ढींढोर पीटने वाले, फौजियों के इस गांव में कहां पहुंचा विकास

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“देश की इस 17 वीं लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों में सेना के नाम पर वोट मांगने की नयी संस्कृति आ गई है। सेना की शहादत के नाम पर वोट भुनाने का खेल चल पड़ा है। अब राजनीतिक दलों के लिए सेना भी वोट बैंक बन गई है। लेकिन दूसरी तरफ देश की रक्षा एवं सेवा में तत्पर इन सैनिकों के गांव की सुध सरकार नहीं ले पा रही है। इन सैनिकों में कई ऐसे सैनिक होंगे, जिनके गाँव में विकास की रौशनी नहीं पहुँची है। उनके गाँव के लोग आज भी बीमार होने पर खाट पर टंगाकर चार किलोमीटर दूर उन्हें अस्पताल जाना पड़ता है। जहाँ पानी पीने के लिए आज भी कुएँ पर निर्भर रहना पड़ रहा है….”

बिहार एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क ब्यूरो (जयप्रकाश नवीन)। बिहार के सीएम भी विकास का राग अलापते थकते नही है।लेकिन उनके राज में ही गया का चिरयामा विकास से कोसो दूर है। जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र में आने वाले इस गांव के लोगों ने रोड नहीं तो वोट नहीं का एलान कर वोट बहिष्कार का निर्णय लिया है।

बिहार के गया जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर अतरी प्रखंड का एक गाँव जिसका नाम है चिरयामा। जो फौजियो के गांव के नाम से भी जाना जाता है। देशसेवा का यह जज्बा यहां पीढ़ियों से चला आ रहा है। आलम यह है कि गांव में ऐसा कोई घर नहीं जहां से एक बेटा फौज में न हो।

पहाड़ की तलहटी में बसा यह गांव जहानाबाद लोकसभा के अंतर्गत आता है। जहां हर घर में सैनिक है। 1200 की आबादी वाले इस गांव में लगभग डेढ़ सौ घर है जिनमें  100 से ज्यादा सैनिक है। जो देश के विभिन्न सीमाओं पर तैनात है। कई घरों में तो दो तीन लोग सेना में है। वही गांव के कई ऐसे घर है जहाँ तीन -तीन पीढ़ियों से लोग सेना में देश की सेवा करते आ रहे हैं।

लेकिन इस गांव की हालत देखकर किसी को भी रोना आ सकता है।गाँव की पहचान भले ही फौजियों की गाँव वाली हो लेकिन आज भी चिरनायामा विकास से कोसो दूर आदिम दमनीयता के रूप में देखा जा सकता है।जहां मूलभूत सुविधाएँ नहीं है। बल्कि गांव में  समस्याओं का समंदर है।

21 वीं सदी में भी चिरयामा विकास को मुँह चिढा रहा है। जहां बीमार होना अभिशाप है। बीमार होने पर लोगों को खाट पर लादकर मरीजों को 4 किलोमीटर दूर अस्पताल पहुंचाते हैं लोग। अगर जच्चगी की बात हो तो भगवान ही मालिक है। 

जहां पीने का पानी नहीं मिलता। गांव के लोग आज भी पेयजल के लिए कुएँ पर निर्भर है। वो भी भीषण गर्मी में सूख जाता है। ग्रामीण  पथरीली और उबड खाबड रास्ता तय कर शहर पहुँचते हैं। वो भी बरसात में बंद। पहाड़ी रास्तों पर चलकर बच्चे स्कूल जाते हैं।

गाँव में सबसे बड़ी समस्या सड़क की है। पहले तो गांव में आवागमन की भी सुविधा नही थी। लेकिन ग्रामीणों ने श्रमदान कर पहाड़ का सीना चीरकर एक रास्ता भी बना दिया। जहां से चार किलोमीटर की दूरी तय कर प्रखंड मुख्यालय अतरी पहुँचा जा सकता है।

कहने को यह गांव जहानाबाद लोकसभा में आता है। जहां चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रचार जोरों पर है। लेकिन इस गांव पर नेताओं की कृपा दृष्टि शायद नहीं हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछली बार अरूण कुमार सिंह गाँव आएं थे, विकास के वायदे भी कर गए लेकिन कुछ नहीं हुआ।

नेताओं की वादाखिलाफी से आजिज ग्रामीणों ने इस बार वोट बहिष्कार का एलान कर दिया है। उनका कहना है कि रोड नहीं तो वोट नहीं।

कहा जाता है भारत गांवों का देश है। देश की आत्मा गांव में बसती है।तो क्या गांव में रहने वाली आत्मा रोती ही रहेगी। सरकार आदर्श गांव बनाने की बात करती है लेकिन विकास सिर्फ़ शहरों तक ही सिमट कर रहेगा?

कहाँ है सरकार और सरकारी  मशीनरी जो दुनिया बदल देने का दंभ भरती है। कहाँ हैं वे लोग जो हिन्दुस्तान को विश्व गुरू बना देने की बात करते हैं?  

कहाँ है बिहार के ‘विकास पुरूष’ नीतीश कुमार जो विकास के बड़े दावे करते हैं? जिनके शासन में चिरयामा विकास से कोसो दूर है? कहाँ है वे लोग जो सैनिकों की शहादत पर वोट मांग रहे हैं?

21 वीं सदी के भारत के इस गांव की बदहाली कब खत्म होगी ‘फौजियों के गांव’ के लोग निजाम से पूछ रहे हैं। विकास से दूर रखने पर चिरयामा इस बार नेताओं को सबक सीखाने की ठान ली है।

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