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नहीं रहे हर दिल अजीज कादर खान

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INR.  जहाँ बालीबुड नये साल के जश्न की तैयारी में था ।वही बालीबुड के लिए एक मनहूस खबर कनाडा से आई जहाँ  हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता कादर ख़ान का कनाडा के एक अस्पताल में निधन हो गया है। उनके बेटे सरफ़राज़ ख़ान ने उनकी मौत की पुष्टि की। 81 वर्षीय कादर ख़ान एक दिग्गज अभिनेता होने के साथ-साथ डायलॉग और पटकथा लेखक भी थे।

उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में काम किया था ।पिछले   कई सप्ताह से वह बीमार चल रहे थें ।दो दिन पूर्व सोशल मीडिया में उनके निधन की खबर भी चल रही थी जो आज सच साबित हुई।

साल 1973 में राजेश खन्ना की फ़िल्म दाग़ से बॉलीवुड में कदम रखने वाले कादर ख़ान ने 300 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया है।विलेन से लेकर काॅमेडी तक कि भूमिका उन्होंने की थी।अपने संवाद लेखन से सिने स्टार अमिताभ बच्चन की अभिनय यात्रा को बुलंदी तक लेकर जाने वाले कादर खान ही थें।

क़ब्रिस्तान से एक्टिंग का सफ़रः  वो रात का वक़्त होता, बॉम्बे में घर के पास के यहूदी क्रबिस्तान में हर ओर अंधेरा और सन्नाटा. और एक बच्चा वहाँ बैठकर संवाद अदायगी का रियाज़ करता रहता…

एक रात यूँ ही रियाज़ जारी थी कि एक टॉर्च लाइट की रोशनी हुई और किसी ने पूछा कब्रिस्तान में क्या कर रहे हो?

बच्चा बोला मैं दिन में जो भी अच्छा पढ़ता हूँ रात में यहाँ आकर बोलता हूँ और रियाज़ करता हूँ. अशरफ़ ख़ान नाम के वो सज्जन फ़िल्मों में काम करते थे।उन्होंने पूछा नाटक में काम करोगे?

वो बच्चा था कादर ख़ान और वहां से शुरू हुआ उनका वो सफ़र जो दशकों तक फ़िल्मों में जारी रहा।

जब कादर ख़ान ने बाद में 1977 में मुक्क़दर का सिकंदर लिखी तो इसमें एक अहम सीन है जहाँ बचपन में अमिताभ बच्चन रात को क़ब्रिस्तान में माँ के मरने पर रो रहा है.

वहाँ से गुज़र रहा एक फ़कीर (कादर ख़ान) उस बच्चे से कहता है, “इस फ़कीर की एक बात याद रखना. ज़िंदगी का सही लुत्फ उठाना है तो मौत से खेलो, सुख तो बेवफ़ा है चंद दिनों के लिए आता है और चला जाता है दुख तो अपना साथी है, अपने साथ रहता है, पोंछ दे आँसू. दुख को अपना ले. तक़दीर तेरे क़दमों में होगी और तू मुक्क़दर का बादशाह होगा…”

….ये सीन कादर ख़ान ने अपने घर के पास वाले क़ब्रिस्तान से लिया था।

कादर ख़ान ने 70 के दशक से डायलॉग लिखने से लेकर फ़िल्मों में एक्टिंग तक में ख़ूब नाम कमाया।

ख़ून पसीना, लवारिस, परवरिश, अमर अकबर एंथनी, नसीब, कुली- इन फ़िल्मों में पटकथा या डायलॉग लिखने वाले कादर ख़ान ने अमिताभ बच्चन के करियर को संवारने में बड़ा रोल निभाया।

हालांकि उनकी शुरुआती ज़िंदगी काफ़ी संघर्ष भरी रही। कई इंटरव्यू में कादर ख़ान बता चुके हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में उनके जन्म से पहले उनके तीन भाइयों की मौत हो चुकी थी जिसके बाद उनके माँ-बाप ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ भारत आने का फ़ैसला किया।

जल्द ही माँ-बाप का तलाक़ हो गया और सौतेले पिता के साथ बचपन बहुत ग़रीबी में निकला. बावजूद इसके उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया और मुंबई के कॉलेज में बच्चों को पढ़ाने लगे।

कॉलेज में एक बार नाटक प्रतियोगिता थी जहाँ नरेंदर बेदी और कामिनी कौशल जज थे। कादर ख़ान को बेस्ट एक्टर-लेखक का इनाम मिला और साथ ही एक फ़िल्म के लिए संवाद लिखने का मौक़ा भी मिला. पगार थी 1500 रुपए।

फ़िल्म थी 1972 में आई जवानी-दीवानी जो हिट हो गई और रफ़ूचक्कर जैसी फ़िल्में उन्हें मिलने लगी। कादर ख़ान की ज़िंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब 1974 में मनमोहन देसाई और राजेश खन्ना के साथ फ़िल्म रोटी में काम करने का मौक़ा मिला।

मनमोहन देसाई को कादर ख़ान पर ख़ास भरोसा नहीं था. मनमोहन देसाई अकसर कहते, “तुम लोग शायरी तो अच्छी कर लेते हो पर मुझे चाहिए ऐसे डायलॉग जिस पर जनता ताली बजाए।”

फिर क्या था, कादर ख़ान संवाद लिखकर लाए और मनमोहन देसाई को कादर ख़ान के डायलॉग इतने पसंद आए कि वो घर के अंदर गए, अपना तोशिबा टीवी, 21000 रुपए और ब्रेसलेट कादर ख़ान को वहीं के वहीं तोहफ़े में दे दिया ।

पहली बार कादर ख़ान को डायलॉग लिखने के लिए एक लाख से ज़्यादा की फ़ीस मिली. यहीं से शुरू हुआ मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन के साथ उनका शानदार सफ़र।

कादर ख़ान की लिखी फ़िल्में और डायलॉग एक के बाद एक हिट होने लगे. अग्निपथ, शराबी, सत्ते पे सत्ता- अमिताभ के लिए एक से बढ़कर एक संवाद कादर ख़ान ने दिए।

1973 में फ़िल्म दाग में एक वकील के मामूली से रोल में कादर ख़ान दिखाए दिए। तो 1977 में पुलिस इंस्पेक्टर के छोटे से रोल में अमिताभ बच्चन के साथ भी पर्दे पर दिखे।

इसके बाद तो ख़ून पसीना, शराबी, नसीब, क़ुर्बानी -फ़िल्मों की झड़ी लग गई। विलेन के रूप में लोग उन्होंने पहचानने लगे। कादर ख़ान की एक और ख़ूबी थी. वो लिप-रिडिंग कर सकते थे यानी दूर से ही बोलते लबों के शब्दों को समझ लेते।

अपने इंटरव्यू में ये क़िस्सा सुनाना वह नहीं भूलते, “शुरू-शुरू के दिनों में जब मनमोहन देसाई के घर गया तो दूर से देखकर वो बोले उल्लू के पठ्ठे को समझ में नहीं आया, फिर आ गया. मैंने पास जाकर कहा कि आपने मेरे बारे में ये लफ़्ज़ बोले हैं. मैं लिप रिडिंग कर सकता हूँ. बाद में फ़िल्म नसीब में उन्होंने ये सीन इस्तेमाल किया है जब हीरोइन विलेन की बातें लिप रिडिंग से समझ लेती है.”

अमिताभ के करियर में कादर ख़ान की अहम भूमिका रही. एक समय कादर ख़ान और अमिताभ बच्चन की गहरी दोस्ती थी.

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कादर ख़ान ने बताया था, “मैं अमिताभ को लेकर फ़िल्म भी बनाना चाहता था, नाम था जाहिल. लेकिन इससे पहले ही बच्चन को कुली की शूटिंग के दौरान चोट लग गई, फिर वो राजनीति में चले गए और फ़िल्म कभी बन नहीं पाई. हमारे बीच भी दरार आ गई।”

1983 में कादर खान ने फ़िल्म हिम्मतवाला लिखी और अपने लिए कॉमेडी वाला रोल भी. तब तक वो विलेन वाले मोड से बाहर आना चाहते थे. वहाँ से उनकी लेखनी और एक्टिंग दोनों में एक बदलाव का सा दौर शुरू हो गया.

संवादों में नफ़ासत ने जगह टपोरीपन वाले डायलॉग ने ली. बीबीसी से इंटरव्यू में कादर फ़िल्मों की बिगड़ती भाषा को दोष ख़ुद को भी देते हैं।

90 के दशक तक आते-आते कादर ख़ान ने लिखना कम कर दिया पर डेविड धवन-गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमने लगी।लेकिन तब भी अपने डायलॉग वो ख़ुद ही लिखते। बिना ख़ुद हँसे या आड़े-तिरछे मुँह बनाए बग़ैर दर्शकों को कैसे हँसाया जा सकता है ये गुर कादर ख़ान में था।

पिछले एक दशक से कादर ख़ान फ़िल्मी दुनिया से कट से गए थे।अरबी सीखने के बाद वह दीन के काम में ज़्यादा मसरूफ़ रहने लगे। तबीयत ख़राब होने के बाद ज़्यादातर वक़्त उनका कनाडा में बच्चों के साथ बीता।

कादर ख़ान ने फ़िल्मों में लेखन, संवादों और एक्टिंग को अपने रंग में ढाला. एक फ़िल्म प्रेमी होने के नाते मुझे हमेशा लगता रहा है कि कादर ख़ान की काबीलियित का पूरा-पूरा फ़ायदा शायद हम नहीं उठा पाए।

वरना ऐसे लेखक और अदाकार कम ही मिलते हैं जिनके पास अच्छी ज़बान, अच्छी लेखनी, अच्छा अंदाज़ -सब कुछ हो.

तो चलते-चलते कादर ख़ान के कुछ यादगार संवाद……

हम -मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर, किनारे से कभी अंदाज़े तूफ़ान नहीं होता.

अग्निपथ- विजय दीनानाथ चौहान, पूरा नाम, बाप का नाम दीनानाथ चौहान, मां का नाम सुहासिनी चौहान, गांव मांडवा, उम्र 36 साल 9 महीना 8 दिन और ये सोलहवां घंटा चालू है.

कुली- हमारी तारीफ़ ज़रा लंबी है.बचपन से सर पर अल्लाह का हाथ और अल्लाहरख्खा है अपने साथ. बाजू पर 786 का है बिल्ला, 20 नंबर की बीड़ी पीता हूं, काम करता हूँ कुली का और नाम है इक़बाल

अंगार- ऐसे तोहफे (बंदूकें) देने वाला दोस्त नहीं होता है, तेरे बाप ने 40 साल मुंबई पर हुकूमत की है इन खिलौनों के बल पर नहीं, अपने दम पर

सत्ते पे सत्ता- दारू-वारू पीता नहीं अपुन. मालूम क्यों ? क्योंकि दारू पीने से लिवर ख़राब हो जाता है। वो उस दिन क्या हुआ अपुन दोस्त का शादी में गया था. उस दिन ज़बरदस्ती चार बाटली पिलाई।वैसे मैं दारू नहीं पीता क्योंकि दारू पीने से लिवर ख़राब हो जाता है।

मुक़द्दर का सिकंदर- ज़िंदगी का सही लुत्फ़ उठाना है तो मौत से खेलो”

ऐसे अनगिनत यादगार संवाद लिखे जो आज भी बोले और सुने जाते हैं ।

“बड़े शौक से सुन रहा था जमाना,

तुम ही सो गए दास्तां कहते -कहते”

                                               …….अलविदा काॅमेडी किंग कादर खान।

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