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बिहार के इस टोले का नाम ‘पाकिस्तान’ है, इसलिए यहां सड़क, स्कूल, अस्पताल कुछ नहीं

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“न कोई नेता आता है, न सरकारी बाबू। मुखिया भी कभी नहीं आता। बस मीडिया वाले आते हैं और फ़ोटो खींचकर चले जाते हैं….” गोद में एक साल का बच्चा लिए दुबली पतली नेहा एक सुर में बोले जा रही थीं। वो अपनी छोटी सी किराने की दुकान में खड़ी थीं।

साभारः पाकिस्तान टोला (पूर्णिया) से बीबीसी हिंदी के लिए सीटू तिवारी की ग्राउंड रिपोर्ट…

उनकी दुकान में अभिनेता अमिताभ बच्चन की तस्वीर वाला ‘लाल ज़ुबान चूरन’, दुल्हन नाम का गुल (पुराने लोगों का एक तरह का टूथपेस्ट जिसमें नशा भी होता है) से लेकर रोज़मर्रा का छोटा-मोटा सामान है।

बमुश्किल 40 रुपये रोज़ाना कमाने वाली नेहा पाकिस्तान में रहती हैं। हैरान मत होइए ये ‘पाकिस्तान’, हिंदुस्तान में ही है।

जी हां, जिस हिंदुस्तान में आजकल पाकिस्तान का नाम सुनते ही लोगों की भवें तन जाती हैं, उसी मुल्क में पाकिस्तान नाम की भी जगह है।

बिहार के पूर्णिया ज़िला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर श्रीनगर प्रखंड की सिंघिया पंचायत में पाकिस्तान टोला है।

350 मतदाताओं वाले इस टोले की कुल आबादी 1200 है। टोले का नाम पाकिस्तान कैसे पड़ा, इसका बहुत पुख्ता जवाब किसी के पास नहीं है।

टोले के बुज़ुर्ग यद्दु टुडु बताते हैं, “यहां पहले पाकिस्तानी रहते थे। आज़ादी के बाद उन्हें सरकार ने दूसरी जगह भेजकर बसा दिया। फिर हमारे पूर्वज यहां आकर बस गए। लेकिन पहले यहां पाकिस्तानी रहते थे। इसलिए बाप-दादा ने वही नाम रहने दिया। किसी ने बदला नहीं। और आस-पास के टोले वालों ने कोई दिक्कत भी नहीं की।”

पाकिस्तान टोला में संथाली आदिवासी रहते हैं। जो हिन्दू धर्म का पालन करते हैं। टोले में जगह-जगह आपको मिट्टी से पुता हुआ एक डेढ़ इंच ऊंचा चबूतरा मिलेगा जिस पर छोटे-छोटे दो शिवलिंगनुमा ईश्वर बने हैं। लेकिन इन पर किसी तरह का कोई रंग नहीं लगा हुआ है।

टूटी-फूटी हिन्दी बोलने वाले ये संथाली परिवार खेती और मज़दूरी करके ही गुज़र बसर करते हैं। दरअसल ये पूरा इलाक़ा ही शहरी आबादी से कटा हुआ है। पाकिस्तान टोला को बाहरी आबादी से सिर्फ़ एक पुल जोड़ता है जो एक सूख चुकी नदी पर बना है।

श्रीनगर प्रखंड के स्थानीय पत्रकार चिन्मया नंद सिंह बताते हैं, “ओमैली के गज़ट में इस बात का उल्लेख है कि मूल कोसी नदी, जो अब सुपौल से बहती है वह 16वीं सदी में यहां बहती थी। उस नदी को हम आज कारी कोसी कहते हैं।

नदी की वजह से यह इलाका एक बिज़नेस प्वाइंट भी था। चनका पंचायत और पाकिस्तान टोले के बीच बड़े स्तर पर कपड़ों का कारोबार होता था। बाद में नदी की सूखती चली गई तो लोग इस पर खेती करने लगे।”

पाकिस्तान टोले में सरकार की कोई भी योजना नहीं दिखती। पेशे से ड्राइवर अनूप लाल टुडु पांचवीं तक पढ़े हैं। 30 साल के अनूप कहते हैं, “सारे टोलों में कुछ न कुछ सरकारी चिन्ह हैं लेकिन हमारे यहां आंगनबाड़ी, स्कूल कुछ भी नहीं है। क्योंकि हमारे टोले का नाम पाकिस्तान है।”

वो सवाल करते हैं, “हमारा जन्म तो पूर्णिया ज़िले में हुआ है। इस टोले का नाम पाकिस्तान है तो हमारी क्या ग़लती है?” अनूप की तरह नाराज़गी मनीषा में भी है। 16 साल की यह लड़की पढ़ना चाहती है लेकिन इलाक़े में कोई स्कूल नहीं है।

दोपहर का खाना बना रही मनीषा बताती हैं, “सातवीं तक 2 किलोमीटर पैदल जाकर पढ़ाई की लेकिन उसके बाद स्कूल पास में नहीं था तो पढ़ाई छूट गई। इस तरह सब लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। यहां अस्पताल और रोड भी नहीं है। कोई बीमार पड़ जाए तो रास्ते में ही मर जाएगा।”

दरअसल पाकिस्तान टोला से श्रीनगर प्रखंड के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की दूरी तकरीबन 12 किलोमीटर है। इस बीच जो उप-स्वास्थ्य केन्द्र हैं, उनमें स्थानीय लोगों के मुताबिक़ स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा टोले में सड़क भी नहीं है।

हालांकि यहां सड़क बनाने के लिए सरकार की ओर से राशि जारी हो चुकी है लेकिन अभी तक यहां सड़क बनना दूर की एक कौड़ी तक नहीं रखी गई है।

इसकी वजह बताते हुए सिंघिया पंचायत के मुखिया गंगा राम टुडु कहते हैं, “मनरेगा के तहत जिस जगह सड़क की मिट्टी भराई का काम होना है, वो सरकारी ज़मीन नहीं है। वो एक व्यक्ति की ज़मीन है जिसके चलते ये काम लटक गया है।”

स्थानीय लोग बताते हैं कि पाकिस्तान टोले के नाम को लेकर मीडिया में चर्चा साल 2006 के आसपास हुई। तब से यहां स्थानीय मीडिया का आना जाना लगा रहता है।

टोले में 30 घर हैं लेकिन औसतन पांचवीं तक पढ़े इस संथाली समाज में किसी के यहां अख़बार नहीं आता। सिर्फ़ सुरेन्द्र टुडु नाम के किसान के घर में दो साल पहले टीवी आया है।

सुरेन्द्र टुडु कहते हैं, “हम कभी-कभी समाचार देख पाते हैं। हमें पता चलता है कि पाकिस्तान से भारत का रिश्ता अच्छा नहीं है, लेकिन इससे हमारे टोले के नाम का क्या संबंध?”

सिंघिया पंचायत के पूर्व मुखिया प्रेम प्रकाश मंडल ने क़ानून की पढ़ाई की है। वो कहते हैं, “टीवी, अखबार यहां नहीं आते, इसलिए लोग प्यार से रहते हैं। वरना ये जगह कहीं और होती, तो इसका नाम बदलने के लिए आंदोलन हो जाते।”

पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र के लिए दूसरे चरण में चुनाव होने हैं लेकिन टोले में इसे लेकर कोई उत्साह नहीं है। टोले के तालेश्वर बेसरा कहते हैं, “क्या करेंगे, नेता आएगा, कुर्सी पर बैठेगा, फिर हम लोगों को छोटा आदमी बोलकर भूल जाएगा।”

पूर्णिया ज़िला भारत के सबसे पुराने ज़िलों में से एक है। साल 1770 में बने इस ज़िले में ऐसे अज़ब-ग़ज़ब नाम की भरमार है।

पूर्णिया ज़िले में श्रीनगर, यूरोपियन कालोनी, शरणार्थी टोला, लंका टोला, डकैता, पटना रहिका आदि नामों की जगह है, तो अररिया ज़िले में भाग मोहब्बत, किशनगंज में ईरानी बस्ती भी है।

लेखक और ब्लॉगर गिरीन्द्र नाथ झा कहते हैं, “पूरे सीमांचल में आपको ऐसे नाम मिल जाएंगे। लेकिन मीडिया को चूंकि अपने फ्रेम में पाकिस्तान नाम ही सबसे ज़्यादा जंचता है, इसलिए हर चुनाव में मीडिया वाले पाकिस्तान टोला ज़रूर जाते हैं। ये दीगर बात है कि टोले के हालात जस के तस हैं।”

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