डॉ. जायसवाल की ताजपोशी कहीं सुशील मोदी की काट तो नहीं!

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अचानक डॉ. संजय जायसवाल को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाने के पीछे भाजपा नेतृत्व की आखिर क्या मंशा है। वह क्या साबित करना चाहते है? भाजपा के नये अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद बीजेपी में ‘वैश्य’ का सबसे बड़ा चेहरा सुशील मोदी के चेहरे को कुंद करने की चाल तो नहीं……………”

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क ब्यूरो)। बिहार भाजपा को भले ही नया प्रदेश अध्यक्ष मिल गया हो। लेकिन सांसद डॉ संजय जायसवाल की ताजपोशी से सभी अचरच में है। उन्हें गृहमंत्री अमित शाह के फैसले पर विस्मय हो रहा है।

बीजेपी नेतृत्व द्वारा अचानक फैसले के बाद लगने लगा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सुशील कुमार मोदी के सीएम नीतीश कुमार के समर्थन में किए गए ट्विट के बाद से उनसे  नाराज दिख रहा था। जिसके फलस्वरूप यह कदम उठाया गया है।

बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के द्वारा लगातार सुशील मोदी पर निशाना साधा जा रहा था।जब से उन्होंने नीतीश कुमार को एनडीए का चेहरा  घोषित करने वाला ट्वीट किया था।

बयान के घमासान के बीच काफी सोच समझकर संजय जायसवाल को प्रदेश अध्यक्ष का कमान सौंप देने के पीछे कुछ न कुछ संदेश तो यही गवाही दे रहा है।

बता दें कि संजय जायसवाल के पिता मदन जायसवाल का जनसंघ से पुराना रिश्ता रहा है। संजय जायसवाल खुद 2009 से लगातार बेतिया से सांसद हैं।

कहा जाता रहा है कि इनका सुशील मोदी से करीबी रिश्ता रहा है और उन्हीं के वर्ग से आते हैं। तो क्या फिर सुशील मोदी के खेमे ने बाजी मार ली। इसे समझना होगा। इस बार कुछ वैसा नहीं है।

केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नित्यानंद राय के बाद संजय जायसवाल को अध्यक्ष बनाकर यह साबित करना है कि बीजेपी सिर्फ सवर्णों की पार्टी नहीं है। यानि लगातार दूसरी बार पिछड़े के हाथ में प्रदेश की कमान देकर पार्टी पर लगे सवर्णो के ठप्पे से मुक्ति दिलाना भी है।

इस ताजपोशी का मतलब साफ है कि संजय जायसवाल के तौर पर प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति का सीधा निशाना सत्ता का साझीदार(जदयू) भी है।

लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में पिछड़ों की पार्टी होने में जेडीयू ने बाजी मार ली थी और बड़े हीं तरीके से अपरोक्ष तौर पर भाजपा पर सवर्णो की पार्टी होने का राजनीतिक ठप्पा लग गया था।

संजय जायसवाल के अध्यक्ष बनने के बाद सबसे बड़ी कोशिश होगी कि विधानसभा में सवर्णो और पिछड़ों के बीच संतुलन कायम करते हुए जेडीयू को औकात में लाना। पिछड़ों के सहारे चुनावी राजनीत करने वाली जदयू के लिए अपनी रणनीति पर दुबारा  विचार करना होगा।

संजय जायसवाल का अध्यक्ष बनाये जाने के बाद कहा जा रहा है कि सुशील मोदी को इस बहाने  साधने की तैयारी कर ली गई है। सर्व विदित है कि वर्तमान में सुशील मोदी बिहार बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित नेता हैं।

लेकिन दिल्ली के नेताओं  से इनका दिल नहीं मिल रहा।उसका परिणाम भी लगातार देखने को मिल रहा है। सुशील मोदी जैसा नेता कुछ ट्वीट करता हो और कई वरिष्ठ नेता उसे तत्काल खारिज कर देता है।

यह बात सबकुछ साबित कर देता है। इसे समझना होगा। सुशील मोदी के राजनीतिक आभा मंडल को धूमिल करने का प्रयास शुरू कर दिया गया है।

इस बीच सुशील मोदी के हीं वर्ग के एक तेजतर्रार और काबिल नेता को प्रदेश अध्यक्ष का कमान सौंप कर दिल्ली ने भी अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि अब किसी एक का वर्चस्व का दिन लदने वाला है।

गौरतलब है कि बीजेपी को वैश्य की पार्टी भी कहा जाता रहा है। बिहार में वैश्य नेता के तौर पर सुशील मोदी की एक अलग पहचान है। संजय जायसवाल का अध्यक्ष बनना या फिर बनाया जाना कहीं मोदी की यह पहचान छीनने की कवायद तो नहीं? राजनीतिक गलियारे में एक बहुत बड़ा सवाल सामने खड़ा है।

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