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प्रियंका के इंकार के बाद रिंग में दस्ताने पहन यूं अकेले रह गए मोदी

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“कांग्रेस ने क्यों बनारस के चुनाव को ठंडा कर दिया, उसकी कई वजह हो सकती हैं। लेकिन एक बड़ी वजह है कि स्टार मुक़ाबले ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के विरुद्ध गए हैं….”

INR (प्रशांत टण्डन).  प्रियंका गांधी की बनारस से उम्मीदवारी को हवा देकर न लड़ाने का फैसला करके कांग्रेस ने मोदी को ज़ोर का झटका धीरे से दे दिया है।

मतलब शहर में एक दिलचस्प मुक़ाबले का डंका बज गया, टिकट बिक गए और स्टेडियम भी भर गया लेकिन बॉक्सिंग रिंग में दस्ताने पहने मोदी अकेले खड़े हैं।

अब मोदी अजय राय और शालिनी यादव के त्रिकोणीय मुक़ाबले में किसकी दिलचस्पी होगी। मोदी का रोड शो बनारस में उनका पहला और आखिरी इवेंट है, जिसमें मीडिया और बनारस के बाहर के लोगों की कोई उत्सुकता रही।

अब वहां तीन सप्ताह तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का डेरा नहीं होगा और न ही दिल्ली-मुंबई से “सेक्यूलर ब्रिगेड” के सिपाहियों का चुनाव टूरिज़म होगा जो आजकल बेगुसराय में अपने कैमरों के साथ गली गली घूम रहा है।

2014 में अरविंद केजरीवाल ने बनारस से मोदी को चुनौती दे डाली। केजरीवाल चुनाव हार गये, लेकिन दिल्ली के चुनाव में आम आदमी पार्टी को बनारस से लड़ने का फायदा मिला।

लेकिन उत्तर प्रदश के मैदान में एसपी बीएसपी और कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। देश दुनिया का मीडिया बनारस में जमा रहा और बीजेपी को पहले से मौजूद ध्रुवीकरण को प्रसारित करने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म बनारस से मिल गया।

और पीछे जायेंगे तो 1977 के रायबरेली का चुनाव भी इंदिरा गांधी और राज नारायण के बीच स्टार मुक़ाबला था। उस चुनाव में इंदिरा गांधी अपनी सीट भी हारीं और दिल्ली की सत्ता से भी गई।

1988 का इलाहाबाद का उपचुनाव भी ऐसी ही मिसाल है। बोफोर्स का मुद्दा उठा रहे वीपी सिंह के खिलाफ कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी। नतीजा कांग्रेस के सुनील शास्त्री चुनाव हारे और अगले ही साल 404 सीटें जीत कर आये राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गये।

2004 और 2009 के चुनाव में जिसमे कांग्रेस सत्ता में वापिस आई और बनी भी रही ऐसा एक भी मुक़ाबला नहीं हुआ।

यूपी और बिहार में इन चुनाव में एजेंडा सामाजिक न्याय की ताकते तय कर रही हैं। यूपी में एसपी-बीएसपी गठबंघन और बिहार में आरजेडी और उसके सहयोगी दल सामाजिक न्याय के मुद्दों और समीकरण से बीजेपी के ध्रुवीकरण को कड़ा मुक़ाबला दे रहे हैं।

कांग्रेस इन दोनों राज्यों में राष्ट्रीय मुद्दों पर मैदान में है लेकिन सामाजिक न्याय की ताकतों से एक सामंजस के साथ। बनारस की एक गलती तुरंत एक दूसरी लकीर खींच देती जिससे कांग्रेस ने अपने आप को बचा लिया।

मोदी और बीजेपी शिद्दत से चाहते थे कि चुनाव मुद्दों की जगह व्यक्तियों पर हो यानि मोदी के सामने कौन के सवाल पर। गांधी परिवार से प्रियंका के बनारस से लड़ने से बढ़िया मौका और कहां मिलता मोदी को ये बायनरी स्थापित करने के लिए।

फिलहाल तो बनारस, बागपत, मैंनपुरी, रायबरेली, अमेठी जैसी एक और वीआईपी सीट ही रह गई है।

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