद बनती जा रही है।

कुछ लोगों को इसमें लिपटी राख से सोंधी खुशबू आती है। जो अपनी मिट्टी की खुशबू को महसूस करते हैं। समय के साथ लिट्टी को मटन और चिकन के साथ खाने की परंपरा भी चल पड़ी है।

 लिट्ठी-चोखा का गढ़ मगध का इलाका यानी गया, पटना और जहानाबाद रहा है। इसके अलावा भोजपुर इलाके में भी लिट्टी का बहुत क्रेज है।  चंद्रगुप्त मौर्य जब मगध के सम्राट थे, तब उनकी राजधानी पाटलिपुत्र थी, लेकिन उनका साम्राज्य अफगानिस्तान तक फैला था।

उस दौरान चंद्रगुप्त के सैनिक युद्ध के दौरान लंबे रास्तों में लिट्टी जैसी चीज खाकर आगे बढ़ते जाते थे।  18वी शताब्दी में भी कई किताबों में इसका वर्णन मिलता है,जब लंबी यात्रा के दौरान यात्री लिट्टी बनाकर अपने साथ ले जाते थे। कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक बाटी या लिट्टी को पसंद करते थे।

1857 के विद्रोह के समय भी विद्रोही सैनिकों द्वारा लिट्टी का बहुतायत उपयोग किया जाता था। बिहार के माटी से निकला लिट्टी-चोखे की खुशबू अब राजनीतिक रंग लेने लगी है।भले ही पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा लिट्टी-चोखा खाना महज एक संयोग रहा हो।लेकिन मीडिया और दूसरे माध्यमों ने इसे राजनीतिक रंग में ढाल दिया है।

विपक्ष इसे चुनावी रंग दे रहा है तो वही बिहार में भाजपा की सहयोगी नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास कर रही है। उसने लिट्टी-चोखे पर अपनी पार्टी की ओर से एक नारा भी दिया है,”लिट्टी-चोखा खायेगे, नीतीश को ही जितायेगे।’

दिल्ली विधानसभा चुनाव हारने के बाद पीएम की नजर बिहार पर है। ऐसे में पीएम मोदी के द्वारा दिल्ली ‘हूनर हाट’ में लिट्टी-चोखा खाना महज एक संयोग माना जाएँ या फिर प्रयोग?  इसका पता तो बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ही चलेगा जब लिट्टी-चोखे की चर्चा होंगी।

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