जेपी स्मृति दिवस विशेष: जब जेपी की मौत पर फूट-फूट कर रोए लालू

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आज ‘संपूर्ण क्रांति’ के नायक जयप्रकाश नारायण की 40वीं  पुण्यतिथि है। यूँ तो बिहार की राजनीति में आज सभी बडे चेहरे, जो लोक नायक के द्वारा चलाए गए ‘संपूर्ण क्रांति’ के रंगरूट रहे। उनमें कई आज राजनीतिक मुकाम पर है…………….”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क / जयप्रकाश नवीन

चाहे सीएम नीतीश कुमार हो या रविशंकर प्रसाद या फिर सुशील कुमार मोदी या रामविलास पासवान। लेकिन जेपी के सबसे ज्यादा अगर पास  रहने उन्हें नजदीक से पहचाने का मौका मिला है तो वे थे, बिहार के 25 वें सीएम लालू प्रसाद यादव। जिन्होंने परंपरा और लीक से हटकर जनता के बीच गांधी मैदान में जेपी की प्रतिमा के सामने शपथ लिया था।

लालू प्रसाद यादव के जीवन को लोहिया के बाद अगर किसी दूसरे ने आकार दिया तो वे जेपी थें । जेपी उन्हें अपने बेटे की तरह प्यार करते थे। लोकतंत्र के संघर्ष में जयप्रकाश नारायण से उनकी पहली मुलाकात जनवरी 1974 में हुई थी। उस समय देश के कई हिस्सो में छात्रों का आंदोलन चल रहा था।

उस समय लालू प्रसाद यादव  पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थें।उनके आवास पर लालू और दूसरे छात्रों ने उनसे छात्र  आंदोलन में दिशा निर्देश देने की मांग करने पहुँचे थे। लालू प्रसाद यादव ने जेपी को ‘बाबूजी’ कहकर संबोधित किया था। उसके बाद से जेपी उनके लिए ‘बाबूजी’ ही रहे।

लालू प्रसाद यादव ने उनसे पटना विश्वविद्यालय के व्हीलर सीनेट हॉल में छात्रों को संबोधित करने का अनुरोध किया था। पहली ही मुलाकात में जेपी लालू प्रसाद यादव की सादगी से प्रभावित हुए और उन्होंने 22 जनवरी को छात्रों को संबोधित करने पर इस शर्त के साथ राजी हुए कि अगर आप हिंसा और अनुशासनहीनता का परिचय देंगे तो ठीक नहीं होगा ।

जेपी ने 22जनवरी 1974 को छात्रों की बैठक को संबोधित किया जिसकी अध्यक्षता स्वयं लालूप्रसाद यादव ने की थी। कहा जाता है कि छात्रों की अनुशासन को देखते हुए जेपी 1 फरवरी को पटना कॉलेज में बैठक को संबोधित करने पर राजी हो गए।

कहा जाता है कि जब जेपी पटना कॉलेज में छात्रों को संबोधित कर रहे थे तो लालू प्रसाद उनके पैरों के पास बैठे रहे। लालू प्रसाद को एहसास हो गया था कि उन्होंने एक राजनीतिक गुरू और सच्चा दार्शनिक मिल गया है।

जब भी लालू प्रसाद जेपी के घर जाया करते थे। वे हमेशा उनसे भोजपुरी में बात करते थे। अपने बेटे की तरह दुलार करते और पिरकिया खाने को देते। कहते थे खाओ यह मेरी ससुराल से आई है।

इसके बाद जेपी जहाँ जाते लालू प्रसाद साये की तरह उनके साथ रहते थे। 8फरवरी को जब जेपी मुजफ्फरपुर में बिहार राज्य छात्र नेता सम्मेलन के बैनर तले बैठक को संबोधित किया तो लालू प्रसाद भी शामिल हुए ।

जब छात्रों का आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया। जगह-जगह मौन जुलूस, धरना -प्रदर्शन और रेल का घेराव किया जाने लगा।पटना, सहरसा, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, छपरा, गया, रांची, हजारीबाग सहित कई शहरों में आंदोलन की आग फैल चुकी थी।

पुलिस बल छात्रों पर दमन चक्र चलाने लगी। छात्रों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस चलाए जाने लगे। कॉलेज और विश्वविद्यालयों को बंद करा दिया गया। सैकड़ों छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया था।

बावजूद आंदोलन को धार धार रूप देने के लिए बिहार राज्य छात्र संघर्ष समिति का गठन किया। छात्र नेताओं ने लालू प्रसाद को इसका अध्यक्ष बनाया गया। अध्यक्ष बनाए जाने के बाद लालू प्रसाद दूसरे शहरों में भी जाकर आंदोलन तेज करने लगे।

18 मार्च, 1974 लालू प्रसाद यादव के जीवन का बहुत ही अहम् दिन माना जाता है। बिहार राज्य छात्र संघर्ष समिति की ओर से 12 सूत्री मांगो को लेकर बिहार विधानसभा घेरने का कार्यक्रम बनाया।

12 सूत्री मांगों में राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में छात्र संघ का गठन, शिक्षा व्यवस्था में तत्काल परिवर्तन, डिग्री धारी छात्रों को बैंक लोन, शिक्षित युवाओं को नौकरी और बेरोजगारों को भत्ता देने के अलावा मंहगाई और भ्रष्टाचार पर तुरंत प्रभाव से अकुंश लगाया जाने की मांग शामिल थी।

18 मार्च लालू प्रसाद यादव के लिए बेहद तनाव भरा था। राज्य के विभिन्न शहरों से हजारों छात्र पटना में विधानसभा घेरने के लिए जमा हुए थे। प्रशासन ने पटना में धारा 144 लागू कर दी थी।

इस निषेधाज्ञा का विरोध करते हुए हजारों छात्र विधानसभा पहुँचे, लेकिन पुलिस ने छात्रों को तीन ओर से घेर लिया। छात्र अपनी मांग के लिए सरकार पर दबाव बनाने लगें।पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया। आँसू गैस छोड़े गए।

जब छात्रों की भीड़ नियंत्रित नहीं हुई तो पुलिस गोलीबारी पर उतर गई। पुलिस ने छात्रों को खदेड -खदेड कर पीटना और गोली चलाना शुरू कर दिया। बड़ी संख्या में छात्र घायल हुए। छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया।

इसी बीच अफवाह फैल गई कि लालू प्रसाद यादव पुलिस फायरिंग में मारे गए। इस अफवाह ने आग में घी डाला और कई शहरों में छात्रों के बीच गुस्सा भड़क गया। उन शहरों से हिंसा और आगजनी शुरू हो गई। लालू प्रसाद यादव उस समय विधानसभा के एक कोने में छिपे पड़े थे।

22 मार्च को आखिरकार पुलिस ने अन्य छात्रों के साथ लालू प्रसाद को गिरफ्तार भी कर लिया। पुलिस ने उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर बांकीपुर सेंट्रल जेल भेज दिया। जेल में रहते हुए भी लालू प्रसाद आंदोलकारी छात्रों से संपर्क साधते रहते थे। जेल में उन्होंने कैदियों के खाने की गुणवत्ता को लेकर कई बार आंदोलन किया।

जब जेपी ने लालू की बेटी का रखा नाम : कहा जाता है कि जब लालू प्रसाद यादव जेल में थे। 22 मई,1975 को उनकी पहली संतान के जन्म की खबर मिली। लालू प्रसाद पैरोल पर अपनी नवजात बच्ची को देखने घर पहुँचे।

बाद में जेपी ने सुझाव दिया कि तुम ‘मीसा’ के तहत गिरफ्तार हुए हो तो अपनी बेटी का नाम मीसा पुकारू। इस तरह से लालू प्रसाद की पहली पुत्री का नाम रखा गया मीसा भारती।

कहा जाता है कि एक बार जेपी ने लालू प्रसाद को अपने कदमकुआं स्थित घर पर बुलाया और उनकी आर्थिक स्थिति के बारे में पूछताछ की। लालूप्रसाद ने उनसे आर्थिक विपन्नता के बारे में बताया। जेपी ने अपनी दराज खोली और तुरंत ही आर्थिक मदद कर दी।

जेपी ने अपने सचिव सच्चिदानंद सिन्हा को उनके परिवार की देखरेख करने का निर्देश दे रखा था। वे जानते थे कि लालू प्रसाद जेल में हैं। इसलिए उनके परिवार को आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।

18 जनवरी, 1977 जब देश से आपातकाल खत्म हुआ और चुनाव की घोषणा हुई। तब लालू प्रसाद यादव के जीवन ने फिर करवट बदली। लालू प्रसाद यादव बिहार से टिकट पाने वाले एक मात्र छात्र नेता थे।

उन्हें छपरा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए कहा गया। लेकिन कुछ नेताओं ने इनका  विरोध किया। कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि लालू प्रसाद को बाढ़ से चुनाव लड़ना चाहिए।

तब लालू प्रसाद के लिए बाढ़ अनजान क्षेत्र था। वहाँ उनका कोई समर्थन भी नहीं था। लेकिन जेपी एक बार फिर इनके लिए खेवनहार बने। जेपी ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने बाढ़ से चुनाव लड़ने का विरोध किया।

तब जाकर लालू प्रसाद की छपरा सीट कंर्फम हुई। लालू प्रसाद छपरा से ही नामांकन पत्र दाखिल करने हथकडी में ही उपस्थित हुए। लालू प्रसाद प्रसाद ने पौने चार लाख मतों से छपरा सीट जीती थी।

जब जेपी की मौत पर खूब रोएं लालू: 8 अक्टूबर, 1979 लालूप्रसाद यादव के जीवन का सबसे दुखद क्षण। जब पटना में लोकनायक का निधन हुआ था। लालू प्रसाद ने अपने ‘बाबूजी’ को हमेशा के लिए खो दिया। उनके निधन की खबर मिलते ही लालू प्रसाद फूट-फूटकर होने लगे। उनको रास्ता दिखाने वाली मशाल और गुरु हमेशा के लिए कहीं अंधेरे में गुम हो गया।

उनके निधन से लालू राजनीति की दुनिया में खुद को असहाय और विचलित महसूस करने लगें थे, क्योंकि मार्गदर्शन और नैतिक समर्थन के लिए उनके पास अब कोई जेपी नहीं था।

जब लालू ने जेपी प्रतिमा के सामने ली शपथ : 10 मार्च, 1990 लालू प्रसाद यादव बिहार के 25 वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लालू प्रसाद ने बिहार की परंपरा और लीक से हटकर 10 मार्च, 1990 को गांधी मैदान में जेपी की आदमकद प्रतिमा के सामने शपथ लेने का फैसला किया।

अब तक बिहार के सभी 24 मुख्यमंत्रियों ने राजभवन में ही सीएम पद की शपथ ली थी। हजारों लोगों के बीच जब उन्होंने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला भीड़ से लालू प्रसाद जिंदाबाद! जयप्रकाश नारायण जिंदाबाद! के नारे से आसमान गूँज रहा था।

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