पटना जैसी जल-जमाव रूपी आपदा के कारण और निदान

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किसी भी चीज का जड़ का इलाज ढूंढना चाहिए न कि फुनगी का। जड़ की जगह फुनगी का इलाज करने से समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। फुनगी के इलाज से तात्कालिक समाधान होता है, दीर्घकालिक नहीं। दीर्घकालिक समाधान न होने की वजह से कुछ समय बाद वही सारी समस्याएं मुंह बाए फिर खड़ी हो जाती हैं। अतएव, आपदा निराकरण के लिए गंभीरता से सोचने और करने की आवश्यकता है…………….”

-: सुबोध कुमार :-

नाला, आहर आदि पर अतिक्रमण जलजमाव का एक प्रमुख कारण है।अतिक्रमण हटाने का एक स्थाई विभाग हर जिले में बना देना चाहिए। जिसके पास अतिक्रमण हटाने का हर साजो-सामान रहना चाहिए, स्थाई फ़ोर्स उस विभाग के पास रहना चाहिए, स्थाई मजदूर भी रहना चाहिए।

(आलेखक सुबोध कुमार बिहार प्रशासनिक सेवा के उप सचिव स्तर के पदाधिकारी हैं और सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों को लेकर विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।)

उस विभाग के पदाधिकारी का मूल काम ही सक्षम आदेश मिलते ही अतिक्रमण हटाने का हो। क्योंकि अतिक्रमण हटाना अब तकरीबन रोजमर्रा का कार्य बन चुका है।

अतिक्रमण हटाने के समय अतिक्रमणकारियों की संख्या ज्यादा रहती है। प्रायः देखा जाता है कि अतिक्रमण हटाने वाले पदाधिकारी/कर्मी के विरुद्ध सिविल कोर्ट में अतिक्रमणकारियों द्वारा फर्जी मामले बनाकर परिवाद-पत्र दायर कर दिया जाता है।

सरकारी काम के निष्पादन के समय अगर सरकारी पदाधिकारी/कर्मी पर केस होता है तो सरकार को साफ और स्पष्ट कानून बनाना चाहिए कि सक्षम प्राधिकार(सरकार सक्षम प्राधिकार नियुक्त कर सकती है) की अनुमति के बिना सरकारी पदाधिकारी/कर्मी पर न परिवाद-पत्र दायर होंगे न ही प्राथमिकी दर्ज होगी।

ऐसा नहीं होने की वजह से प्रायः झूठे मामलों में अधिकारियों/कर्मियों के ऊपर सिविल कोर्ट में परिवाद दायर कर स्थानीय अतिक्रमणकारियों द्वारा दबाव बनाया जाता है तथा आराम से अतिक्रमणकारी को कई गवाह भी मिल जाता है, क्योंकि अतिक्रमण में उन सभी गवाहों का भी हित सन्निहित रहता है। ऐसी स्थिति में पदाधिकारी/कर्मी के लिए मुश्किल स्थिति पैदा हो जाती है।

गड्ढे/आहर को भर देने से गर्मी में जल की समस्या रहेगी और बरसात में जल जमाव की। फिर बरसात में भी पब्लिक हल्ला करेगी कि डूब रहे हैं। पानी आखिर निकलेगा कहाँ? समस्या की जड़ में कोई जाना नहीं चाहता। पेड़ कोई लगाना नहीं चाहता। लगे हुए पेड़ चोरी से काटने में सब आगे है। ऊपर से गर्मी से निजात भी चाहिए।

ये कैसे संभव है? करेगा कोई कुछ नहीं। लेकिन रोड जाम/आगजनी/पथराव में सबसे आगे रहेगा। किसी में सिविक सेंस नहीं रह गया है। अदूरदर्शिता का परिणाम सब को झेलना पड़ रहा है।

पुराने तालाब को अतिक्रमण कर लोग या तो भर दिया है या भरते जा रहा है। अंचलाधिकारी अगर अतिक्रमण हटाने का नोटिस देगा तो अंचलाधिकारी को न जाने कौन-कौन समस्याओं से गुजरना पड़ेगा। मामला कोर्ट में भी पहुंच जाता है। अगर अतिक्रमण किसी भी तरह हट भी गया तो दो चार दिन के अंदर पुनः अतिक्रमणकारी सब काबिज हो जाएगा। यही तो हो रहा है। लोगों को दोनों हाथों में लड्डू चाहिए। ये कैसे संभव है?

सरकारी जमीन कब्जा करने की नीयत से बहुत सारे धार्मिक स्थलों का निर्माण यत्र-तत्र कर दिया गया है। बहुत सारे धार्मिक स्थल तो नाले के ऊपर ही बना दिए गए हैं।

इस निर्माण में भक्ति कम झलकती है, सरकारी जमीन पर कब्जा करने की प्रवृत्ति अधिक झलकती है। क्योंकि अगर कोई खुद को बहुत बड़ा धार्मिक आदमी कहता है और उसे धार्मिक स्थल का निर्माण करना है तो वो अपनी निजी भूमि में धार्मिक स्थल बनाकर पब्लिक के लिए क्यों नहीं खोलता?

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सरकारी जमीन पर कोई भी नया धार्मिक स्थल नहीं बनाया जाना है। फिर भी धड़ल्ले से सरकारी जमीन कब्जा करने की नीयत से धार्मिक स्थलों का निर्माण किया जा रहा है। बहुत लोग रोज ही कहीं न कहीं देखते ही होंगे। लोगों की इस बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए ये आवश्यक है कि इसको रोका जाए।

बिहार प्रशासनिक सेवा के उप सचिव स्तर के पदाधिकारी एवं सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों के विमर्शकर्ता श्री सुबोध कुमार………………

यक्ष प्रश्न यह है कि चूंकि ऐसे मामले बहुत ही संवेदनशील होते है और ऐसे अतिक्रमण को हटाने के समय पब्लिक की धार्मिक भावनाएं भी उबाल मारने लगती हैं तो इसको कैसे रोका जाए?

उपाय बहुत सरल है। सरकारी जमीन पर निर्मित कोई भी संरचना सरकार की होगी। सरकार संरचना निर्माण करने वाले को संरचना हटाने का नोटिस दे सकती है कि हटा कर अन्यत्र ले जाएं, नहीं तो एक निश्चित अवधि के बाद सरकार उस संरचना को कब्जे में ले लेगी।

अगर नोटिस के आलोक में तय समय तक संरचना नहीं हटाई जाती है तो सरकार उसको कब्जा में ले ले। अगर वह संरचना धार्मिक हो तो उस संरचना को तोड़े बगैर उसमें जिसे सरकार योग्य समझे,अपना पुजारी नियुक्त कर पूजा करवाना शुरू कर दे। इससे लोगों की धार्मिक भावनाओं को कोई ठेस भी नहीं पहुंचेगी।

पुजारी नियुक्त करते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि अतिक्रमण करनेवाले के परिवार का कोई आदमी पुजारी न बनने पाए। उसको छोड़कर ही किसी भी जाति के योग्य अन्य व्यक्ति को ही पुजारी बनाया जाए। अन्य धर्म की संरचना पर भी उपर्युक्त प्रकार की (उस धर्म के अनुरूप) कार्रवाई की जा सकती है।

इसका कठोरता से पालन होने पर सरकारी जमीन पर संरचना बना कर सरकारी जमीन कब्जा करने का खेल स्वयमेव ही समाप्त हो जाएगा। सरकार इस आशय का अधिसूचना जारी कर सकती है।

ऐसे ही कई कारणों से बहुत सारे पदाधिकारी/कर्मी अतिक्रमण हटाने के नाम पर टाल-मटोल करते रहते हैं और अतिक्रमण हटाना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें खुद के मुकदमे में फंसाए जाने/विधि-व्यवस्था बिगड़ जाने/अन्य कारणों का भय होता है।

अतिक्रमण का एक मुख्य कारण यह भी है कि कम आय वाले व्यक्ति भी महंगे शहरों में रह रहे हैं जिसकी वजह से वह उस शहर के खर्च को वहन नहीं कर पा रहे हैं। लिहाजा बिना स्थाई दुकान के वे सड़क किनारे ठेला अथवा अन्य अस्थाई दुकान लगाकर अपना व्यवसाय कर रहे हैं। साथ ही, उनका बसेरा भी सड़क किनारे ही है।

संविधान के मौलिक अधिकार अंतर्गत कोई भी व्यक्ति कहीं भी बस सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि रोड पर बसा जाए। हर शहर/क्षेत्र में रहने के लिए एक न्यूनतम मासिक आय का निर्धारण कर देना चाहिए और उसका कठोरता से पालन अनिवार्य कर देना चाहिए।

उससे स्वच्छ भारत का सपना भी साकार होगा और पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा। लोगों का स्वास्थ्य संबंधी समस्या भी कम हो पाएगा। अन्यथा यूं ही बेतरतीब तरीके से सभी लोग जीने को विवश होंगे।

अब जलजमाव का अन्य कारण देखिए। जलजमाव का कारण नालों के ऊपर अतिक्रमण/प्लास्टिक बैग/पॉलिथीन तो है ही, लेकिन एक बड़े कारण पर कोई ध्यान देना तो दूर, चर्चा भी नहीं करना चाहता।

हुआ यह है कि कृषि योग्य भूमि पर भी सरकार द्वारा मकान/दुकान बनाना एलॉउ कर दिया गया है। जिसमें कृषि भूमि की कीमत का 10% देकर कृषि भूमि का गैर-कृषि उपयोग किया जा सकता है।

इससे हुआ क्या? हुआ यह कि शहर से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में धड़ल्ले से कृषि योग्य भूमि में मकान/मॉल का निर्माण होने लगा। जमीन का कीमत आसमान छूने लगा। उस क्षेत्र की आबादी भी तेजी से बढ़ने लगी।

अब देखिए। जब क्षेत्र ग्रामीण है तो जाहिर है कि नगर निगम वहां जाएगा नहीं। क्योंकि नगर निगम तो शहरी क्षेत्र के लिए है। अब मकान/मॉल तो बन गया और पानी निकासी की सुविधा बनी नहीं।

ऊपर से कोई नाला वगैरह था भी तो उसको भर के पब्लिक अपने जमीन का रास्ता बना कर यूज कर लिया या उस पर भी दुकान बना दिया तो पानी निकलेगा कैसे और कहाँ? वैसे भी कृषि-योग्य भूमि लो लैंड होती है।

पहले लोग ऊंची जगहों पर बसता था। आज-कल कहीं भी बस जा रहा है। तो क्या होगा? वही जो हो रहा है। लोग सड़क तक पहुंचने के लिए जमीन के आगे के नाला को भर कर रास्ता बना कर उसको कब्जे में रखता है। बहुत ही गलत है ये। लोग लोहे की जाली या पक्का पुल बनाकर नाला पार करें। नाला भरने की अनुमति किसी को नहीं होनी चाहिए।

आप ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपार्टमेंट देख सकते हैं, जहां पानी निकासी की कोई सुविधा नहीं है। तो क्या होगा? इनका नक्शा कैसे पास हुआ? किसने पास किया? शहरी क्षेत्र के गली में भी अपार्टमेंट्स भरे पड़े हैं। क्यों और कैसे ?

अगर पब्लिक/बिल्डर ही शहर बसाएगा तो वो सिर्फ अपना निजी हित देखेगा। बिल्डर मकान/दुकान बनाएगा, बेच कर निकल जाएगा। उसको क्या?  शहर सरकार को बसाना चाहिए। सभी जगह बस जाने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने चाहिए।

मेरा सुझाव ये है कि सरकार खुद ही अपना लैंड बैंक क्यों नहीं बनाती? जो भी व्यक्ति जमीन बेचते हैं, वो सीधा सरकार को बेचें। सरकार अपने हिसाब से उस जमीन को या तो अपने उपयोग के लिए रख लेगी या उस जमीन को नीलाम कर सकेगी।

इससे कई फायदा होगा। जमीन में सन्निहित काला धन स्वतः समाप्त हो जाएगा, क्योंकि सरकार को सीधे जमीन बेचने में कहीं कोई दलाल बीच में रहेगा ही नहीं। इसमें जमीन की कीमत की पूर्ण पारदर्शिता रहेगी।

सरकारी जमीन की खरीद-फरोख्त पर भी रोक लग जाएगी। इसके साथ नाली- गली के लिए होने वाले विवाद भी स्वतः समाप्त हो जाएंगे। सरकार के पास जब एक लैंड बैंक हो जाएगा तो उसको अच्छे से विकसित  कर यथा, पार्क, रास्ता, नाली इत्यादि निकाल कर उसको बेचने के लिए ऑनलाइन बोली लगवा कर मुनाफा भी कमा सकती है।

सरकार तभी अपने मनमुताबिक शहर बसा पाएगी, नहीं तो ये टेढ़े-मेढ़े रास्ते और संकरी गलियों से छुटकारा नहीं मिलने वाला। अगर सरकार शहर बसाएगी तो पब्लिक के लिए स्वास्थ्यकर भी रहेगा। पब्लिक के आपसी जमीन खरीद-बिक्री में घालमेल के कारण जो भूमि-विवाद उत्पन्न होते हैं,उनका भी स्वतः ही निपटारा हो जाएगा।

भूमि-विवाद अधिकांश विधि-व्यवस्था के बिगड़ने का मूल कारण है। अगर सभी लोगों को सरकार को ही जमीन बेचने के लिए कानूनन बाध्य कर दिया जाए, तो एक क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है अथवा, सरकार भू-अर्जन कर शहर बसाना चाहे तो बसाए, लेकिन बसाए सरकार ही। पब्लिक/बिल्डर के भरोसे जनता को न छोड़े।

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