फिल्म ‘छपाक’ रिव्यू : दीपिका पादुकोण की एक और बेहतरीन-उम्दा फिल्म

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JNU में बवाल के मामले में दीपिका पादुकोण के वहां वामपंथी रुझान वाले विद्यार्थियों का हाल जानने के लिए पहुंचने पर कुछ लोग उसकी आलोचना करते हुए छपाक के बॉयकॉट की बात कर रहे हैं इस मामले में आप चाहे लेफ्ट के साथ हों या राइट के अगर अच्छी फिल्म देखना पसंद करते हैं तो छपाक जरूर देखिए। अच्छी फिल्म है। उसका बहिष्कार कर आप एक अच्छी फिल्म से वंचित रहेंगे……”

✍ नवीन शर्मा

इंडिया न्यूज रिपोर्टर डेस्क। एसिड अटैक सरवाइवल लक्ष्मी अग्रवाल की सच्ची कहानी पर बनी छपाक फिल्म हिंदी सिनेमा में एक नया ट्रेंड सेट किया है। खासकर दीपिका पादुकोण के साहस की तारीफ की जानी चाहिए।

दीपिका ने पहले तो निर्माता के रूप में ऐसे गंभीर विषय पर फिल्म बनाने का रिस्क लिया जो मनोरंजक तो नहीं ही कहा जा सकता है। वहीं फिल्म निर्माण में पैसा लगाने से भी बड़ा रिस्क दीपिका ने एसिड अटैक सरवाइवल का लीड रोल निभा कर लिया है। ये रिस्क ज्यादा बड़ा इसलिए कहा जाएगा, क्योंकि दीपिका हिन्दी सिनेमा के वर्तमान दौर की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में शामिल हैं।

इतनी सुन्दर हीरोइन के पास दो घंटे की फिल्म में महज पांच दस मिनट ही अपनी खूबसूरती दिखाने का मौका था। फिल्म के बड़े भाग में तो उसे एसिड अटैक सरवाइवल की भूमिका निभानी थी जिसका चेहरा देखकर अनयास ही बच्चों की चिख तक निकल जाती है।

ऐसा भूत की तरह दिखने वाला चेहरा जिसे वह व्यक्ति खुद भी आईने में देखना पसंद ना करे। बार बार उसे दुपट्टे में छुपाते रहने की ही जद्दोजहद ताउम्र करनी पड़े। मुझे अभिनेत्री शर्मिला टैगोर से जुड़ा किस्सा याद आ रहा है।

शायद आराधना फिल्म में डबल रोल में एक में थोड़ी उम्र दराज महिला की भूमिका में बालों को सफेद दिखाने के लिए भी निर्देशक को उन्हें समझाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

सिरफिरे के हिंसा की शिकारः दीपिका ऐसी युवती की भूमिका में है जो अपने पड़ोस के रहने वाले टेलर बशीर खान (30साल.) के एकतरफा प्रेम के बाद एसिड अटैक की शिकार होती है। बशीर को दीपिका का अपने बॉयफ्रेंड से मिलना पसंद नहीं था।

बशीर उसके बॉयफ्रेंड राजेश को पीटता भी है। वो लड़की को सबक सिखाने के लिए परवीन शेख को बाइक पर साथ ले जाकर सराहनीय भरे बाजार में एसिड फेंकवाने का दुस्साहस करता है।

जिस समय दिल्ली की लक्ष्मी अग्रवाल के साथ ये नृशंस वारदात हुई थी उस समय एसिड अटैक को लेकर आइपीसी की धारा में बहुत ही मामूली सजा का प्रावधान था।

फिल्म की कहानी में दीपिका एनजीओ चलाने वाले विक्रांत मैसी और अपनी वकील की मदद से सुप्रीम कोर्ट तक अपने तथा एसिड अटैक की शिकार लोगों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ती है और एसिड की खुलेआम और धड़ल्ले से बिक्री पर रोक लगवाने और एसिड अटैक के आरोपी के लिए सजा की अवधि बढ़ाने में कामयाब होती है।

इन सारे घटनाक्रम के दौरान दीपिका और विक्रांत मैसी एक दूसरे को चाहने भी  लगते हैं। और कहानी की  हैप्पी एंडिंग होती है।

बेहतरीन एक्टिंगः दीपिका ने बहुत ही शिद्दत से अपने किरदार को समझा है और उसे पर्दे पर संवेदनशील ढंग से पेश करने में सफल रहीं हैं। एसिड अटैक जैसे जघन्य अपराध की विभीषिका और पीड़िताओं के दर्द को दर्शकों के दिल और दिमाग पर अंकित करने, उन्हें सोचने पर विवश करने में फिल्म सफल रही है।

मालती एक एसिड विक्टिम से को देखने जाती है तो वो लड़की मर जाती है। इस पर मालती का डॉयलॉग बहुत अंदर तक कचोटता है वो कहती है कि उसे मरने वाली लड़की से ईर्ष्या हो रही है।

इसकी वजह ये हैं कि एसिड अटैक या बुरी तरह जलने से मर जाने पर दर्द का अंत हो जाता है, लेकिन जिंदा रहने पर इसकी विभीषिका हमेशा वेताल की तरह ताउम्र पीठ पर सवार रहती है। वो कभी पीड़ित को चैन से जीने नहीं देती।

लेकिन मालती खुद कोशिश करती है कि वो इस सदमे से धीरे-धीरे ही सही उबरे। एक सामान्य लड़की की तरह जिंदगी की छोटी छोटी खुशियों को इंजोय करे। इसलिए तो वो अपनी जीत के हर पड़ाव को पार्टी मना कर सेलेब्रेट करना चाहती है। वो अमोल से साइलेंट प्यार भी करने लगती है और उचित मौके पर जाहिर भी करती है।

ये एक इंसपायरिंग मैसेज है फिल्म का जो एसिड अटैक के पीड़ितों को एक सामान्य जिंदगी जीने की राह दिखाता है। विक्रांत मैसी ने भी दीपिका का अच्छा साथ दिया है। वकील की भूमिका में   ने भी अच्छा अभिनय किया है।

मेकअप बहुत ही सटीक और विश्वसनीयः छपाक का मेकअप बहुत ही सटीक और विश्वसनीय था। एसिड अटैक के बाद लीड रोल निभा रही दीपिका और अन्य एसिड अटैक सरवाइवल युवतियों का मेकअप बहुत बढ़िया था।

इसके साथ ही मरीज की रिकवरी के लिए की गई सर्जरी और आपरेशन के दृश्य बहुत ही विश्वसनीय हैं। दर्शक को सचमुच लगता है कि आपरेशन हो रहा है।

फिल्म निर्देशक मेघना गुलजार ने एसिड अटैक जैसे संवेदनशील विषय पर छपाक जैसी बेहतरीन फिल्म बना कर एक बार फिर साबित किया है कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुलजार साहब की टेंलेंटेड बिटिया हैं।

मेघना की इस बात के लिए भी तारीफ करनी होगी को उन्होंने इतने गंभीर विषय को उठाने का साहस दिखाया है। एसिड अटैक तो वर्षों से होते रहे हैं। ऐसी घटनाएं मीडिया की सुर्खियां तक नहीं बनती, जब तक पीड़ित या फिर एसिड अटैक करने वाले मे से किसी एक की प्रोफाइल बड़ी ना हो। ये खबर या तो छपती नहीं है या ब्रिफ में निबटा दी जाती है।

पिछले एक दशक में जब से फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब चैनल जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म आए हैं, तब से ऐसी घटनाओं की चर्चा होने लगी है। इसकी वीभत्स रूप लोगों के सामने आने लगा है।

मेघना और दीपिका दोनों इस विषय पर फिल्म बनाने से पहले ये बात बहुत अच्छी तरह जानती थीं कि यह विषय इतना गंभीर है कि इसमें एंटरटेनमेंट की गुंजाइश नहीं है। इसलिए मेघना ने जबरदस्ती इसमें गाने ठूंसने की कोशिश नहीं की है। एक टाइटल गीत है गुलजार का लिखा हुआ, वो बहुत ही परफेक्ट बैठता है फिल्म में। वो इसकी संवेदनशीलता को और भी इटेंस बनाता है।

फिल्म का ट्रीटमेंट कहानी के हिसाब से सटीक है। फिल्म के वो दृश्य जिसमें दो तीन बार एसिड फेंका जाता है उन्हें देखकर संवेदनशील दर्शक अंदर तक सिहर जाता है।

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