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धर्मांतरण, घर वापसी और धर्मयुद्ध

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लोग नेक हो, दयापूर्ण हो, सदाचारी हो, एक- दूसरे की मदद करनेवाले बने ताकि दूसरे धर्म के लोग भी उनकी तरह बनने की कोशिश करे।सभी धर्म के अगुवा ये प्रयास करें कि उनके धर्म को माननेवालों का जीवन मानवतावादी सिद्धांतों पर खरा उतरे। तभी हम एक बेहतर कल की अपेक्षा कर सकते हैं…..”

-: नवीन शर्मा :-

आज हम एक अजीब से हिंसापूर्ण, असंवेदनशील और जबरदस्ती अपना विचार दूसरों पर थोपने की बेताबी भरे दौर से गुजर रहे हैं। इसी वजह से कई इस्लामिक कट्टरपंथी गुट जैसे अलकायदा, तालिबान, आइएस और बोकाहरम पूरी दुनिया को जबरन हथियार के बल पर इस्लामिक बनाने पर तुले हुए हैं।

वहीं भारत में भी एक महाशय यह दावा कर रहे हैं कि 2021 तक देश में सभी लोग हिंदू हो जाएंगे। इसाई मिशनरियों द्वारा भी बहला-फुसलाकर, शिक्षा, नौकरी, चिकित्सा सुविधा आदि का लालच देकर भोले-भाले आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन कराने की खबरें समाचार पत्रों में आती ही रहती हैं।

वैसे भी इतिहास पर भी जब हम नजर डालते हैं तो यह साफ दिखता है कि ईसा मसीह ने भले ही अपनी सारी जिंदगी शांति और प्रेम की शिक्षा देने में गुजारी हो।

मानवता को संदेश देने की खातिर हंसते-हंसते खुद सूली पर चढ़ गए हों, लेकिन उनके बाद उनकी शिक्षा का प्रचार करने का दावा करनेवालों ने पूरी दुनिया में ईसाई धर्म को फैलाने में साम्राज्यवादी ताकतों से ही सहायता पाई।

यूरोपिय देश इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली और जर्मनी का साम्राज्य जैसे-जैसे उत्तरी और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका,एशिया और आस्ट्रेलिया में फैलता गया उसके साथ-साथ ईसाई धर्म का भी प्रचार-प्रसार होता गया।

वहीं मुस्लिम शासकों ने भी जब तलवार के बल पर अफ्रीका और एशिया के कई देशों तथा यूरोप के भी एक हिस्से को जीता तो इस्लाम का प्रचार प्रसार हुआ। इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब कट्टर इस्लामिक शासकों ने जहां विजय हासिल की वहां के लोगों को इस्लाम कबूल करने या फिर मौत के घाट उतार देने की धमकी दी।

इसी हिंसक तरीके से अपने धर्म के जबरन प्रसार की जिद की वजह से ही यूरोपीय शक्तियों और तुर्की के आटोमन साम्राज्य के बीच वर्षों युद्ध चला।

इन दोनों धर्मों के अलावा जो एक धर्म दुनिया के दूसरे देशों में फैला वो है बौद्ध धर्म , लेकिन उसके अनुयायियों ने बुद्ध के अहिंसा के सिद्धांत की लाज रखी। उन्होंने तलवार के बल पर साम्राज्य खड़े कर अपने धर्म का प्रचार नहीं किया।

सम्राट अशोक ने भले ही तलवार के बल पर भारत में अपना साम्राज्य खड़ा किया हो लेकिन श्रीलंका और अन्य पड़ोसी देशों में धर्म प्रचार के लिए बौद्ध भिक्षुओं को ही भेजा था। तिब्बत, चीन, म्यनमार, थाईलैंड, जापान व कोरिया में बौद्ध धर्म का प्रसार अहिंसक तरीके से ही हुआ है।

किसी भी धर्म का पालन करना एक व्यक्ति का निजी मामला है। व्यक्ति को यह अधिकार होना ही चाहिए की वो अपनी इच्छा व पसंद के हिसाब से धर्मपरिवर्तन कर सके, लेकिन यह परिवर्तन स्वेच्छा से होना चाहिए ना की जबरन या बहला फुसलाकर।

जब किसी व्यक्ति विशेष को लगता है कि ईसा मसीह ही उसके लिए आदर्श हैं। उनकी शिक्षा को वो समझता है तथा उसी के अनुरूप वो जीवन व्यापन करना चाहता है तो उसे ईसाई धर्म अपनाने की छूट होनी ही चाहिए।

इसी तरह किसी को पैगम्बर मोहम्मद की शिक्षा पसंद आ सकती है कुरान की आयतें उसे अजीज लग सकती हैं तो वो उनका अनुयायी बन सकता है। किसी को बुद्ध प्यारे लग सकते हैं तो किसी को महावीर की अहिंसा की नीति सर्वोपरि लग सकती है।

यानि अपनी पसंद, रूचि और विश्वास के आधार पर आप मनचाहा धर्म स्वेच्छा से अपना लें तो इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन धर्म के तथाकथित ठीकेदारों को यह बात रास नहीं आती है। कोई भी अपने धर्म के लोगों की संख्या नहीं घटाना चाहता।

एक धर्म से परिवर्तन कर दूसरे धर्म में जाने पर लोग काफी हो हल्ला मचाते हैं, तलवारें खिंच जाती हैं, क्योंकि कई बार इसमें दवाब, बहला फुसलाकर दूसरे धर्म में शामिल करने की बातें सामने आती हैं यह सरासर गलत है।

सभी धर्म के ठीकेदार अपने धर्म के लोगों की संख्या बढ़ाने को लेकर जितनी बेताबी और बेसब्री दिखाते हैं, उतनी बेताबी इस बात में नहीं दिखाते कि उनके धर्म को माननेवालों का आचरण व्यवहार इतना अच्छा हो।

भारतीय मनीषियों  के प्राचीन सिद्धांतों में जियो और जीने दो और वसुद्धैव कुटूबकम ऐसे प्रेरक वाक्य हैं जो आज की दिशाहीन होती  दुनिया को नई राह दिखा सकते हैं। 

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