डॉक्टरी भी चढ़ गयी ग्लोबलाइजेशन की भेंट !

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“डॉक्टर को कभी भगवान का दूसरा रूप माना जाता था, लेकिन मौजूदा वक़्त में डॉक्टर का जो रूप सामने आ रहा है या कहें डॉक्टरों के बारे में जो आम जन धारणा बनती जा रही है, बेहद भयावह है….”

INR.(एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क)।  ग्लोबलाइजेशन के बाद चिकित्सा आसान हुई है, चिकित्सा अब सेवा से बाहर निकल कर रोजगार बन गयी है। ये नहीं कह सकते कि सारे डॉक्टर एक से हो गए हैं, लेकिन बहुसंख्य डॉक्टर धन्धेबाज़ और फान्देबाज़ हो गए हैं, इसमें कोई दो राय नहीं

विश्लेष्कः धनजंय कुमार, मुबंई में जाने-माने सिने-टीवी लेखक हैं….

लेकिन फिर सवाल उठता है, क्या सिर्फ डॉक्टरों की नीयत में खोट और बिजनेस आया है या पूरे समाज में परिवर्तन आया है ?  तो हम पाते हैं कि ग्लोबलाइजेशन यानी 90 के बाद हमारे देश और समाज में उपभोक्तावाद बढ़ा है। हमारे बीच दो संबंध सबसे ज्यादा फूल फल रहे हैं, बाज़ार और उपभोक्ता के।

हमारे इंसानी रिश्ते लगातार कमजोर हुए हैं। पैसा हमारे जीवन का सबसे बहुमूल्य वस्तु बन गया है। पैसा है तो सुख हासिल कर सकते हैं, नहीं है, तो दुःख और मृत्यु आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

ये अलग बात है कि अब भी कई लोग मानते हैं कि पैसा सबकुछ नहीं है और ना ही पैसों से सबकुछ खरीदा जा सकता है। लेकिन ऐसा मानने वाले लोग लगातार अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं

बहुसंख्यक लोग यही मान रहे हैं कि जो जितना ज्यादा कमा पायेगा वो उतना सुखी रहेगा, इसलिए हर आदमी पैसे कमाने की आपाधापी में लगा है। डॉक्टर भी। डॉक्टर बनने के लिए विद्यार्थी को कई चीजों का त्याग करना पड़ता है और ध्यान सिर्फ पढाई पर देना पड़ता है।

फिर प्रतियोगिता इतनी है कि कोचिंग लेना ज़रूरी लगता है, ताकि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में अच्छे नम्बर आ सकें और अच्छे सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हो सके। अब समझिये कि परीक्षा देने वाले लाखों लड़के हैं और प्रवेश हज़ारों को मिलना है।

ऐसे में बहुत सारे लड़कों को प्राइवेट कॉलेज की शरण में जाना पड़ता है, जहां भारी डोनेशन देना पड़ता है और पढाई की फीस और हॉस्टल का खर्च अलग से। सरकारी कॉलेजों में फीस और होस्टल का खर्च लाखों में पहुँच जाता है तो प्राइवेट की बात ही क्या करनी है। मान लीजिये 50 लाख से कम खर्च नहीं है एम बी बी एस करने में भी।

फिर जैसे ही डॉक्टरी की डिग्री मिलती है, करोड़ों कमाने की इच्छा को साकार करने में जुट जाते हैं। मेरिट वालों को तो सरकारी अस्पतालों में जगह मिल जाती है, लेकिन बाकी अपना क्लिनिक खोलते हैं या नर्सिंग होम या फिर बड़े अस्पताल।

बड़ा अस्पताल बड़ा खर्चा। करोड़ों का बजट। हाँ, बैंक से लोन मिल जाते हैं, लेकिन जब करोड़ों लोन लेंगे तो चुकाना भी पडेगा। और यह सेवा करके तो चुकने से रहा।

भारी भरकम पूंजी लगाई है, रिस्क लिया है तो कमाएंगे भी। इसीलिये मेडिकल लाइन भी अब व्यापार बन गयी है। 

इसीलिये मेडिक्लेम का धंधा भी खूब चल निकला है। मेडिक्लेम करा मरीज़ भी खुश है और मेडिक्लेम का मरीज़ देख डॉक्टर भी खुश।

सोचिये मेडिक्लेम कितनी बड़ी सेवा एजेंसी है। डॉक्टर और पेशंट दोनों खुश। ग्लोबलाइजेशन का ये बड़ा इफेक्ट हुआ है कि ग्राहक और दुकानदार दोनों को बराबर खुशी मिलती है । ऐसी खुशी भला कौन नहीं चाहेगा?।

लेकिन जिनके पास पैसे नहीं हैं, जो गरीब हैं उनका क्या ? बाज़ार में उनकी कोई भूमिका नहीं है, जिनकी जेब में पैसे नहीं है। पैसे हैं तो मुस्कुराइए वरना रास्ते से हट जाइए। और ग्लोबलाइजेशन का असर देखिये सरकारी अस्पतालों की हालत दिन ब दिन बिगडती जा रही है।

आबादी बढ़ती जा रही है, लेकिन अस्पताल नहीं बढ़ रहे। हाँ, नर्सिंग होम्स और प्राइवेट अस्पताल ज़रूर बढ़ते जा रहे हैं। प्राइवेट अस्पताल सरकारी अस्पतालों से भी बड़े और भव्य हैं।

सरकारी अस्पताल में मरीज को डॉक्टर तक पहुँचने में तीन दिन से लेकर 12 महीने तक का वक़्त लग जाता है, जबकि प्राइवेट में देखिये, जाइए और तुरंत पानी चढ़ाना चालू।

और नतीजा है कि इस तरह के अस्पताल गैराज की तरह काम करने लगे हैं। गाडी गैराज में गयी नहीं कि कुछ खोल कर छोड़ देगा, वैसे ही पेशंट हॉस्पिटल आया नहीं कि पानी चढ़ाना और सारे प्रकार के चेक अप चालू। जितना पैसा निकाला जा सकता है, निकालेंगे। मेडिक्लेम नहीं कराया है तो घर जमीन बेचने के लिए तैयार रहिये। हालत ये है कि कई बार तो मरे हुए व्यक्ति को वेंटिलेटर पर रख दिया सकता है और बिल बनता रहता है।

आप मर जाइए अस्पताल को कोई फर्क नहीं पड़ता, बकाया बिल भरिये और लाश ले जाइए। गलत इलाज की ख़बरें अक्सर आती रहती हैं, लेकिन सुनवाई कहाँ है ? ग्लोबलाइजेशन का असर ये भी है कि आम आदमी की सुनवाई बहुत दूर हो गयी है।

मंत्री हों या जज आपकी सुनेंगे या उन बड़ी बड़ी कंपनियों की, जो चंदा देने या रिश्वत देने या बड़े बड़े वकील रखने की कूबत रखते हैं ? आप भारत महान लोकतंत्र है, पढ़ पढ़ इतराते हैं तो इतराते रहिये, लेकिन सच यही है कि वो भी मल्टीनेशनल कंपनियों और देश की बड़ी कंपनियों, देश के बड़े उद्योगपतियों के हाथ बिक चुके हैं।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में जनता तक पहुँचना भी आसान काम नहीं रह गया है, हज़ारों करोड़ रूपये रैलियों पर खर्च करने पड़ते हैं। चुनाव जीतने के आइडियाज देने वाले प्रोफेशनल्स रखने होते हैं, तो ज़ाहिर है उन्हें भी पैसों की दरकार है और वो पैसे जनता नहीं दे सकती। उसके लिए उद्योगपति ही योग्य हैं।

ग्लोबलाइजेशन ने उद्योगपतियों को ये भी सिखा दिया है कि अपने व्यापारिक बजट में एक बड़ी राशि नेताओं और पार्टियों के नाम भी रखें । ऐसे में तंत्र इंसानियत भरा होगा सोचना फ़िज़ूल है।

ऐसे में पेशंट के साथ डॉक्टर जानबूझकर लापरवाही भी करेंगे और डॉक्टर पेशंट के परिवार वालों के गुस्से का शिकार भी होंगे, क्योंकि ग्लोबलाइजेशन ने इंसानी संवेदना और आपसी विश्वास को लील लिया है।

इसलिए आँखों में आंसू लाने से पहले जान लीजिये कि आपके आंसुओं की कहीं कोई क़द्र नहीं है। हाँ, क़द्र तब है जब आपके पास आंसू बेचने का हुनर है। तो भैया ये ग्लोबलाइजेशन का वक़्त है, बेचने का हुनर है तो ठीक, अन्यथा घुट घुट कर मरने को तैयार हो जाइए।

डॉक्टर साहब तो अपने बजट में बाउंसर पर आनेवाला खर्च जोड़ लेंगे, लेकिन आप क्या करेंगे ? एक काम कीजिये बेटे को बाउंसर बनाकर डॉक्टर साहब के यहाँ नौकरी के लिए भेज दीजिये।

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