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पटना साहिब सीटः एक अनार सौ बीमार, लेकिन…

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पटना साहिब संसदीय सीट को लेकर ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।  इस सीट के लिए एक मिथक चर्चित रहा है कि यहां जो भी चर्चाएँ और संभावनाएँ जहाँ से शुरू होती है, वही आकर खत्म भी होती है….”

-: जयप्रकाश नवीन :-

राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता है। राजनीति में संभावनाएँ कुछ भी हो सकती है। लोकसभा चुनाव में भले ही कुछ माह की देरी है, लेकिन बिहार के पटना साहिब  संसदीय सीट को लेकर राजनीतिक अटकल शुरू हो चुकी है।

पटना साहिब पहले पटना लोकसभा क्षेत्र के ही नाम से जाना जाता था।यहां से पहले सांसद श्री सारंगधर सिन्हा थे। 1962 में कांग्रेस से रामदुलारी सिन्हा के अलावा तीन बार भाकपा के रामवतार शास्त्री सांसद निर्वाचित हुए।

1977 में यहाँ से लोकदल के महामाया प्रसाद सिन्हा ने रिकॉर्ड 77 प्रतिशत वोटों से चुनाव जीता था। साथ ही सीपी ठाकुर एक बार कांग्रेस से तथा दो बार बीजेपी से जीत हासिल कर चुके हैं।

भाजपा के शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव भी अपना जलवा दिखा चुके हैं। वहीं राजद से रामकृपाल यादव तीन बार पटना का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। परिसीमन के बाद से पटना साहिब पर सिने स्टार शत्रुहन सिन्हा का कब्जा है।

फिलहाल यहां से सिने स्टार शत्रुहन सिन्हा सांसद हैं। लेकिन सियासी गलियारे से जो खबर निकल कर आ रही है,  उसके अनुसार सिने अभिनेता सांसद शत्रुहन सिन्हा का पता कटने की अटकल लगायी जा रही है।

ऐसे में सवाल बिहारी बाबू  का निशाना किधर होगा। शीर्ष नेतृत्व पर लगातार हमले के बाद भी बिहारी बाबू टिकट कटने से बेफिक्र काफी सुकून में दिखते हैं। इसके पीछे जरूर कुछ संकेत माना जाता है।

बीजेपी के द्वारा बिहार में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सीट बंटबारे को लेकर ट्वेंटी-ट्वेंटी फार्मूले की चर्चा तथा पटना साहिब सीट अपने सहयोगी जदयू के लिए छोड़ने की अटकलों के बीच भाजपा और जदयू में घमासान दिख रहा है।

भाजपा द्वारा सीट छोड़ने की अटकलों से जहाँ जदयू खेमे में कई लोग अपनी उम्मीदवारी को लेकर एड़ी चोटी एक कर रहे हैं तो भाजपा के भी कई नेता सीट बरकरार रखने तथा अपनी उम्मीदवारी पक्की करने में लग गए हैं।

कायस्थ और वैश्य बहुल पटना साहिब लोकसभा सीट  के लिए यूँ तो भाजपा में कई कद्दावर नेता हैं। जिनमें पहला नाम केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का है। लेकिन उनके उम्मीदवारी में सबसे बड़ी अडचन उनका केंद्रीय मंत्री पद आ रहा है।

साथ ही कुछ माह पहले ही रविशंकर प्रसाद राज्यसभा के लिए चुने गए हैं। उनका कार्यकाल अभी पांच साल बाकी है। ऐसे में बीजेपी नेतृत्व कोई ज्यादा जोखिम लेना नहीं चाह रहा है।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के बाद भाजपा में बिहार से दूसरे बड़े नेता राज्यसभा सांसद आर के सिन्हा के नाम की भी चर्चा जोरों पर है। श्री सिन्हा 2014 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे।

सांसद आर के सिन्हा के रक्तबीज रितुराज सिन्हा के नाम को लेकर भी चर्चा है, जो पिछले कई सालों से नालंदा, नवादा तथा बाढ़ के जिला प्रभारी भी है। ऐसे में पिता का प्रताप भी इनके काम आ सकता है।

पटना पश्चिम से भाजपा के दिग्गज विधायक नितीन नवीन,  कुम्हरार से भाजपा विधायक अरुण सिन्हा, भाजपा पार्षद संजय मयूख आदि नाम शामिल है।

अगर भाजपा ने सही में अपनी पटना साहिब सीट छोड़ने का फैसला लेती है तो ऐसे में जदयू से भी कई नाम सामने आ रहे हैं। जिनमें प्रमुख नाम राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन,  अस्थि सर्जन, पद्मश्री गोपाल प्रसाद सिन्हा,  पार्षद रणवीर नंदन शामिल है।

पिछले लोकसभा चुनाव में पद्मश्री गोपाल प्रसाद सिन्हा जदयू से किस्मत आजमा चुके हैं। लेकिन उन्हें तीसरे नंबर पर संतोष करना पड़ा था। अगर श्री सिन्हा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर नहीं करते हैं तो उनके पुत्र अजय आलोक भी जदयू से उम्मीदवारी  के  दावे कर सकते हैं।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी शत्रुहन सिन्हा ने पटना साहिब सीट दो लाख पैसठ हजार से ज्यादा मतों से जीती थी। जो 1977 के बाद रिकार्ड जीत है। दूसरी तरफ पटना साहिब सीट पर महागठबंधन की भी नजरें गड़ी है। महागठबंधन वेट एंड वाच में दिख रही है।

राजद की नजर में भाजपा के ‘शत्रु’हन सिन्हा ही सुपर स्टार है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-राजद गठबंधन में पूर्व मंत्री बुद्धदेव यादव के पुत्र कुणाल सिंह कांग्रेस के उम्मीदवार थे। लेकिन वे श्री सिन्हा के आगे टिक नहीं सके। इस बार उन्हें टिकट मिलने में संदेह दिख रहा है।

ऐसा माना जाता है कि अगर भाजपा में सब कुछ सही रहा तो शत्रुहन सिन्हा का मुकाबला राजद की ओर से रणविजय साहू उम्मीदवार हो सकते हैं। तैलिक साहू समाज के प्रदेश अध्यक्ष श्री साहू प्रतिपक्ष नेता तेजस्वी के काफी करीब माने जाते हैं। पिछले डेढ़ दशक से राजद से जुड़े हुए हैं ।

लेकिन यह तय है कि पटना साहिब लोकसभा सीट से सांसद शत्रुहन सिन्हा का ही जलबा रहेगा। चाहे वह भाजपा से लड़े या महागठबंधन से। बिहारी बाबू जब तक भाजपा के साथ खड़े हैं, तब तक भाजपा में कोई भी सिर्फ दावा कर सकता है। उनके रहते एनडीए में किसी अन्य उम्मीदवार की दाल नहीं गल सकती है।

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